Monthly Archives: June 2015

  • क्षणिकाएँ

    क्षणिकाएँ

    क्षणिकाएँ “मौन की भाषा” ‘मौन की भाषा आसान नहीं होती’ “प्रेम में मौन रहकर भी कुछ लोग सब कुछ कह जाते हैं” — “मौन” ‘काश! तुम समझ पाती’ “कि मैं मौन रहकर भी इजहार कर रहा...


  • ग़ज़ल लिखते हैं…..

    ग़ज़ल लिखते हैं…..

    चलो एक खूबसूरत ग़ज़ल लिखते हैं | यूंही उलझे-सुलझे शामो सहर लिखते हैं | कहीं ज़िन्दगी की कोई असलियत लिखते हैं | कहीं कल्पनाओं के सफ़र लिखते हैं | चलो एक खूबसूरत…….. कहीं सब कुछ पाकर...


  • तुलसी का चौंरा-लघुकथा

    तुलसी का चौंरा-लघुकथा

    वो लगातार पाँच दिनों से शोभना के व्यवहार पर गौर कर रहा था। उससे हर पल बतियाने वाली, आते जाते निहारने, नज़रों से दुलराने वाली, उससे बात किए बिना बेचैनी से दिन बिताने वाली शोभना कैसे...

  • स्मृति के पंख – 38

    घर में अब एक नई पार्टी बन गई थी और इनका बोल बाला था। नई पार्टी में राकेश, गुड्डा, केवल, गुलशन (गुट्टू) ये सब मेम्बर थे और उस नई पार्टी की रौनक थी पूरे घर में।...

  • राज मुक्तक सुधा

    राज मुक्तक सुधा

    [1] माँ के हाथों की रोटी बड़ी प्यारी लगती है, माँ की मुस्कुराहट भी फुलवारी लगती है/ उपवन का पत्ता-पत्ता गाता प्रेम का गीत, माँ तेरा आँचल ममता की अटारी लगती है/ [2] कोई धन को...

  • साल एक शुरुआत अनेक  

    साल एक शुरुआत अनेक  

    एक पुरानी कहावत है “बार – बार गाय की पूँछ उठा कर देखने से गाय गोबर जल्दी नहीं करती” , इस प्रकार की भदेस (Weird) कहावत से लेख की शुरआत करने पर मुझे माफ़ कीजिये लेकिन यही...


  • जी करता है….

    जी करता है….

    हस्तरेखाओं को कभी -कभी ना मानने को जी करता है | जो किस्मत मे ना हो कभी उसे पाने को जी करता है | बदल दे अपने मुकद्दर को विशवास से भी यूंही जी करता है...