विज्ञान

आधुनिक विज्ञान का आधार वेद

ओ३म्

आज विज्ञान तेजी से नई-नई सफलतायें प्राप्त कर आगे बढ़ रहा है। विगत कुछ दशकों में विज्ञान अनेक सफलतायें प्राप्त कर चोटी पर पहुंच गया है। आज से कुछ दशक पूर्व देशवासी जिन चीजों की कल्पना भी नहीं कर सकते थे, उनमें से अधिकांश व प्रायः सभी कल्पनायें साकार हो गईं हैं। विज्ञान से हमें कम्प्यूटर, इण्टरनेट, मोबाइल फोन, आकर्षक वस्त्र व पोशाकें, रेल, हवाई जहाज, सुविधाजनक पानी के जहाज, कारें व वाहन, भव्य, बंगले व आवासीय एवं व्यवसायिक भवन आदि अगणित वस्तुयें व सुख सुविधायें प्राप्त हुईं हैं। आज का विज्ञान दो शताब्दी पूर्व अपनी शैशव अवस्था में था। उस समय किसे पता था उन दिनों वैज्ञानिक विज्ञान के जिन आधारभूत नियमों का हमारे वैज्ञानिक उद्घाटन कर रहे थे वह कुछ ही समय बाद 20वीं व 21वीं शताब्दी के लिए आधुनिक विज्ञान की नींव का कार्य करेंगे। गुरूत्वाकर्षण, घनत्व, ऊर्जा, गति के नियम, परणाणु व अणु का स्वरूप व इनका स्ट्रक्चर व कमोजिशन आदि ऐसी ही वैज्ञानिक खोजें हैं जिनके आधार पर आज का विज्ञान अस्तित्व में आया है। विज्ञान की छोटी-छोटी खोजों से ज्ञान-विज्ञान आगे बढ़ता रहा और दिन-प्रतिदिन नये आविष्कार होते रहे। आज यह कल्पना करना कठिन है कि आने वाले 10 से 20 वर्षों में वैज्ञानिक जगत में क्या-क्या नये आविष्कार होंगे?  इतना ही कहा जा सकता है कि आने वाला समय विज्ञान की दृष्टि से कहीं अधिक उपलब्धियों से भरा हुआ होगा। अनुमान है कि उसे ‘‘ भूतो भविष्यति” की संज्ञा दी जा सकती है।

