धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

मेरे स्वप्नों का गुरूकुल

ओ३म्gurukul

महर्षि दयानन्द ने जिस शिक्षा पद्धति का समर्थन किया है वह गुरूकुल शिक्षा पद्धति है। महर्षि दयानन्द सुसंस्कारों व ज्ञान-विज्ञान से युक्त आधुनिक शिक्षा के भी समर्थक थे परन्तु इसके साथ ही वह वेद व वैदिक साहित्य के ज्ञान को सारे विश्व के लिए अपरिहार्य मानते थे। वेद और वैदिक ज्ञान से ही मनुष्य की अज्ञानता का नाश होता है और विद्या की वृद्धि होती है। ऐसा मनुष्य ही अन्धविश्वासों, कुरीतियों व सामाजिक बुराईयों से बच सकता है अन्यथा अनुभव से यह देखा गया है कि वेदेतर ज्ञानी व्यक्ति भी अन्धविश्वासों व अज्ञान की बातों से ग्रस्त रहते हैं। हमने भी आधुनिक शिक्षा की कुछ सीढि़यां चढ़ी है और अनुमान व अनुभव से भी इसका कुछ ज्ञान हमें हुआ है। हमारा मन व आत्मा यह स्वीकार करती है कि महर्षि दयानन्द का दृष्टिकोण, मान्यतायें व सभी सिद्धान्त सत्य व यथार्थ हैं व संसार में इनका प्रचार व प्रसार हो जिससे संसार से अज्ञान, अन्धविश्वास, कुरीतियों व सामाजिक बुराईयों का अन्त किया जा सके। मत-मतान्तर यह कार्य नहीं कर सकते। अनुभव बताता है कि मत-मतान्तर सद्धर्म व विद्या के प्रचार में बाधक हैं। अतः महर्षि दयानन्द द्वारा प्रदर्शित मत-मतान्तरों में विद्यमान बुराईयों को भी वेद व सद्धर्म के प्रचार से दूर करना है। यह दुःख व खेद की बात है कि यह कार्य आर्यसमाज को करना था परन्तु इसका संगठन इन दिनों अत्यन्त दुर्बल अवस्था में है जिसके कायाकल्प की आवश्यकता है। ईश्वर की कृपा से आने वाले समय में अवश्य ही इसमें सुधार होगा, ऐसी आशा हम सभी को करनी चाहिये।

महर्षि दयानन्द वेदों व वैदिक साहित्य के साथ आधुनिक विषयों के अध्ययन के पक्षधर तथा गुरूकुलीय शिक्षा प्रणाली के प्रबल समर्थक थे। इस सम्बन्ध में उन्होंने अपने विचारों का प्रकाश सत्यार्थप्रकाश के तीसरे समुल्लास में किया है। उनका मानना था कि गुरूकुल नगरों व ग्रामों से पर्याप्त दूरी पर हों जहां का वातावरण शुद्ध, पवित्र और शान्त हो। गुरूकुल में ब्रह्मचारियों को उपनयन व वेदारम्भ संस्कार करके प्रविष्ट किया जाये। शिक्षा का आरम्भ संस्कृत व्याकरण की पुस्तकों से हो। बच्चों की आयु व योग्यतानुसार उन्हें अष्टाध्यायी, महाभाष्य-निरूक्त प्रणाली में निपुण किया जाये जिससे समस्त वैदिक साहित्य का वह सुगमतापूर्वक अध्ययन, अध्यापन व प्रचार कर सकें। गुरूकुलों में महर्षि दयानन्द की मान्यताओं के अनुसार प्रातः सायं सन्ध्योपासना व अग्निहोत्र यज्ञ भी होता है जिससे वहां का वातावरण पवित्र बनता है। महर्षि दयानन्द के प्रयाण के बाद के 132 वर्षों में आर्यसमाज व उनके अनेक अनुयायियों ने अनेक गुरूकुलों की स्थापना की जिनका संचालन देश के अनेक भागों में हो रहा है। वर्तमान समय में स्वामी प्रणवानन्द सरस्वती 8 गुरूकुलों की स्थापना व संचालन कर अपनी पूरी शक्ति से महर्षि दयानन्द के स्वप्न को साकार बनाने में लगे हुए हैं। इनके व अन्य गुरूकुल में अध्ययनरत ब्रह्मचारी व ब्रह्मचारिणी वैदिक विद्या व ज्ञान से सम्पन्न होकर स्नातक बन रहे हैं व जीवन के अनेक क्षेत्रों में कार्यरत हैं। क्या इतना होना ही पर्याप्त है? हमें लगता है कि इतना होना पर्याप्त नहीं है। इन स्नातक ब्रह्मचारियों पर महर्षि दयानन्द के स्वप्नों को साकार करने का दायित्व है जो कि पूरा नहीं हो रहा है। अतः गुरूकुल प्रणाली पर विस्तार से विचार कर लक्ष्य प्राप्ति में आ रही बाधाओं को दूर करना वर्तमान समय का मुख्य उद्देश्य है।

