संस्मरण

मेरी कहानी – 30

अब हम कुछ बड़े हो गए थे और शरारतें भी करने लगे थे। यों तो मैं बहुत शरीफ लड़का था और बोलता बहुत कम  था, लेकिन कुछ शरारत करने में बगैर ज़्यादा बोले आगे हो जाता था। इसमें एक बात थी कि उस समय रास्तों पर टोने टोटके बहुत रखे हुए होते थे। कई बृक्षों की जड़ों में भी लोगों ने पैसे रख कर कोई मनत मानी हुई होती थी। यह टोने अक्सर ज़्यादा तर क्रौस रोड्ज़ जिस को चुरस्ता यानी चार रास्तों वाला रास्ता (या चौराहे) बोलते थे, उस के बीच में रखे हुए होते थे। इससे लोग बहुत डरते थे। जब लोग टोना देखते तो अपने पशुओं को भी दूर कर देते थे ताकि उनको कुछ हो ना जाए। मेरा इन चीज़ों से भय खत्म हो चुक्का था क्योंकि जब भी मैं अपने राम सर वाले खेतों को जाता था तो बड़े बोहड़ के बृक्ष से होकर जाना होता था। इस बोहड़ की बड़ी बड़ी जड़ों में एक दिन मैंने कुछ पैसे पड़े देखे। यह पैसे ज़्यादा गली वाले और डब्बल पैसे थे जो बहुत बड़े होते थे। कुछ टके आने दुआणीआं थे। बचपन का लालच और साथ ही एक डर, पैसे उठाने में हिचकचाहट हो रही थी। पैसे छोड़ने को भी दिल नहीं मानता था। बहुत देर बाद हौसला करके इर्द गिर्द देखकर कि कोई देखता ना हो  मैंने पैसे उठा लिए। पैसे मैंने जेब में रख लिए और धीरे धीरे मेरा भय खत्म हो गिया। बहुत दिन तक यह पैसे मैं खर्चता रहा। अब ऐसा हो गिया था कि राम सर जाने के लिए उत्सुक रहता और जब भी जाता पहले नज़र बोहड़ की जड़ों की तरफ जाती। कुछ न कुछ वहां होता ही था और मैं उठा लेता। जब हम दोस्त कोई टोना देखते तो वहां कई दफा बड़ा सा पेठा होता, कुछ दालें  होती, हल्दी होती, और भी बहुत कुछ होता लेकिन पैसे कभी कभी ही होते। पहले हम देखते कि कोई हमें देखता तो नहीं क्योंकि ऐसा होने से हमें घर से झिड़कें खानी पड़  सकती थी। देख कर हम पहले टोने के ऊपर सात दफा अपना जूता मारते, फिर उस में देखने लगते कि पैसे हैं या नहीं। अगर हो तो उठा लेते और बाद में टोने को किक्कें मार मारकर उड़ा देते।

यह भय कई कारणों से खत्म हो चुक्का था। एक दफा गर्मिओं के दिन थे। अचानक मेरी माँ की आँखें दुखने लगीं। कुछ ही दिनों के बाद आँखें ज़्यादा दर्द करने लगीं और पानी भी बहने लगा। डाक्टर सोहन लाल को दिखाई गईं। उस ने कई दिन तक आँखें धोईं लेकिन कुछ फर्क नहीं पड़ा। भारत में वहम तो अब भी बहुत हैं लेकिन उस समय तो वहम की इंतहा ही थी। जब आँखें ठीक नहीं हुईं तो पहले भुल्ला राम ज्योतिषी के पास गए जो घर के सामने ही था और हमारे दोनों घरों में मुहबत भी बहुत ज़्यादा थी। भुल्ला राम ने अपना उपाए कुछ बताया होगा,  मुझे मालूम नहीं लेकिन आँखों को कोई फर्क नहीं पड़ा। फिर एक दिन गली में एक हाथ देखने वाला आया, वोह भी कुछ पैसे और कोई सोने का छोटा सा गहना ले कर चला गया लेकिन कुछ फर्क नहीं पड़ा। फिर दादा जी को किसी ने बताया कि दासो नाई टोना टोटका करता है जिस से घर में से बुरी आत्माएं निकल जाती हैं। दासो नाई रात को आया और उस ने एक टूटे हुए माटी के बर्तन में टोना तैयार किया जिस में बहुत चीज़ें डाली गईं और दादा जी को किसी सूखे तालाब में रखने को कह दिया। ज़ाहिर था कि सुखा  हुआ तालाब हमारे ही स्कूल के नज़दीक था जिस को डब्बरी बोलते थे। दासो बहुत से  पैसे ले कर चले गया। इस के बाद एक दिन मेरी माँ मैं और दादा जी पैदल चल कर फगवारे पखिरिए पंडित के पास गए। कुछ दिन जाते रहे लेकिन कोई आराम नहीं आया।