हम यह विचार कर रहे हैं कि विज्ञान का आदि स्रोत क्या है? संसार में सबसे प्राचीन ग्रन्थ पर यदि विचार करें तो वह ग्रन्थ वेद सिद्ध होता है। आज से 5200 वर्ष पूर्व महाभारत का प्रसिद्ध युद्ध हुआ था तथा इससे लाखों वर्ष पूर्व रामायण काल में राम व रावण का युद्ध हुआ था। इन इतिहास ग्रन्थों में आदरपूर्वक वेदों का वर्णन मिलता है। विश्व के किसी भी देश में रामायण का समकालीन कोई ग्रन्थ नहीं है और जहां कहीं जो भी प्राचीन ग्रन्थ हैं वह सभी विगत दो से तीन हजार वर्ष पूर्व के ही हैं। अतः वेद ही सबसे प्राचीन ग्रन्थ सिद्ध होते हैं जिसे पाश्चात्य विद्वान प्रो. मैक्समूलर आदि भी स्वीकार करते हैं। आज वेद अपने मूल स्वरूप में विद्यमान हैं जिनकी भाषा संस्कृत है। वेदों पर हिन्दी व अंग्रेजी भाषाओं में प्रामाणिक भाष्य वा अनुवाद भी उपलब्ध हैं जिन से वेदों में वर्णित विषयों व ज्ञान के बारे में जाना जा सकता है। वेद शब्द का अर्थ ही ज्ञान होता है। विज्ञान ज्ञान से ही पैदा हुआ है या इसको यूं कह सकते हैं कि विज्ञान का आधार भी ज्ञान ही है। वेदों में ज्ञान व विज्ञान की क्या स्थिति है, जब इस पर विचार करते हैं तो विज्ञान विषयक अनेक विषयों का वेदों में ज्ञान प्राप्त होता है। महर्षि दयानन्द की प्रसिद्ध रचना ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका’ सन् 1877 में अस्तित्व में आयी है। यह ग्रन्थ उनके द्वारा किये गय चार वेदों के संस्कृत-हिन्दी भाष्य की भूमिका है जिसमें वेदों का संक्षिप्त परिचय दिया गया है। जिन विषयों को इस ग्रन्थ में सम्मिलित किया गया है वह हैं–ईश्वर प्रार्थना, वेदों की उत्पत्ति, वेदों के ज्ञान का अनादि व नित्य होना, वेदों के विचारणीय विषय जिनमें विज्ञान, कर्मकाण्ड आदि सम्मिलित हैं, ब्रह्म विद्या, वेदों में धर्म सम्बन्धी शिक्षायें, सृष्टि विद्या, पृथिवी, सूर्य, चन्द्र लोकों का भ्रमण, आकर्षण-अनुकर्षण (Attraction and Repulsion), प्रकाश देने वाले व प्रकाशित होने वाले लोक लोकान्तर, गणित विद्या, स्तुति-प्रार्थना-उपासना-मुक्ति आदि विषय, जलयान-विमान आदि विद्या, तार विद्या, चिकित्सा विद्या आदि। इन विषयों में सृष्टि विद्या वा विज्ञान, आकर्षण-अनुकर्षण, जलयान-विमान तथा तार विद्या तो पूरी तरह से विज्ञान के अंग हैं। आधुनिक काल में वैज्ञानिक खोजों से पूर्व ही इन विषयों का लगभग डेढ़ शताब्दी पूर्व विस्तार से वर्णन करना तभी सम्भव हो सका जब इनका उल्लेख ग्रन्थ लेखक ने वेदों व अपने से पूर्व उपलब्ध इतर वैदिक साहित्य में पढ़ा था। यह ज्ञातव्य है कि उन दिनों विज्ञान अपनी शैशव अवस्था में था और इन विषयों पर विशेष साहित्य व विज्ञान की पुस्तकें सुलभ नहीं थी। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह भी है कि ग्रन्थ लेखक स्वामी दयानन्द उन दिनों अंग्रेजी से अनभिज्ञ थे तथा केवल संस्कृत, हिन्दी और गुजराती भाषा ही जानते थे व इनका ही प्रयोग करते थे। हिन्दी को भी उन्होंने कुछ वर्ष पहले ही पढ़ा था। ग्रन्थकार ने सृष्टि विद्या के प्रसंग में लिखा है कि जब यह सृष्टि उत्पन्न नहीं हुई थी, उस समय केवल एक सर्वव्यापक ईश्वर एवं सृष्टि बनाने की सामग्री जिससे यह सृष्टि बनी है अर्थात् अत्यन्त सूक्ष्म प्रकृति ही विद्यमान थी। उस समय आज के समान आकाश भी व्यवहार में नहीं था क्योंकि उस समय यह सारा आकाश प्रकृति तत्व अर्थात् प्रकृति के कणों वा परमाणुओं से भरा था। इस प्रकार का विज्ञान सम्मत वर्णन ग्रन्थ लेखक स्वामी दयानन्द ने ऋग्वेदादिभूमिका में किया है जिसे विज्ञान प्रेमियों को वहां पढ़ना चाहिये।