महर्षि दयानन्द ने अपना व अपने द्वारा स्थापित आर्यसमाज आन्दोलन का मुख्य उद्देश्य वेदों का प्रचार व प्रसार निर्धारित किया। आर्यसमाज के तीसरे नियम में उन्होंने विधान किया है कि ‘‘वेद सब सत्य विद्याओं का पुस्तक हैं। वेद का पढ़ना पढ़ाना और सुनना सुनाना सब आर्यों का परम धर्म है।” इसका अर्थ यह हुआ कि गुरूकुल के ब्रह्मचारियों को वेद प्रचार के कार्यों में लगना व लगाना है। ऐसा सम्भवतः नहीं हो रहा है और यदि हो रहा है तो बहुत ही अल्पांश में हो रहा है। कुछ गुरूकुल के स्नातक शिक्षा पूरी करके आर्यसमाजों में पुरोहित बन कर कार्य करते हैं जिससे आर्यसमाज के उद्देश्य की कुछ मात्रा में पूर्ति होती है। यह लक्ष्य आर्यसमाज के चरम लक्ष्य ‘‘कृण्वन्तों विश्वमार्यम्” अर्थात् संसार को गुणकर्मस्वभाव में श्रेष्ठ बनाओं’ की तुलना में अत्यन्त अल्प है। गुरूकुल के स्नातक ब्रह्मचारियों को मोटे वेतन वाली नौकरियों के प्रलोभनों का त्याग कर महर्षि दयानन्द के स्वप्न को अपना स्वप्न बनाकर उसकी पूर्ति में लगना चाहिये। वह आर्यसमाज का समस्त साहित्य पढ़े, विश्वविद्यालयों एवं पुस्तकालयों में संस्कृत की प्राचीन पाण्डुलिपियों को देखें, उपयोगी पाण्डुलिपियों के हिन्दी अनुवाद प्रस्तुत करें और ग्रामों व नगरों में जन-जन में वैदिक विचारधारा को व्यवहृत करने के लिए एक-एक परिवार में जाकर उनमें विश्व के कल्याणार्थ वैदिक विश्व-वरेण्य धर्म व संस्कृति का प्रचार करें। हमारा मानना है कि यदि गुरूकुल के योग्य स्नातक ब्रह्मचारी त्याग व समर्पण की भावना से महर्षि दयानन्द व आर्यसमाज के उद्देश्य को पूरा करने के लिए प्रयास करेंगे तो इससे उनका स्वयं का भी धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष सिद्ध होगा, वह ऋषि व आर्यसमाज के ऋण से उऋण होंगे और इससे देश व समाज को भी लाभ होगा। इसके विपरीत देखने में यह आ रहा है कि अधिकांश ब्रह्मचारी सरकारी नौकारी की तलाश करते हैं। इच्छित नौकरी उन्हें प्राप्त हो जाने पर वह घर व परिवार के होकर ही रह जाते हैं। उनसे आर्यसमाज व देश को जो अपेक्षायें होती है, वह पूरी नहीं होतीं। हमने पाया है कि इससे इन गुरूकुल के संचालकों को भी हार्दिक व मानसिक पीड़ा होती है जिसे वह अपने कुछ विश्वसनीय मित्रों से यदा-कदा कह कर अपना मन हल्का करते हैं।

अतः गुरूकुल कैसा हो? इसका हमें उत्तर मिलता है कि गुरूकुल ऐसा हो जहां आचार्यगण ब्रह्मचारियों को  महर्षि दयानन्द के जीवन के प्रेरक प्रसंग सुनाया करें और ब्रह्मचारियों को उनके बताये मार्ग पर चलने व उनके लक्ष्यों को पूरा करने का संकल्प दिलाया करें। गुरूकुल में भले ही विद्यार्थी कम हों परन्तु यह ध्यान रखना चाहिये कि गुरूकुल में अध्ययन कर विद्यार्थी दयानन्द, राम, कृष्ण, चाणक्य, गौतम, कपिल, कणाद, पतंजलि, व्यास आदि की तरह धर्म संस्कृति के रक्षक, प्रचारक सेवक बनें। यदि ऐसा नहीं करेंगे तो यह 2 अरब वर्षों चली इस रही वैदिक धर्म व संस्कृति हमारे आलस्य व प्रमाद के कारण समाप्त हो सकती है। इसको नष्ट करने वाले शत्रुओं की संसार में कमी नहीं है। उनके पास जन-धन-बल व कुत्सित इरादें आदि सभी कुछ हैं। हम जानबूझकर ही उससे अनभिज्ञ हो रहे हैं। महर्षि दयानन्द गुरू विरजानन्द ने इसे समझा था तथा अपना पूरा जीवन इसके लिए आहूत किया था। हमारे गुरूकुलों के ब्रह्मचारियों को अपना जीवन व चरित्र उच्चतम व आदर्श बनाने का ध्यान रखना चाहिये और आचार्यों को भी स्वयं महान चरित्र का परिचय देकर ब्रह्मचारियों को उत्तम चरित्र सहित वैदिक ज्ञान से सम्पन्न व समृद्ध करना चाहिये। जिस गुरूकुल से महर्षि दयानन्द जैसे ब्रह्मचारी विद्या में निष्णात् होकर निकलेंगे और महर्षि दयानन्द के जीवन व लक्ष्यों को अपने जीवन का लक्ष्य बनायेंगे, वही गुरूकुल वस्तुतः हमारे स्वप्नों का गुरूकुल होगा। यदि ऐसा नहीं होता है तो हम समझते हैं कि गुरूकुल अपने उद्देश्य की पूर्ति में आंशिक सफल व आंशिक असफल हैं। महर्षि दयानन्द के मिशन में सक्रिय ऐसे गुरूकुलों को सभी आर्यसमाजों व धर्म-प्रेमियों को भी हर प्रकार का भरपूर सहयोग करना चाहिये। हम आशावान हैं और हम अनुभव करते हैं कि ईश्वर की कृपा से भविष्य में अवश्य ही किसी गुरूकुल का कोई स्नातक महर्षि दयानन्द की तरह ही विद्या व ज्ञान से परिपूर्ण होकर उनकी भावनाओं व लक्ष्यों के अनुरूप इच्छा व लक्ष्यवाला बनकर निकलेगा और आर्यसमाज ही नहीं अपितु समाज व देश का कल्याण करेगा। यह कार्य तभी सम्पन्न होगा जब हमारा प्रयास इसके लिए होगा और ईश्वर की कृपा हमें प्राप्त होगी। इसके साथ ही हम लेख को विराम देते हैं।