एक दिन अचानक मेरे पिता जी अफ्रीका से आ गए और माँ को बाइसिकल पर बिठा कर जालंधर आँखों के हस्पताल ले गए। वहां उन्होंने बताया कि आँखों में कुकरे थे और छोटा सा ऑपरेशन करके साथ में कुछ ड्रॉप आँखों में पाने को दे दिए। कुछ ही दिनों में माँ की आँखें बिलकुल ठीक हो गईं। ऐसी बातें देख देखकर डर तो क्या मुझे बहुत नफरत हो गई थी। ज़्यादा बातें मैं नहीं करता था लेकिन सोचता बहुत था। जैसे जैसे बड़ा होता गया , गुरदुआरों मंदिरों में बहुत कुछ देखा। सोचता था कि धर्म गुरुओं का यह डब्बल स्टैण्डर्ड क्यों था। एक दिन एक नया ग्रंथी आहलुवालिओं के गुरदुआरे में आया, साथ ही उस की नवविवाहता पत्नी भी थी। कुछ दिन तो वोह गुरदुआरे में रहे। फिर उन को मालुम हुआ कि मेरे ताऊ रतन सिंह का घर खाली था क्योंकि ताऊ रतन सिंह और उन का बेटा  गुरचरण सिंह यानी मेरा भईया और  भाबी अलाहाबाद में रहते थे। दोनों पति पत्नी ताऊ के घर रहने लगे। ग्रंथि पचीस तीस वर्ष का नौजवान था और पत्नी भी मुश्किल से बीस बाइस की होगी। दोनों बहुत सुन्दर थे। दोनों के रंग गोरे  थे और ग्रंथी की पत्नी तो इतनी अच्छी थी कि उस ने दादा जी को मोह लिया था। हर वकत बच्चों की तरह दादा जी से बातें करती। एक दिन वोह दालचीनी वाली चाय बना कर दादा जी के लिए लाइ और बोली ,” दादा जी यह चाय पीओ , तबीयत खुश हो जायेगी “. चाय पी कर दादा जी बहुत खुश हुए। हम ने भी पी , वाकई चाय बहुत स्वाद थी। इस के बाद कभी वोह अधरक  वाली  चाय लाती कभी दालचीनी वाली। दादा जी ने उन को कह दिया था कि मकान का किराया उन को देने की कोई जरुरत नहीं थी। ग्रंथि की पत्नी या उस का नाम मुझे याद नहीं लेकिन वोह घर के सदसय की तरह हो गए थे।

एक दफा दादा जी ने अखंड पाठ अपने घर में रखवाया। पाठी सिंह एक तो यह ग्रंथि ही था और तीन बाहिर से आये थे। हर ग्रंथि को दो दो घंटे लगातार पाठ करना होता था, इस के बाद दूसरा ग्रंथि दो घंटे पाठ करता था। इस तरह यह सिलसिला तीसरे दिन तक चलता रहता था। कुछ घंटे ग्रंथिओं की सेवा करना मेरा और मेरे दोस्त जीत सिंह का काम था। उस वक्त गाँव में अभी बिजली नहीं आई थी और ना ही कोई टॉयलेट होती थी । दो ग्रंथिओं ने  रात को जंगल पानी  जाने की इच्छा ज़ाहिर की तो मैं और जीत उन को बाहिर खेतों में ले जाने के लिए तैयार हो गए। यह मेरा दोस्त अब मुंबई  में रहता है। जीत बहुत शरारती लड़का था। एक ग्रंथी शरीर का बहुत कमज़ोर, उस की मूंछें ऊपर को और दाड़ी के वाल बहुत कम, बस कार्टून लगता था। यह ग्रंथी बातें बहुत करता था और अपने को बहुत बहादुर समझता था। जीत कहने लगा, भाई जी ! अँधेरे में यहां कभी कभी सांप भी आ जाते हैं, जरा बच के रहना। ग्रंथि कहने लगा,” ओ जी तुम फ़िक्र क्यों  करते हो, हम तो सिंह हैं, हम शेरों  का मुकाबला कर सकते हैं , यह सांप क्या चीज़ हैं “. हमारी गली के आखिर में हमें पीपल के बृक्षों के बीच में हो कर जाना होता था और फिर मेरे दोस्त बहादर के खेत आ जाते थे।

