स्मृति के पंख – 23

यह 1946 या 47 की बात है। वहाँ से भ्राताजी के खत आते। उनसे वह काफी परेशान से लगते जैसे रोजाना उनकी तकलीफ बढ़ रही है। मैंने भाई श्रीराम को भ्राताजी की खबर लेने भेजा। उन्होंने वापस आकर कहा कि वह बहुत दुखी हैं। एक जगह में फौजी कैम्प लगे हैं, वहाँ रहते हैं। सामान मंगाने की तकलीफ तो नहीं, फौजी गाड़ियां मिल जाती हैं। लेकिन उन्हें फारूख खान का बर्ताव अच्छा नहीं लगता। वो निजी ख्याल के लोग हैं और हिन्दुओं से नफरत का प्रचार करते हैं। मिलेट्री वाले आफिसर तो सब अच्छे हैं, लेकिन भ्राताजी ठेकेदार से बहुत दुखी हैं। मुझे मरदान कपड़े का कोटा तकसीम करने जाना पड़ता था। चार पांच दिन दुकान वैसे ही बंद रहती। अब भ्राताजी की खबर लेने का भी जरूरी ध्यान रखना है। इसलिये सब काम छोड़कर मैं भ्राताजी को मिलने चला आया। फ्रंटियर में भी हालात ठीक थे, लेकिन पंजाब तो सारा जल रहा था। इधर-उधर आग लगी हुई थी। जिस बस में मैं सफर कर रहा था, मुझे लगा कि मैं अकेले हिन्दू हूँ, बाकी सब मुसलमान हैं। वैसे मैंने भी अपने आपको मुसलमान जाहिर करने की कोशिश की थी। भगवान को सिमरते-सिमरते वह जगह आ पहुँची, जहाँ मैंने उतरना था। बस आगे बढ़ी और मैं खेमे के शहर में बढ़ने लगा।

संतरी ने मुझे पूछा- किधर जाना है। मैंने भ्राताजी का नाम लिया तो उसने अंदर जाने दिया। भ्राताजी के देखते ही मुझे उनकी तकलीफ का एहसास हुआ। उन्हें कुछ सहारा भी मिला एक बड़े से खेमे में उनकी रिहायश भी और कैंटीन भी लगी थी। काफी रात तक हम बातचीत करते रहे। भ्राताजी की बातों से पता चला ठेकेदार से कुछ हासिल करना बहुत मुश्किल है। पंजाब की हालत भी बहुत खराब है, घर की भी फिक्र है, क्या करना चाहिये। मैंने दो टूक फौसला दे दिया कि जाने दो। अगर रुपया नहीं मिलता, तो अपने आप को दुखी रखना कहाँ की दानिशमंदी है। फैसला हुआ कि मेजर से बातचीत करके उनसे मदद मांगी जाय। फिर हम मेजर से मिले। उसने हमारी बात सुनकर दूसरे दिन आने का कहा। मैं उनका पूरा हिसाब देखकर तुम्हें बतलाऊंगा कि मैं क्या मदद तुम्हारी कर सकता हूँ। दूसरे दिन मेजर ने कहा कि उनकी किताबों में काशीराम नौकर है, जिसके जमा रुपये 800/- लेना है। तुम्हारा रुपया न ही किताबों में न ही पार्टनरशिप में तुम्हारा नाम है। इसलिये हम तुम्हारी कोई मदद नहीं कर सकते। हमारे वो ठेकेदार हैं, अगर तुम्हारे खिलाफ वो कुछ कहेंगे हम उनकी मदद करेंगे। आप लोग घर को चले जाओ हालात बहुत खराब हैं।

हमने एक सूटकेस में जिसमें कुछ कपड़े थे और कुछ सामान रखकर रावलपिण्डी आ गए जहाँ ठेकेदार का मकान था, उसके सामने हनुमान मंदिर था, दरी बिछाकर वहाँ लेट जाते। ठेकेदार जब घर आता, तो उन्हें सलाम करके हम अपने रुपये की मांग करते। लेकिन वो सुनी-अनसुनी करके चले जाते। इस तरह चार-पांच दिन गुजर गये। साथ एक मुसलमान बुजुर्ग, जिनकी सोडावाटर की दुकान थी, उसने भ्राताजी को बुलाया और पूछने लगा हमने उसे अपनी राम कहानी पूरी सुना दी। वह कहने लगा कि तुम थोड़ा फंसे हो, तीन असामिया है जिनका बीस-बीस हजार से ऊपर लगता है। काशीराम तुमने भारी गलती की है। रिश्ता और रुपया का लेनदेन करने से पहले किसी पड़ोसी से जरूर पूछ लेना चाहिये। फारूख जिसका बेटा है, उसकी मां कोठे की रंडी थी। उस पर उम्मीद करना अपने आपको धोखा देना है। किसी को कुछ नहीं दे रहा। आजकल ये अमन कमेटी का प्रेसीडेंट है, लेकिन मुझे इलम है कि गाँव में ये हिन्दुओं को मरवाता है। तुम्हें कोई हिन्दू बाहर नजर आता है? सब कैम्पों में हैं। तुम रात में मंदिर में दोनों भाई अकेले सोते हो। अगर तुम्हें रात कोई मरवा दे, तो तुम्हें कोई पूछने वाला है। मेरी राय मानो, बेहतरी इसी में है कि सब कुछ छोड़कर घर और बच्चों को संभालो। कुछ बाकी नहीं रहा, नफरत, खून-खराबा, पूरा पंजाब जल रहा है।

