संस्मरण

मेरी कहानी – 31

हमारे गाँव राणिपुर के पश्चिम की ओर चार किलोमीटर की दूरी पर एक गाँव है जिस का नाम है तल्ह्न. जब की बात मैं कर रहा हूँ उस वक्त यहाँ कोई ख़ास गुरदुआरा नहीं होता था. सिर्फ एक छोटे से कमरे में गुरु ग्रन्थ साहिब की बीड जो सिखों का धार्मिक ग्रन्थ है होती थी और एक ग्रंथि पाठ करता रहता था. एक ओर बहुत छोटा सा कमरा होता था जिस में एक जोत जलती रहती थी. हर रविवार को दूर दूर के गाँवों से लोग आया करते थे. जिन लोगों ने कोई मानता मानी होती थी मानता पूरी होने के बाद वोह यहाँ आते रहते थे लेकिन वैसे भी लोग श्रधा के कारण आते रहते थे. इस जगह को शहीद सिंघों की जगह बोलते थे. कोई पैसे लाता, कोई मठाई लाता, कोई दूध घी बगैरा और जोत वाले छोटे से कमरे में खड़े गियानी जी को दे देता जो हमेशा वहां खड़ा होता था. गियानी जी शर्धालू से उस की लाई हुई चीज़ रख लेते  और कोई शलोक पड़ने लगते।  कुछ मिनट पड़ने के बाद गियानी जी शर्धालू को परसाद देते. गुरदुआरा और यह छोटी सी जोत वाली जगह तो इतनी नहीं थी लेकिन बाहिर बैठने के लिए जगह बहुत थी जो खुले आसमान के नीचे ही थी लेकिन इस जगह पर दो तीन बहुत बड़े बोहड़ और पीपल के वृक्ष होते थे जिस से बारिश के दिन कुछ बचाव हो जाता था. बैठने के लिए इंटों का फर्श होता था. राणिपुर से यहाँ पहुँचने के लिए कोई ख़ास रास्ता नहीं होता था, सिर्फ पगडंडी ही होती थी जो खेतों के बीच में होती थी. तल्ह्न जाने के लिए हमारे राम सर वाले खेतों से हो कर जाना होता था और आगे नदी आती थी जिस में इतना पानी होता था कि हम आसानी से इस को पार कर लेते थे. जब बरसातों में बाड़ आ जाती थी तो इस को पार करने के लिए एक कश्ती वहां बाँधी होती थी और एक आदमी वहां होता था जो नदी को पार करा देता था. लोग उस को कुछ पैसे दे देते थे.

इस शहीदों की जगह के बाहिर बहुत बड़ा खुला मैदान होता था जिस में पीपल और बोहड़ के वृक्ष बहुत होते थे. हर वर्ष गर्मिओं के दिनों में बहुत बड़ा मेला लगता था जिस में बड़े बड़े रागी और ढाडी जथे जो सारंगी और छोटे डमरुओं के साथ ऊंची आवाज़ में गाते थे आया करते थे. हज़ारों की तादाद में लोग दूर दूर से आते थे और सुबह से शाम तक लंगर भी चलता रहता था. इस के बाद तीन चार बजे खुले खेतों में कुश्तिओं के मुकाबले होते थे. आखिर में पटके की कुश्ती होती थी जिस में बहुत बड़े पहलवान आते थे. पटका एक पीले रंग का कपडा होता था. जो पहलवान जीत जाता था उस को वोह कपडा देते और साथ ही बहुत पैसे और इनाम देते. १९५८ के बाद मैं २००३ में तल्ह्न गिया था. अब वहां बहुत शानदार गुरदुआरा बना हुआ है. मैं कोशिश कर रहा था कि कोई पुरानी जगह जान्ने वाली मिले लेकिन सिर्फ एक चीज़ ही पहचानने को मिली, वोह थी वोह छोटा सा कमरा जिस में जोत जलती रहती थी और उसी जगह जोत आज भी जलती रहती है. बाकी सब कुछ बदल गिया है. यहाँ कभी खुले मैदान हुआ करते थे अब खेत ही खेत हैं लेकिन गुरदुआरे की शान को चार चाँद लग गए हैं, बहुत सुन्दर जगह है. बचपन में बहुत दफा यहाँ आया था लेकिन कभी तल्ह्न गाँव के भीतर झाँक कर भी नहीं देखा था.