अँधेरा बहुत था, हम ने कहा भाई जी तुम उन खेतों में बैठ सकते हो। जब वोह खेतों में जाने लगे तो जीत ने मेरे कान में कहा कि “यह भाई बातें बहुत करता है, इस को आज मज़ा चखाना है”. ग्रंथी अभी बैठे ही थे कि मुझे बता कर जीत ने ऊंची आवाज़ में कहा,” ओ मर गए ,सांप! ” . और हम एक तरफ दौड़ गए। दोनों ग्रंथि दौड़ कर कहाँ चले गए हमें पता नहीं चला। हम ऊंची ऊंची आवाज़ें देने लगे, भाई जी ! भाई जी !, लेकिन दोनों ग्रंथिओं का कोई पता नहीं चला। हम भी कुछ डर गए कि उन लोगों को क्या हो गिया। इर्द गिर्द खेतों में उन को ढूंढा लेकिन कहीं दिखाई ना दिए। फिर हम सोचते सोचते घर की ओर जाने लगे। जब हम घर पुहंचे तो दोनों ग्रंथि नल के पानी से अपने कपडे साफ़ कर रहे थे। जीत ने पूछा , भाई जी ! ” तुम दौड़ गए, किया हुआ, तुम तो शेरों  का मुकाबला करते थे”. ग्रंथि बोला, ओए सिंघो, इस जानवर से बचना चाहिये , यह बहुत खतरनाक है। हम इतना हँसे कि ग्रंथी कुछ शर्मिंदा हो गया।

एक दिन हमेशा की तरह मैं आहलूवालिओं के मोहल्ले की ओर गिया। गियान की दूकान पर पुहँचा तो देखा कि गुरदुआरे के आगे बहुत लोग जमा थे और आवाज़ें आ रही थी, इस के जूते लगाओ, इस का मुंह काला करो, इस को अभी निकाल दो। मैं जब वहां पहुंचा तो देखा , जो ग्रंथि मेरे ताऊ के घर रहता था उस को कुछ लोगों ने पकड़ रखा था। उसकी पगड़ी उस के गले में थी। लोग जो बातें कर रहे थे , मैंने सुना। लोग बोल रहे थे कि इस ग्रंथी ने सफाई वाली मिहतर लड़की को छेड़ा था। और मुझे कुछ नहीं पता लेकिन उसी दिन वोह दोनों पति पत्नी कहाँ चले गए मुझे पता नहीं लेकिन ग्रंथि की पत्नी का हमें बहुत दुःख हुआ ख़ास कर दादा जी को क्योंकि उन का इस लड़की से सनेह बहुत था।

इस के कुछ महीने बाद , इस गुरदुआरे में तीन नए ग्रंथी, उन की पत्नीआं और बच्चे आ गए। यह ग्रंथि रंग के सांवले थे लेकिन बातें बहुत करते रहते थे और अपने आप को तानसैन समझते थे। यह ग्रंथि हर सुबह को घरों से रोटीआं लेने आते थे। लोग दाल रोटी दही माखन आदिक दे देते  थे। मेरे पिता जी घर में ही थे और एक गियानी दाल रोटी लेने हमारे घर आया। इस को गजा करना कहते थे यानी ग्रंथी हर सुबह गजा करने आते थे। गियानी जी पिताजी को कहने लगे कि उन्होंने तबले में बहुत लोगों को हराया था। मेरे पिताजी क्योंकि क्लासिकल जानते थे, अंदर से हारमोनियम उठा लाये और बोले भाई जी ! राग पीलो ताल तलवाड़ा बजा कर जरा दिखाइए। भाई जी घबरा गए और टाल मटोला करने लगे। पिता जी हंस दिए। और फिर वोह कभी हमारे घर नहीं आया।

एक दिन गियान की दूकान के नज़दीक कुछ चहल पहल थी। लोग बातें कर रहे थे कि ग्रंथिओं की एक लड़की की शादी थी। जैसे गाँव में अक्सर होता है लोग ग्रंथिओं को  दूध दालें आटा चावल बगैरा दे रहे थे। दूसरे दिन बरात आनी थी। हम भी दूसरे दिन बरात को देखने  सोहन लाल की दूकान के आगे चले गए. तकरीबन दस वजे पंद्रां बीस लोग बराती आ गए।  दो के हाथों में राइफलें थीं। लोगों ने ग्रंथिओं के साथ मिल कर बरात को चाय पिलाई लेकिन सभी लोग हैरान थे कि जिस लड़की की शादी थी वोह कौन थी। ग्रंथि लोग कभी कुछ कह देते कभी कुछ। किसी को समझ नहीं आ रही थी कि यह हो किया रहा था। उधर लड़के वाले भी  जोर दे रहे थे कि लावां (फेरे ) जल्दी करो। ग्रंथी कहने लगे कि उन लोगों के रिवाज़ के मुताबिक़ लड़की बारह वजे से पहले आ नहीं सकती थी  और लड़की को रिश्तेदार के घर रहना पड़ता था।  बारह छोड़ एक दो वज गए लेकिन मामला गड़बड़ लगने लगा।

