जानिए कैसे कैसे नुस्खे हैं इलाज के आयुर्वेद में

मित्रो, आपने बहुत से लोग देखे होंगे जो आयुर्वेदिक भक्त होते हैं अर्थात आयुर्वेदिक इलाज के गुण गाते हुए ऐलोपेथी को भला बुरा कहते हैं । उनकी नजर में आयुर्वेदिक दवाइयाँ रामबाण होती हैं और उनके सामने ऐलोपैथिक दवाइयाँ कचरे का ढेर। पर यह बात अलग है की बीमार होने पर वे लोग हास्पिटल में एडमिट होते हैं और ठीक ऐलोपैथिक दवाइयो से ही होते हैं।पर आयुर्वेदिक के गुण गाना बंद नहीं करते , शायद ये लोग अपनी उस मानसिकता की झेंप मिटाने के लिए ही आयुर्वेदिक को ऐलोपैथिक से अधिक उपयोगी सिद्ध करने में लगे रहते हैं जिसमें आयुर्वेदिक ग्रंथो और उनके नुस्खों को ईश्वरीय मान के पवित्र माना गया है, पर सर्जरी से लेके बुखार तक की दवाई ऐलोपैथिक ही खाते हैं ।ऐसे लोगो ने कभी आयुर्वेदिक ग्रन्थ पढ़े नहीं होते हैं बस प्राचीन पुस्तको पर श्रद्धा और ईश्वरीय विश्वास ही उनको यह मानने पर मजबूर कर देता है ।

आप स्वयं देखिये की कैसे कैसे इलाज के नुस्खे बताये गए हैं आयुर्वेद में –

1-तुलसी दास के बाहँ में बहुत दर्द रहता था उन्होंने बांह के दर्द के इलाज के लिए नुस्खा लिखा है ‘हनुमान बाहुक’ पढ़ने से बांह का दर्द दूर हो जाता है ।

2- हर्षवर्धन के समय कालीन मयूरभट्ट कोढ़ हो गया था , उसने कोढ़ का इलाज के लिए सूर्य की प्रशंसा में सौ श्लोक लिख के कोड को दूर करने का इलाज बताया है ।

3- प्रमेह रोग- इस रोग में मूत्र के साथ धातु या शक्कर गिरती है , इस के रोगी को दिए जाने वाले आहार का निर्देश करते हुए चरक संहिता में कहा गया है –

ये विष्किरा से प्रतुदा …… चाप्यपूपान(चरक संहिता , चकित्सा स्थानम् ,अध्याय 6, श्लोक 19)
अर्थात प्रमेह से पीड़ित रोगियो को विष्किर( तितर की जाति का एक पक्षी) और प्रतुद(बाज,कौआ, तोता) पक्षी का मांस तथा जंगली पशु के मांस का रस( तरी) के साथ यव का भात और सत्तू का आहार करना चाहिए जिससे यह रोग ठीक हो जाए।

4- यक्ष्मा रोग(क्षय रोग) – इस रोग से पीड़ित को तितर, मुर्गा, आदि पक्षीयो का मांस घी में पका के खाने का विधान चरक ने किया है –
लावणाम्लकटूष्णश्च रसान् ……. कल्पयेत्( चरक संहिता, चकित्सा स्थानम् 8/66)
चरक ने यक्ष्मा रोगियो को सांप, लोमड़ी, गीदड़, मोर तक का मांस खाने को बतया हैऔर यह भी निर्देश दिया की यदि किए पशु का मांस खाने में रोगी को घृणा हो तो उसे पशु का नाम बदल के बताना चाहिए जैसे सांप का मांस को मछली का मांस बता के खिलाना चाहिए ।

5- सुश्रुत ने तो भूंख न लगने की बीमारी में ग्राम्य पशुओ का मांस खाने तक को कहा है –

अश्वाश्वतरगोखरोष्ट्बस्तौरभ्रमेद: पुच्छक प्रभृतयो ग्राम्य: …….बलवर्धना:( सुश्रुतसंहिता, सूत्र स्थानम् 46/85-86)

