इतिहास

 टिहरी गढ़वाल से प्राप्त कुषाण कालीन स्वर्णिम मुद्राएँ

भारतीय इतिहास में सर्वप्रथम स्वर्णिम मुद्राएँ प्रचलित करने का श्रेय कुषाण शासक विम कद्फिसेज़ को है| कालान्तर में उसके उत्तराधिकारियो ने भी स्वर्णिम मुद्राओं के प्रचलन की परम्परा को अक्षुण्ण रखा| कुषाणों का साम्राज्य पश्चिमोत्तर में अफगानिस्तान से लेकर पूर्व में बिहार, उड़ीसा राज्यों तक तथा उत्तर में चीन से लेकर दक्षिण में गुजरात व मध्य प्रदेश के कुछ भूभागों तक विस्तृत था| लगभग दो शताब्दियों तक के विशाल शासनकाल के पश्चात् उक्त मुद्रा –निर्माण की कला का अनुकरण करना साम्राज्यवादी गुप्त शासकों के लिए भी स्वाभाविक रहा|images

उत्तराखंड राज्य में टिहरी गढ़वाल ज़नपद में नरेन्द्रनगर नामक स्थान से वर्ष १९७२ में निर्माण –कार्य के दौरान एक धातु –मंजूषा  से कुषाण शासकों की स्वर्णिम मुद्राओं की निखात निधि प्राप्त हुई है जिनमे` ४४ सिक्के हुविष्क के तथा ०१ सिक्का वासुदेव का है| इसके अतिरिक्त उक्त उक्त पात्र से ०५ स्वर्णिम आभूषण भी प्राप्त हुए हैं| ये समस्त पुरावशेष राज्य संग्रहालय, लखनऊ में संग्रहीत हैं| विवेच्य लेख में उक्त मुद्राओं के मुद्राशास्त्रीय अनुशीलन पर प्रकाश डालने का प्रयास किया गया है|

हुविष्क [१०४ई.पू.-१३८ई.पू.] ने हमारे देश पर लगभग ३४ वर्षों तक शासन किया था| उसकी मुद्राओं के अग्रभाग पर सम्राट की आवक्ष आकृति है| इसमें शासक ने रत्न जटित वस्त्र व ऊँची या चपटे सिरवाली अलंकृत शिरोभूषा धारण कर रखी है| उसके हाथ में साम्राज्य के शासन का सूचक राजदंड है और यूनानी भाषा में मुद्रालेख ‘शाओ नानो शाओ ओवेष्की कोशानो ‘ उत्कीर्ण है| पृष्ठभाग पर कनिष्क की मुद्राओं की भांति भारतीय यूनानी और ईरानी देवी-देवताओ की आकृतियाँ हैं| यूनानी भाषा में उनके नाम माईरो, माव, अथशो, फैरो, नना, अरदोक्षो तथा ओईशो आदि अंकित किये गये हैं| उक्त मुद्राएँ गोंलाकार हैं तथा इनका औसत भार ७.९३ ग्राम है| [ मुद्रा –निर्माण की दृष्टि से हुविष्क का शासनकाल समृद्धि की पराकाष्ठा पर था|PicsArt_1433426767636

वासुदेव [१४५ई .-१७६ ई.] ने भारत पर लगभग ३१ वर्षों तक शासन किया था| इसकी  मुद्रा के अग्रभाग में लम्बा कोट, पायजामा व टोप धारण किये हुए, बायें हाथ में त्रिशूल लिए हुए और दाहिने हाथ से यज्ञकुंड में आहुति देते हुए राजा की वाममुखी आकृति अंकित की गयी है| किनारे की ओर यूनानी भाषा में आलेख ‘शाओ नानो शाओ वाजदो कोशानो ‘ उत्कीर्ण है| पृष्ठभाग पर त्रिशूल तथा पाश लिये हुए द्विभुजी शिव की आकृति है तथा इसके पीछे नन्दी प्रदर्शित है और यूनानी भाषा में ‘आएशो ‘[शिव] उत्कीर्ण है| उक्त मुद्रा गोलाकार है तथा इसका भार ८.०० ग्राम है| वासुदेव की मुद्राओं पर कनिष्क और हुविष्क की मुद्राओं की भांति विभिन्न धर्मों के देवी –देवताओं को पर्याप्त संख्या में अंकित नहीं किया गया है| इसकी मुद्राओं के पृष्ठभाग पर मात्र तीन ही देवताओं —शिव, अरदोक्षो और नना—का अंकन मिलता है|

उपर्युक्त स्वर्णिम मुद्राओं के सम्बन्ध में उल्लेखनीय है कि कुषाणकाल में भारत व रोम के मध्य व्यापारिक सम्बन्ध अत्यन्त प्रगाढ़ थे| रोम से भारत में स्वर्ण का आयात पर्याप्त मात्रा में होता था| उस युग में स्वर्ण मुद्राओं का प्रयोग अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के लिये किया जाता था|

_वेद प्रताप सिंह

३ /५४ नवीन सचिवालय कालोनी, केदारपुरम, देहरादून [उत्तराखंड], दूरभाष ९८९७३९२२१४

परिचय - वेद प्रताप सिंह

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