कविता पद्य साहित्य

सिलसिला

तुम्हारी लबों से आई आवाज़ों में मगरूर होता गया। जब – जब अदाओं को देखा तो सुरूर चढता गया। मुलाकातों का सिलसिला जैसे-जैसे आगे बढता गया हम तुम्हारी तरफ़ इस कदर खिचा हुआ चला आया हर नखरे हमें यु हर रोज दिल को याद दिलाता रहा बलखाते हुए संजीदा बदन हमेशा याद आता रहा कोशिश […]

बाल कहानी

बाल कहानी – शंख का कमाल

रामधन बहुत गरीब लेकिन अच्छे स्वभाव का व्यक्ति था | उसने एक साधु की खूब सेवा की | साधु ने उसकी सहायता के लिए उसे एक शंख दिया | कहा कि इसको रोज पूजा के समय बजाने से तुम्हें एक सोने का सिक्का मिलेगा |  रामधन खुश होकर घर आ गया | रोज सोने का […]

आत्मकथा

आत्मकथा – दो नम्बर का आदमी (अंतिम कड़ी)

हमारे तत्कालीन सहायक महा प्रबंधक श्री राम आसरे सिंह बहुत ही सज्जन थे। सभी अधिकारियों की व्यक्तिगत समस्याओं पर भी ध्यान देते थे। ऐसे उच्चाधिकारी बहुत कम होते हैं। एक बार की बात है कि हमारे एक अधिकारी श्री मनोरंजन उपाध्याय का स्थानांतरण वाराणसी से गोरखपुर हो गया था। उस समय उनकी श्रीमती जी गर्भवती […]

गीतिका/ग़ज़ल

गजल- लगता हम भी शायर हैं

जब तक हम तनहा थे लगता था दीवारो-दर हैं. जब से साथ तुम्हारा पाया हमको लगता हम घर हैं. ऐसी बात कभी मत कहना जिससे दिल पर चोट लगे, पत्थर जैसे दिखते तो हैं किन्तु नहीं हम पत्थर हैं. आज हमारी ग़ज़लें खुशबू फैलाती हैं फूलों सी, तुमने जब से गाया इनको, महके अक्षर-अक्षर हैं. […]

कुण्डली/छंद

ताजी खबर : ताजी कुंडलिया

अपने हिंदुस्तान में, रहें सिर्फ चुपचाप। लोकतंत्र कैसा यहाँ, इससे अच्छी खाप। इससे अच्छी खाप, जुबां पर ताला डालें। अभी यहाँ अंग्रेज, मिलेंगे काले-काले। कह ‘पूतू’ कविराय, छंद क्यों बैठा रचने। अगर भेज दें जेल, ख्वाब टूटेगे अपने॥

कविता

कविता

काले दिनों में तुमने आँखें खोली हैं मेरे बच्चे अब तो बस तू नज्मों में ही पढ़ेगा स्वर्ग से सुंदर धरती की बातें सच तो यही है कि तेरी जाई ने भी कई दिनों से नहीं पढ़ा कुछ जिंदगी जैसा …. काले दिनों का चेहरा ही ऐसा है जो याद रहेगा जिंदगी भर किसी अजीज […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल (माँ का एक सा चेहरा)

ग़ज़ल (माँ का एक सा चेहरा) बदलते बक्त में मुझको दिखे बदले हुए चेहरे माँ का एक सा चेहरा , मेरे मन में पसर जाता नहीं देखा खुदा को है ना ईश्वर से मिला मैं हुँ मुझे माँ के ही चेहरे मेँ खुदा यारों नजर आता मुश्किल से निकल आता, करता याद जब माँ को […]

धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

मूर्तिपूजा, तीर्थ व नामस्मरण का सच्चा स्वरूप और स्वामी दयानन्द

ओ३म् महर्षि दयानन्द न केवल वेदों एवं वैदिक साहित्य के विद्वान थे अपितु उन्हें पुराणों सहित सभी अवैदिक धार्मिक ग्रन्थों व पुस्तकों का भी तलस्पर्शी ज्ञान था। अपने इस व्यापक ज्ञान के कारण ही उन्होंने जहां वेदों का भाष्य किया और सत्यार्थ प्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका सहित संस्कार विधि आदि अनेक महत्वपूर्ण ग्रन्थों का प्रणयन किया वहीं […]

कविता

हौंसलों की उड़ान

देख पंछी परिंदों को मेरे मन जागी इच्छा मैं भी इनकी तरह उडूँ उन्मुक्त आकाश में लेकिन इनके तो पंख हैं मैं पंख कहाँ से लाऊँ मैं हो गयी परेशान अब कैसे भरुँ उड़ान दिल ने मुझे समझाया धैर्य दिला के कहा घबराओ मत ऐसे मैं उपाय बताता हूँ पंख नहीं तो क्या हुआ हौंसलों […]

आत्मकथा

स्मृति के पंख – 22

दूसरे साल भी वह जन्द्र हमने दस हजार रुपये ठेके पर ले लिया। पिछले साल से काफी महंगा था। फिर भी लगता था फायदा होगा। जिस बात का डर था खान के नाम से ही वह खत्म हो गया। जन्द्र की रोटी कभी-कभी सब्जी आलू की बना लेते, नहीं तो नहर पर पुदीना होता था। […]