बराती लोग कुछ बदमाश लगते थे। उन्होंने राइफलें निकाल लीं और कहने लगे, या लड़की को लाओ नहीं तो वोह ग्रंथिओं की औरतें ले जाएंगे। दूर किसी ने देखा एक थानेदार और कुछ सिपाही साइकलों पर जा रहे थे। एक आदमी दौड़ कर उन को बुला लाया। सारी पुलिस सोहन लाल की सर्जरी के आगे चारपाईओं पर बैठ गई। ग्रंथिओं को बुलाया गिया और उधर दूल्हा और उन के भाई बैठे थे। अब सारी बात पता चल गई। यह ग्रंथि लोग जब किसी गाँव में जाते, नाटक रचाते, एक लड़की जो बदचलन थी , इन ग्रंथिओं का उन के साथ समझौता था। यह ग्रंथि लोग उस को अपनी लड़की बता कर बेच देते थे। कुछ दिन वोह लड़की दूल्हे के घर रह कर गहने रूपए ले कर भाग आती थी और फिर इस को कहीं और बेच देते थे। कुछ पैसे लड़की रख लेती कुछ पैसे यह लोग रख लेते। कुछ देर से  यह लोग लड़की से हेरा फेरी करने लगे थे  जिसका बदला लड़की ने इस तरह लिया कि वोह वादा करके आई ही नहीं।

जब थानेदार को सारी बात का पता चला तो बहुत गुस्से में आ गिया। थानेदार पक्का सिंह था और गरज कर बोला” ओए तुम सिंह हो कर यह काम करते हो? तुम लोग सिखों का नाम बदनाम करते हो ?” उस ने ग्रंथिओं को  इतना पीटा कि वोह चीख चिहाड़ा पाने लगे। मुझे अभी तक याद है, दो औरतें जो किसी और गाँव की थीं , एक औरत दुसरी को कहने लगी,” हाए हाए ,यह तो वोही ग्रंथि हैं जिन्होंने हमारे गाँव में लड़की बेचीं थी “. हाए हाए वे, तुम्हारा सत्यानाश हो जाए, तुम धर्म को बदनाम करते हो !  उन की बात सुन कर थानेदार ने उन को जमींन पर फैंक कर उन के ऊपर खड़ा हो कर पैरों से मसलने लगा। यह लड़की उन्होंने १२०० रूपए में बेचीं थी। अब ग्रंथि कहने लगे,” जी हमारे पास इतने पैसे नहीं हैं, हमारा साइकल ले लो, कुछ गहने हैं, एक गाए है, वोह ले लो”. इसके बाद दूसरे दिन बहुत बातें सुनने को मिलीं। मैं तो बहुत छोटा था , उस वक्त सारी बातों को समझने में असमर्थ था लेकिन इन बातों का असर मुझ पर कुछ वर्षों बाद पड़ना शुरू हो गिया। जब हम शहर में पड़ने लगे तो मुझ में अजीब तबदीली आणि शुरू हो गई थी।

चलता……

परिचय - गुरमेल सिंह भमरा लंदन

१९६२ में बीए फाइनल की पढ़ाई छोड़ कर इंग्लैण्ड चले गए. लन्दन में निवास कर रहे हैं. किताबें पढने और कुछ लिखने का शौक बचपन से ही रहा है। पिछले १३ वर्ष से रिटायर हैं और बोलने में कठिनाई की समस्या से पीड़ित हैं. पांच वर्ष से रेडिओ एक्सेल बर्मिंघम को कहानियाँ भेज रहे हैं. 'जय विजय' के लिए लघु कथाएँ लिखते हैं. संस्मरण लिख रहे हैं.

7 thoughts on “मेरी कहानी – 30

  1. आदरणीय बहुत बढ़िया यथार्त कहानी के लिए आभार

    1. राज किशोर जी , मेरी कहानी पसंद करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद . जिंदगी में जो देखा और अनुभव किया है ,लिख रहा हूँ . देखा तो बहुत कुछ है ,जैसे हर शख्स के जीवन की घटनाएं होती हैं लेकिन मुझे इतना नहीं मालूम था कि जब यह सब लिखित रूप में होगा तो ऐसा हो जाएगा कि मुझे खुद भी विशवास नहीं होगा कि यह सब कुछ हुआ है ?