वेदों में विज्ञान विषय पर एक विस्तृत पुस्तक का प्रणयन प्रसिद्ध वैदिक विद्वान डा. कपिलदेव द्विवेदी ने किया है। श्री द्विवेदी सरकारी सम्मान पद्मश्री से भी सम्मानित हैं। अपनी 304 पृष्ठों की विस्तृत पुस्तक में वेदों के विद्वान श्री द्विवेदी ने वेदों में भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान, वनस्पतिशास्त्र, जन्तुविज्ञान, शिल्प विज्ञान (Technology), कृषिविज्ञान, गणितशास्त्र, ज्योतिष (Astronomy), वृष्टि विज्ञान, पर्यावरण (Environment, Ecology), भूगर्भ विज्ञान (Geology) आदि विषयों पर विस्तार से प्रकाश डालने के साथ यह सिद्ध किया है कि इन सभी विद्याओं का मूल स्रोत चार वेद ही हैं। डा. द्विवेदी सहित अनेक विद्वानों ने भी वेदों में विज्ञान से सम्बन्धित अनेक ग्रन्थों का प्रणयन किया है। मुख्य ग्रन्थ हैं भारतीय स्थापत्य (डा. द्विजेन्द्रनाथ शुक्ल), संसार के महान् गणितज्ञ (श्री गुणाकर मुले), वेदविद्या (डा. वायुदेवशरण अग्रवाल), वेद व विज्ञान (स्वामी प्रत्यगात्मानन्द), वेद-विज्ञान (श्री कर्पूरचन्द कुलिश), वेदों की वैज्ञानिक अवधारणा (पं. शिवनारायण उपाध्याय), वेदों में आयुर्वेद (डा. कपिलदेव द्विवेदी), वेदों में विज्ञान (डा. बलराज शर्मा), वैदिक कोश (डा. सूर्यकान्त), वैदिक वांगमय में विज्ञान (डा. रामेश्वरदयाल गुप्त), वैदिक विज्ञान और भारतीय संस्कृति (श्री गिरिधर शर्मा), वैदिक सम्पदा (श्री वीरसेन वेदश्रमी), वैज्ञानिक विकास की भारतीय परम्परा (डा. सत्यप्रकाश)। इन हिन्दी ग्रन्थों के अतिरिक्त अंग्रेजी में लिखित हैं- Cosmogony in the Vedas (Ram Murti Sharma), Founders of Sciences in Ancient India (Dr. Satya Prakash), The essence of the Vedas (Dr. K.D. Dvivedi), Mathematics in Ancient & Modern India (A.K. Bag), Non-conventional Sources of Energy in Vedas (M. Ashtikar), Scientific knowledge in Vedas (P.V. Vartak) etc. etc.  इन ग्रन्थों के अतिरिक्त प्राचीन काल में महर्षि भारद्वाज लिखित वैदिक विमान शास्त्र’ ग्रन्थ भी उपलब्ध है जिसमें नाना प्रकार के विमानों व उनकी बनाने की विधि का वर्णन है। रामायण में वर्णित पुष्पक विमान के वर्णन से सभी परिचित हैं। इसके समान विमान अभी तक शायद बना नहीं है। महाभारत में भी विमानों के होने के प्रसंग पाये जाते हैं। हमारे अनेक ऋषि महाभारत काल से पूर्व व पश्चात पाताल लोक अमेरिका आते जाते थे। महर्षि दयानन्द ने अपने पूना प्रवचन में स्वयं पढ़े व देखे शास्त्र व ग्रन्थों के आधार पर बताया था कि प्राचीन काल में हमारे देश के निर्धन से निर्घन व्यक्ति के पास भी अपने विमान होते थे। इतना ही नहीं सृष्टि के अस्तित्व में आने के बाद आर्य लोग अपने विमानों में साथियों के साथ अनेक द्वीपों व महाद्वीपों की यात्रा करते थे और जो स्थान उन्हें पसन्द आता था वहां अपने लोगों को ले जाकर बसाते थे। इसी प्रकार से सारा संसार मनुष्यों से बसा है। इतना ही नहीं महाराष्ट्र-भारत के श्री शिवकर बापूजी तलपदे ने सन् 1895 में हजारों लोगों की उपस्थिति में चैपटी, मुम्बई पर मानव रहित स्वचालित विमान उड़ाने का सफल परीक्षण किया था। विमान का नाम मरूत्सखा” था। वैदिक साहित्य के गवेषक डा. कुशलदेव शास्त्री ने अपने ग्रन्थ महर्षि दयानन्द: काल कृतित्व’ में लिखा है कि रामायण, महाभारत और अन्य संस्कृत ग्रन्थों (लेखक ने 15 सन्दर्भ ग्रन्थों की सूची भी दी है) में विमान का वर्णन भरा पड़ा है। राजा भोज के समरांगणसूत्रधार ग्रन्थ (ग्यारहवीं शती) में विमान बनाने का संक्षेप में वर्णन मिलता है।”

