क्षणिका

क्षणिकाएँ

क्षणिकाएँ “मौन की भाषा” ‘मौन की भाषा आसान नहीं होती’ “प्रेम में मौन रहकर भी कुछ लोग सब कुछ कह जाते हैं” — “मौन” ‘काश! तुम समझ पाती’ “कि मैं मौन रहकर भी इजहार कर रहा हूँ” — “बातें” सारी बातें कही नहीं जाती ‘अनकही’ बातें भी तुम समझा करों। – अमन चाँदपुरी

कविता पद्य साहित्य

नई पीढ़ी-पुराणी पीढ़ी

नई पीढ़ी –पुराणी पीढ़ी     पिता ने पुत्र से कहा , “बेटा अब तुम बड़े हो गए हो पढ़ लिखकर नौकरी में स्थापित हो गये हो अब भाग दौड़ कम कर एक गृहस्थी बसा लो अब तुम शादी कर लो |”   आधुनिक परिवेश में पले,पढ़े,बढे मॉडर्न होने का दावा करने वाले पुत्र ने […]

कविता

ग़ज़ल लिखते हैं…..

चलो एक खूबसूरत ग़ज़ल लिखते हैं | यूंही उलझे-सुलझे शामो सहर लिखते हैं | कहीं ज़िन्दगी की कोई असलियत लिखते हैं | कहीं कल्पनाओं के सफ़र लिखते हैं | चलो एक खूबसूरत…….. कहीं सब कुछ पाकर भी कोई हो परेशाँ | कहीं अगर मिल जाए किसी से कोई | यूंही बिछड़ने का सबब लिखते हैं […]

धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

संसार रूपी घोंसले में रहते हुए हम अपनी हृदय गुहा में प्रभु का दर्शन करें

ओ३म् मनुष्य जीवन का उद्देश्य प्रभु का दर्शन कर सभी दुःखों से 31 नील 10 खरब 40 अरब वर्षों तक मुक्त रहना व ईश्वर के सान्निध्य में रह कर आनन्द को भोगना है। हमारे यहां एक नहीं अपितु अनेक ऋषियों ने अतीत में ईश्वर का साक्षात्कार कर मुक्ति की अवस्था को प्राप्त किया है। मनुष्य […]

लघुकथा

तुलसी का चौंरा-लघुकथा

वो लगातार पाँच दिनों से शोभना के व्यवहार पर गौर कर रहा था। उससे हर पल बतियाने वाली, आते जाते निहारने, नज़रों से दुलराने वाली, उससे बात किए बिना बेचैनी से दिन बिताने वाली शोभना कैसे इतनी बदल गई है, यह उसकी समझ से परे था। प्रतिदिन सोचता शायद अधिक व्यस्त होगी, पर नहीं, व्यस्त […]

आत्मकथा

स्मृति के पंख – 38

घर में अब एक नई पार्टी बन गई थी और इनका बोल बाला था। नई पार्टी में राकेश, गुड्डा, केवल, गुलशन (गुट्टू) ये सब मेम्बर थे और उस नई पार्टी की रौनक थी पूरे घर में। ये नई पार्टी बड़े काम करने का इरादा रखती थी और अपनी मंजिल की तरफ पूरी लगन से गामजन […]

मुक्तक/दोहा

राज मुक्तक सुधा

[1] माँ के हाथों की रोटी बड़ी प्यारी लगती है, माँ की मुस्कुराहट भी फुलवारी लगती है/ उपवन का पत्ता-पत्ता गाता प्रेम का गीत, माँ तेरा आँचल ममता की अटारी लगती है/ [2] कोई धन को चुराते हैं , कोई मन को चुराते हैं/ ए बड़े कंगाल हैं आशिक , गजब कविता चुराते हैं/ [3] […]

राजनीति

साल एक शुरुआत अनेक  

एक पुरानी कहावत है “बार – बार गाय की पूँछ उठा कर देखने से गाय गोबर जल्दी नहीं करती” , इस प्रकार की भदेस (Weird) कहावत से लेख की शुरआत करने पर मुझे माफ़ कीजिये लेकिन यही हाल आज-कल मिडिया का है। चाहे मोदी सरकार हो या केजरीवाल सरकार मिडिया के मेंढक पीछे पड़े है बार-बार पूछ रहें है […]

राजनीति

बौद्धिक दिवालियेपन की ओर जाती कांग्रेस

विगत लोकसभा चुनावों में अति मुस्लिम प्रेम के कारण मात खा चुकी कांग्रेस सुधरने का नाम नहीं ले रही है। जब राहुल गांधी ने अपनी वापसी के बाद केदारनाथ धाम की 15 किमी यात्रा की थी तब टी वी चैनलों और मीडिया में पुराने कांग्रसियों ने ऐसा प्रदर्शन किया था कि मानो राहुल गांधी के […]

कविता

जी करता है….

हस्तरेखाओं को कभी -कभी ना मानने को जी करता है | जो किस्मत मे ना हो कभी उसे पाने को जी करता है | बदल दे अपने मुकद्दर को विशवास से भी यूंही जी करता है | मुशकिलो को कभी- कभी मुस्कुरा के आज़माने को जी करता है | वक्त पे ही मिलता है सब […]