  2. नमस्ते महोदय। आज आपने टोटकों और ग्रंथिओं के अनुचित आचरण की चर्चा की है। मैं भी बचपन में ९ – १० वर्ष की आयु में एकबार टोटके का शिकार हुआ हूँ। प्रातः काल कुछ अँधेरा था। आगे जाने पर लगा कि मेरा पैर टोटके पर पड़ गया है। सुने हुवे विचारों के कारण किसी अनिष्ट की आशंका हुई। बाद में बीमार हुआ। डॉक्टरों की दवा व इंजजेक्शन आदि से लाभ नहीं हुआ। फिर एक तांत्रिक से मेरी माता जी ने बात की। उन्होंने कहा कि हमारे मृतक पितर असंतुष्ट या नाराज है। हरिद्वार जाकर पूजा कराओ। माता जी ने पिताजी को बताया। उन्होंने अगले दिन हरिद्वार जाने का निश्चय किया। मैं उसी समय से ठीक होने लगा और कुछ ही दिन में पूरी तरह से ठीक हो गया। आज मैं इन बातों को कतई नहीं मानता। शायद मेरे बीमार होने का मुख्य कारण कुछ मनोवैज्ञानिक रहा हो। शास्त्रों में कहा है कि मनुष्य अज्ञान व स्वार्थ में फँस कर पाप करता है। यह न केवल ग्रंथि अपितु सभी मतों व धर्मों को मानने वाले लोग करते है और अज्ञानी, भोले भाले, सज्जन प्रकृति के लोग इनके शिकार हो जाते हैं। इसके लिए मनुष्यों को सद्ग्रन्थों का स्वाध्याय करना चाहिए, उससे कुछ लाभ हो सकता है। आपकर हार्दिक धन्यवाद।

    1. मनमोहन भाई , जो आप के साथ हुआ वोह हम अपने बजुर्गों से इनहैरिट करते हैं किओंकि वोह खुद भी इस अन्ध्विशास में ग्रस्थ होते हैं . पुराने समय में तो माना लोग इतने पड़े लिखे नहीं होते थे लेकिन आज हम सब पड़ लिख गए हैं और इन बातों को अलविदा कह देना चाहिए लेकिन दुःख इस बात का कि डाक्टर वकील नेता लोग भी इस अंधविश्वास में फंसे हुए हैं जो बहुत दुखद बात है . जो बाबे जिओतिशी हैं वोह इन लोगों पर ही नज़र रखे हुए होते हैं . सारी उम्र मैंने किसी को भी अपना पैसा नहीं दिया , सिर्फ दिया है तो पिंगलवाड़ा अमृतसर को दिया है किओंकि वहां मेरे मामा जी ने भी काम किया है जो एक रिटायर्ड एस डी ओ थे . वहां अपाहज लोगों को बहुत अच्छी तरह रखा जाता है , और या मैंने ३० वर्ष तक सेव दी चिल्ड्रन चैरिटी को दिया है . मेरी मिसज़ भी ऐसे ही काम करती है . जिंदगी में कभी भी हमने धार्मिक समागम नहीं करवाया . उन लोगों से हम ज़िआदा खुश हैं जो धार्मिक पखंड करते हैं .

      1. धन्यवाद महोदय जी। आपके विचारों को पढ़कर मैं कृत्यकृत्य हुआ। स्नेहकांशी।

  3. विजय भाई , सच को छुपाना बहुत बुरी बात है . मैं नहीं कहता कि सभी धार्मिक लोग बुरे हैं लेकिन जो मुझे बुरे दिखाई दिए उन का चेहरा दिखाना मैं अपना फ़र्ज़ समझता हूँ . श्रधावश धार्मिक आगुओं के दोष छुपाना भी एक जुर्म है . मुझे अछे लोगों से भी मिलने का अवसर मिला जिस से उन के बच्चों ने तो कुछ नहीं सीखा लेकिन हमें बहुत कुछ मिल गिया , इसी लिए उन के जाने के बाद अब तक उन्हें याद करते हैं . उचित समय आने पर मैं अभी बहुत कुछ लिखूंगा .

  4. बहुत खूब, भाई साहब. आपने ग्रंथियों की मानसिकता का बहुत अच्छा वर्णन किया है. सांप वाली शरारत को पढ़कर मजा आ गया.
    हमारे पोंगा पंडितों का हाल भी इससे अलग नहीं है. पूजा-पाठ का ढोंग करना और उसकी आड़ में तमाम तरह के कुकर्म करना आम बात है.

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