उसी वक्त हम वहाँ घर के लिये रवाना हो गये। अभी तक फ्रंटियर के हालात ठीक थे। लेकिन मर्दान में रामलाल के दोस्त का किसी ने कत्ल कर दिया। बहन सीतादेवी के दिमाग में उसका बुरा असर पड़ा। उसका दिमाग पिताजी की मानिंद खराब हो गया। लीगी आ गये, लीगी आ गये, बचाओ-बचाओ। कुछ दिन उसके देवर मुंशीराम ने उसकी देखभाल की, फिर हमारे घर ले आये। बहनजी की हालत भी पिताजी की तरह ही थी। डर खौफ दिल में समाया रहता था। अब अकेले बाहर जाने में डर लगता था। विश्वास भरोसा जैसे उठ गया हो। हिन्दू अपने आप को खतरे में समझते, फिर भी कारोबारी लोग काम कर रहे थे। बेलीराम हकीम (नौशहरा वाले से) बहनजी का इलाज शुरू करवाया। सुबह सात बजे जाता, दवाई लाकर दस बजे वापिस आ जाता। फिर एक हफ्ता की दवाई वह देने लगा। डेढ़ दो महीने की दवाई से बहनजी को आराम काफी आ गया।

इन्हीं दिनों नौशहरा सदर में लूटमार हुई, खटक लोगों ने हमला किया था। सदर बाजार को लूटा, फिर आग लगा दी, कहीं लोग कत्ल भी हुये। सरकारी तौर पर हिन्दुओं के लिये कैम्प बनाये गये। अगर किसी काम से बाहर जाना होता तो इजाजत लेकर बाहर जाते। इन दिनों मैंने अपने दुकान वाले क्वार्टर छोड़कर एक बिल्डिंग में रिहायश कर ली थी। तीन मजीद खानदान भी उस बिल्डिंग में रहते थे। बिल्डिंग महफूज थी और मेरे पास बंदूक भी थी। थोड़ा हौसला था। इन्हीं दिनों पता चला कि गढ़ीकपूरा, जहाँ मेरी ससुराल थी, वहाँ फसाद हुआ है। काफी नुकसान भी हुआ। हिन्दू लोग बड़े गुरुदारा में इकट्ठे जमा थे। आग से भी ज्यादा तबाही हुई। अब मेरा गढ़ीकपूरा ससुराल भी खबर लेने को जी करता, लेकिन जाऊंगा कैसे। ख्याल आया कि गलाढेर से खान को लेकर जा सकता हूँ। फिर गलाढेर जा पहुँचा। वहाँ से भी सब हिन्दू निकलकर मरदान चले गये थे। कोई पूछ ले, तो कोई बहाना भी नहीं था। लेकिन अपना गाँव था, कोई डर वाली बात नहीं थी।

खान को मिलने पर मैंने उससे बात की। उसने पहले तो कहा कि जो काम है, मैं कर सकता हूँ। लेकिन तुम गाँव में रहो। अगर मैं मर जाऊंगा, तो ही तुम्हें कोई मार सकेगा, घबराते क्यों हो? लेकिन मैंने कहा, ‘खान, अब हालात ऐसे नहीं हैं। मेरा यह काम गढ़ीकपूरा जाने वाला कर दो, इतना ही बहुत है।’ और वह उसी वक्त साइकिल लेकर मेरे साथ चलने को तैयार हो गया। जब अपनी दुकान पर पहुँचा, तो सकीना से मिलने की ख्वाहिश पैदा हुई। खान को कहा, ‘अभी मैं पड़ोसियों को मिलकर आता हूँ, थोड़ा ठहरो।’ उनके घर दाखिल हुआ। ज्यादा वक्त तो था नहीं। मैंने सकीना से कहा कि शायद आज की मुलाकात हमारी आखिरी है। यह भी जैसे खुदा को मंजूर था, अचानक आना पड़ा और तुमसे मिल लिया। अगर जिन्दगी में वफा की है, तो तमन्ना है कि मरने से पहले एक बार तुम्हें मिलूँगा। कटी शाख की तरह वह मेरे ऊपर गिर पड़ी। उसकी आंखों से आंसू बह रहे थे, बोल कुछ न सकी। मैंने उसका आखिरी बोसा लिया और उसको ‘अलविदा, खुदाहाफिज’ कह कर चला आया। जब हम साइकिलों पर सवार होने लगे, तो उसने दरवाजे की ओर से अपना हाथ चूम कर ही अलविदा सलाम किया।

(जारी…)

परिचय - राधा कृष्ण कपूर

जन्म - जुलाई 1912 देहांत - 14 जून 1990