वेदों में विज्ञान का विस्तार से वर्णन अत्यन्त प्राचीन ग्रन्थ वैशेषिक दर्शन” में देखा जा सकता है जो आजकल के विज्ञान की ही भांति पूर्णतः वैज्ञानिक पद्धति से विवेचित व तर्क पर आधारित है। महर्षि दयानन्द ने सन् 1875 में अपने सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ में शब्द को आकाश का गुण लिखकर भी एक वैज्ञानिक रहस्य का उद्घाटन किया था। ऐसे अनेक उल्लेख उनके ग्रन्थों में पाये जाते हैं। इस चर्चा से यह प्रमाणित होता है कि वेदों में विज्ञान अपने यथार्थ रूप में विद्यमान है जिसका किन्हीं कारणों से मध्यकाल में विस्तार व विकास नहीं हो पाया। अतः इस मान्यता में किंचित सन्देह नहीं की संसार की सबसे प्राचीन पुस्तक जिसमें विज्ञान के अनेक सिद्धान्तों की यथार्थ रूप में चर्चा है वह ‘‘चार वेद ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद” ही हैं। अतः यह प्रमाणित होता है कि संसार में विज्ञान की चर्चा से युक्त सर्वप्राचीन पुस्तक वेद है। वैदिक काल में हमारे देश में वैज्ञानिक क्षेत्र में प्रशंसनीय उन्नति दिखाई देती है जिसका प्रमाण बाल्मिकी रामायण और महाभारत के अनेक सन्दर्भ है। जिन हथियारों का इन ऐतिहासिक ग्रन्थों में उल्लेख है, उनमें से बहुत से आज बने भी नहीं है। महाभारत व रामायण काल के हथियारों को देखकर प्रतीत होता है कि उन दिनों परमाणु हथियार भी विद्यमान थे। पानीपत की भूमि के परीक्षणों से यह निष्कर्ष निकला है कि वहां अल्प मात्रा में रेडियोधर्मिता पाई गई है जिसका कारण महाभारत में प्रयोग में लाये गये आणविक हथियार हो सकते हैं। हम आशा करते हैं कि हमारे इस विचार कि विज्ञान का आधार वेद है, पाठक सहमत होंगे।

मनमोहन कुमार आर्य

 

परिचय - मनमोहन कुमार आर्य

नाम मन मोहन कुमार आर्य है. आयु ६३ वर्ष तथा देहरादून का निवासी हूँ। विगत ४५ वर्षों से वेद एवं वैदिक साहित्य सहित महर्षि दयानंद एवं आर्य समाज के साहित्य के स्वाध्याय में रूचि है। कुछ समय बाद लिखना आरम्भ किया था। यह क्रम चल रहा है। ईश्वर की मुझ पर अकथनीय कृपा है।

4 thoughts on “आधुनिक विज्ञान का आधार वेद

  1. अच्छा लेख. वेदों में विज्ञान है इसमें कोई संदेह नहीं है. हम उसका अर्थ नहीं खोल पा रहे हैं.
    लेकिन एक प्रश्न है कि जब भरद्वाज ऋषि का वैमानिक शास्त्र उपलब्ध है तो उसके आधार पर किसी ने विमान बनाने का प्रयास क्यों नहीं किया? क्या इस समय कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है जो यह कार्य कर सके?