मनमोहन कुमार आर्य

 

परिचय - मनमोहन कुमार आर्य

नाम मन मोहन कुमार आर्य है. आयु ६३ वर्ष तथा देहरादून का निवासी हूँ। विगत ४५ वर्षों से वेद एवं वैदिक साहित्य सहित महर्षि दयानंद एवं आर्य समाज के साहित्य के स्वाध्याय में रूचि है। कुछ समय बाद लिखना आरम्भ किया था। यह क्रम चल रहा है। ईश्वर की मुझ पर अकथनीय कृपा है।

4 thoughts on “मेरे स्वप्नों का गुरूकुल

  1. मनमोहन भाई , लेख अच्छा लगा . मैं समझता हूँ कि मैजूदा ज़माने में बडती हुई मैह्न्घाई और चकाचौन्द कर देने वाली गाड़ी को देख कर हर कोई ज़िआदा से ज़िआदा पैसा कमाना चाहता है . हर कोई अच्छी से अच्छी नौकरी पाना चाहता है . फिर सवाल यह पैदा होता है कि किया सुआमी दयानंद जी का सपना कैसे पूरा होगा ? मेरा विचार है कि पहले तो हर् सकूल में वेदों की शिक्षा के लिए क्मज्क्म एक पीरीअर्ड होना ही चाहिए , दूसरा जैसे हिंदी संस्कृत और दुसरी रीजनल भाषाओं के कोर्स्ज़ हैं ,ऑप्शनल होने चाहिए . किसी का मन करे पड़े , किसी का ना करे ना पड़े . मेरा मानना है कि बहुत से विदिआर्थी पड़ना चाहेंगे . धीरे धीरे लोगों की दिलचस्पी बडती जायेगी . इस स्लो प्रौसिस से जागरूपता बढेगी .

    1. नमस्ते एवं धन्यवाद महोदय। आपकी सभी बातें सत्य हैं। अधिकांश मनुष्य धन दौलत व काम आदि एषणाओं में बन्धे व फंसे हुए हैं। आपका सुझाव बहुत ही प्रशंसनीय है परन्तु सरकार पहले तो ऐसा करेगी नहीं और करेगी तो देश भर में बावेला हो जायेगा। वन्देमातरम् व राष्ट्रीय गान भी सभी देशवासी मिलकर गाने को सहमत नहीं है। काश, कि विद्यार्थी जीवन में आपशनल ही सही, यह सुविधा उपलब्ध होती। सत्य को स्वीकार न करने में अविद्या, हठ व दुराग्रह मुख्य कारण होते हैं। जब तक संसार के सभी मतों के मनुष्य अपने मन से सत्य का ग्रहण व असत्य का त्याग करने के सिद्धान्त को स्वीकार नहीं करेंगे, संसार की सामाजिक व राजनैतिक समस्यायें हल नहीं हो सकती। ईश्वर यथासमय इस कार्य में सहायता करेंगे। हमें तो अपना कर्तव्य करना है। कोई भी किया हुआ कर्म कभी व्यर्थ नहीं जाता। हम जो भी कर्म करते हैं उसका यथासमय असर अवश्य होता है। इसी कारण शायद सभी लोग अपने मन व आत्मा की प्रेरणा से कार्य करते हैं। सत्य की ही विजय होती है असत्य की नहीं, यह भी भारत दर्शनों का निचोड़ है अर्थात् ‘सत्यमेव जयते।’।

  2. बहुत अच्छा लेख. आधुनिक शिक्षा के युग में भी गुरुकुलों की बहुत आवश्यकता और प्रासंगिकता है.

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