अर्थात- घोडा, खच्चर, गाय, ऊंट, बकरा, मेड़ा, दुम्बा आदि गाँवो में रहने के कारण ग्राम्य पशु कहलाते हैं , इन के मांस वातनाशक, शरीरवर्धक, और कफपित्त करते हैं . मधुर रस , मधुर विपाक , अग्निदीपक( भूख लगाने वाले ) और बाल वर्धक हैं।

6- उदर रोग के लिए – पेट के रोगों में जंगली पशुओ व पक्षीयो केसाथ 4-5तरह की मद्य( शराब) पिलाने का विधान करते हुए चरक ने कहा है –
रक्तशालीन यवानमुद्गान्य जंगलाश्चय ……. सुराम्( चरक संहिता, चकित्सा स्थानम, 13/97-98)

अर्थात- उदर रोगी को सेवनीय आहार दृव्य:, रोगी को शक्तिशाली धान,यव, मुंग, जंगली मृग और पक्षी का मांस , दूध, मूत्र, मधु, और सूरा देनी चाहिए

7- शर्करा रोग यानि शूगर रोग के लिए सुश्रुत अस्थियो का चूरा सूरा के साथ खाने का विधान करते हैं
क्रोंचोष्ट्ररासभास्थिनि शवदंष्ट्रा तालमुलिका….. सुरयोष्णोदकेन् वा(सुश्रुत संहिता, चकित्सा स्थानम् 7/18-19)
अर्थात- क्रोंच पक्षी, ऊंट, गधे की अस्थियां की भष्म , गोखरू, मुसली, अजवायन , कदम्ब का मूल , सौंठ का सूरा या गर्म पानी के साथ पीने पर शर्करा नष्ट हो जाती है

यह तो थे कुछ प्रमुख नुस्खे जो विभिन्न रोगों में आयुर्वेद इलाज के लिए कहता है ,इसके आलावा सेक्स पावर बढ़ाने के लिए उदविलाव के अंडकोष से इलाज बताया गया है सुश्रुत ने ।
इस प्रकार कई और रोगों के इलाज का दावा किया जाता है आयुर्वेद से ।

अभी कुछ दिन पहले स्वाइन फ्लू फैला था , तब आयुर्वेद के भक्त गण यह प्रचार कर रहें थे की इसका इलाज तो आयुर्वेद में पहले से ही है । ऐसी बाते अपने दिल को तसल्ली देने ले लियेकि जाती है आयुर्वेदिक भक्तो द्वारा, यदि वास्तव में किसी कथित आयुर्वेदिक ग्रन्थ में किसी कथित रोग का इलाज है तो येलोग उस वक्त क्यों चुप्पी साधे रहते हैं जब रोग महामारी का रूप रख के लोगो की जान ले रहा होता है । उन भक्तो की चुप्पी तब टूटती है जब ऐलोपेथी रोग विशेष का तोड़ खोज लेता है ?
तब ये आयुर्वेदिक भक्त अपनी झेप मिटाने के लिए ऐसे बयान देते हैं की फला बीमारी का इलाज तो आयुर्वद में पहले से ही था। और हर बार तभी उन्हें उन आयुर्वेदिक ग्रंथो से कोई तोड़ लिखा मिलता है जिसे वह हजारो सालो से पढ़ते आ रहे हैं पर उन हजारो सालो में उस पर नजर नहीं पड़ी।

दरसल भारतीय इलाज पराभौतिक ज्यादा होते हैं जो दवा पर नहीं अलौकिक शक्तियो के हस्तेक्षेप पर आधारित होते हैं ,प्रसिद्ध तुलसी दास आयुर्वेद के रहते अपने बांह के दर्द का इलाज नहीं कर सके । तब उन्होंने ‘ हनुमानबाहुक’ नाम की पुस्तिका लिखी जिसमे हनुमान से दर्द निवारण की प्रार्थना लिखी … उधर पुस्तिका तैयार … इधर दर्द गायब.. है न कमाल!!
यदि आज ऐलोपैथिक साइंस ने उन्नति न की होती तो आज भी बांह में दर्द होने पर लोग हनुमान की को प्रार्थना पत्र लिख रहे होते दर्द निवारण के लिए ।

– केशव

परिचय - संजय कुमार (केशव)

नास्तिक .... क्या यह परिचय काफी नहीं है?