    1. धन्यवाद महोदय। वेदों ने हमें बीज रूप में विज्ञान का ज्ञान देकर मार्ग दिखाया है। उस मार्ग पर हमें चलना था अर्थात् हमें बुद्धि का प्रयोग कर उसे विकसित करना था। हम महाभारत काल तक उस पर चले भी परन्तु महाभारत काल के बाद हम अन्धविश्वासों व कुरीतियों से ग्रसित हो गये। हमने ज्ञान व विज्ञान को छोड़कर अज्ञान व अन्धविश्वासों का मार्ग पकड़ लिया जो कि वेद विरूद्ध मार्ग है। वैदिक विमान शास्त्र का वही व्यक्ति उपयोग कर सकता है जो स्वयं विमान विद्या में उत्साह व रूचि रखता हो और इससे जुड़े सभी पक्षों से अभिज्ञ हो। हमारे जिन विद्वानों से इस ग्रन्थ की खोज की व टीका लिखी वह विज्ञान के जानकार नहीं थे, वह केवल संस्कृत विद्या व साहित्य के विद्वान थे। इसलिए वह विमान बनाने में अपना कोई योगदान कर नहीं सके। हां, लेख में उपर्युक्त वर्णित सन् 1895 में मुम्बई के विद्वान श्री बापूजी तलपदे ने विमान बनाकर हजारों लोगों की उपस्थिति में मुम्बई के चौपाटी में उड़ाया था परन्तु अर्थाभाव के कारण वह आगे कार्य नहीं कर सके। अंग्रेज भी किसी भारतीय को यह श्रेय देने के विरूद्ध थे। अतः उनके लगभग 10 वर्ष बाद यह श्रेय राइट ब्रदर्स को मिला।

  2. मनमोहन भाई , लेख हमेशा की तरह बहुत अच्छा है . संसार में कितनी सभिताएं आईं और गईं लेकिन भार्तीय संस्कृति ही सब से पुरानी है और जितने भी ग्रन्थ दुनीआं में हैं ,सब से पुराने भार्तीय ही हैं . हाँ , यह ठीक है कि आपसी झगड़ों और हमलों में बहुत कुछ बर्बाद हो गिया . जब हम पुराने इतहास पड़ते हैं , तो पता चलता है कि बहुत से हुक्मरान लड़ाई में जीत के बाद उन हारे हुए हुक्मरानों की संस्कृति को तबाह करने की कोशिश करते थे , यही कारण है अब हम को पुरानी लिपिआं पड़नी असंभव हो गई हैं . दो हफ्ते इजिप्ट में गुज़ार कर मैंने बहुत कुछ देखा . आज इजिप्ट मुस्लिम मुलक है लेकिन यह पहले नहीं था , पुरानी इज्प्शियन सभियता बर्बाद कर दी गई . इजिप्शियन फैरो बादशाहों के ज़माने की लिपिआं ऐसी थी कि चार तरफ से पडी जाती थी .दायें बाएँ और ऊपर नीचे पड़ी जाती थी . उन के अक्षर सिम्बल होते थे . आर्किओलोजिस्त कुछ कुछ पड़ने में कामयाब हुए हैं . हमारे बहुत से ग्रन्थ मुस्लिम हुकमरानों ने बर्बाद कर दिए .अगर वोह ग्रन्थ होते तो उन में से बहुत कुछ मिल सकता था .

    1. नमस्ते महोदय। लेख पसन्द करने के लिए हार्दिक धन्यवाद। आपके विचार व प्रतिक्रिया सत्य व यथार्थ हैं। आपके विचारों से मेरा ज्ञानवर्धन हुआ है, इसके लिए मैं आपका आभारी हूं और धन्यवाद करता हूं। मेरा अनुमान है कि जिस प्रकार संसार की सभी भाषायें संस्कृत का विकार या अपभ्रंस होकर बनी हैं, अर्थात् एक भाषा से दूसरी, उससे तीसरी, फिर अन्य अन्य व संस्कृत से भी समय समय पर नई नई भाषायें व बोलियां बनती बिगड़ती रही हैं। इसी प्रकार से संसार की लिपियां भी कुछ कुछ संस्कृत की देवनागरी लिपी का विकार हो होकर बनी व अस्तित्व र्में आईं हैं। यह मेरा अनुमान मात्र है, दावा नहीं। इस विषय में विभिन्न लिपियों के विशेषज्ञ विद्वान, जो किसी धर्म, संस्कृति व लिपि के पक्षपाती न हो और अपने विषय के पूर्व विद्वान हों वही सत्य व यथार्थ बता सकते हैं। सादर धन्यवाद।

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