एक दिन एक लड़का जब स्कूल आया तो हम को बोलने लगा कि इस शुकरवार को तल्हन बहुत बड़ा मेला है। उस दिन छुटी तो है नहीं, इस लिए स्कूल से भाग कर ही जाना पड़ेगा। जाना तो सब चाहते थे लेकिन अपने मास्टरों का भी डर था। आखिर में पांच लड़कों ने फैसला कर लिया कि घरों से तो आएंगे लेकिन अपने बस्तों के बगैर क्योंकि बस्ते में किताबें बहुत होती थीं और इतना बोझ ले कर इतनी दूर जाना आसान नहीं था। सब ने पक्के वादे कर लिए कि शुकरवार को मेला देखने जाना है लेकिन किसी को पता न चले। दूसरे लड़कों को भी हम ने कह दिया कि किसी को बताना नहीं। शुक्रवार को जिस जगह हम ने इकठा होना था, मैं और तरसेम आ गए और दूसरे लड़कों का इंतज़ार करने लगे। तीन लड़के अभी तक नहीं आये थे। आखिर में स्कूल की घंटी भी बज गई और बाहिर खेलते लड़के स्कूल के अंदर चले गए और स्कूल के बाहिर जो शोर था, बिलकुल बंद हो गिया। मैं और तरसेम सोच में पड़ गए कि अब क्या किया जाए। इंतज़ार करते करते तकरीबन आधा घंटा हो गिया लेकिन वोह तीनों लड़के आये ही नहीं। अब मुसीबत यह थी कि अगर हम स्कूल जाते तो लेट होने के कारण हमें मास्टर हरबंस सिंह की सोटीआं खानी पड़तीं। मौजूस हो कर हम ने अकेले जाने का फैसला कर लिया। घर से हम एक एक दुवन्नी ले कर आये थे मेले में खर्च करने के लिए क्योंकि ज़्यादा तो हम को मिलता नहीं था।

जल्दी ही हम गाँव के बाहिर आ गए। हम में से कोई भी पहले अकेला तल्हन को नहीं गिया था, हमेशा बड़ों के साथ ही जाया  करते थे। जल्दी ही हम खेतों की पगडंडीओं में चलने लगे। कभी गन्ने के खेत आ जाते, कभी बाजरा कभी  ज्वार के खेत आ जाते।  चलते चलते हम हमारे राम सर वाले कुएं तक आ गए। गर्मी बड़ रही थी और प्यास भी लगी हुई थी, सो हम ने कुएं से पानी पिया और आगे बढ़ने लगे। जल्दी ही नदी आ गई। नदी के किनारों पर रेत ही रेत थी और नदी के बीच में एक बड़ी सी कश्ती जिस को बेड़ी कहते थे पड़ी थी। नदी में पानी बहुत कम  था, हमारे घुटनों के कुछ ही ऊपर था। हम पानी में घूमने लगे और कश्ती में बैठ गए। कुछ देर बाद तरसेम कहने लगा कि क्यों ना हम नहा लें। हम दोनों ने अपने कपडे उतारे और नदी में नहाने लगे। यहां यह भी बताना चाहूंगा कि यह नदी चहेरु के पुल  के नीचे से हो कर जाती है जो जी टी रोड पर बना हुआ है और यह जालंधर कैंट के नज़दीक है। बहुत देर तक हम नहाते रहे, फिर कपडे पाये और चलने के लिए तैयार हो गए। अचानक मैंने अपनी जेब में हाथ डाला तो पता चला कि मेरी दुअन्नी जो जेब में थी, अब है नहीं थी। चिंतत हो कर मैंने तरसेम को बोला कि “यार मेरी दुअन्नी कहाँ गई ?”. हम ने रेत में ढूंढ़नी शुरू कर दी। बहुत देर तक हम ढूँढ़ते रहे लेकिन दुअन्नी पता नहीं कहाँ गिर गई थी। दुअन्नी के बगैर मेरा जाने को दिल नहीं मानता था लेकिन किया करते। तरसेम कहने लगा कि उस के पास भी दुअन्नी थी और उस से काम चला लेंगे। मौजूस हो कर हम फिर तल्हन की और चल पड़े। मेले का मेरा मज़ा तो किरकिरा हो गिया। चलते चलते हम आगे भाखड़ीआना गाँव आ गए। भाखड़ीआंणे के बाद हम फिर खेतों में चलने लगे। उस के आगे एक रास्ता शुरू हो गिया जिस पर छकड़ों के पहिओं के निशान थे और दोनों और बेरीओं  के बृक्ष थे लेकिन बेर अभी कच्चे थे। जब आगे गए तो  तल्हण गुरदुआरा नज़दीक ही था  तो हम सोचने लगे कि मेले की आवाज़ तो आ ही नहीं रही थी जब कि आवाज़ें तो बहुत दूर से ही आणि चाहिए थी।

कुछ ही मिनटों में हम तल्हन गुरदुआरे पुहंच गए लेकिन वहां तो कोई आदमी ही नहीं था। हम हैरान परेशान हुए यहाँ छोटा सा कमरा था जिस में गुरु ग्रन्थ साहब की बीड़ रखी हुई थी वहां चले गए। एक आदमी था वहां। हम ने उस को पुछा कि आज मेला नहीं था ? तो वोह बोला कि मेला तो अभी दस दिन बाद रविवार को है। हम उदास हो गए। उस आदमी ने हमें बताशों का परसाद दिया। जब हम ने लंगर के बारे में पुछा तो वोह कहने लगा, लंगर तो सिर्फ रविवार को ही होता है। हम बहुत दुखी हो गए। फिर तरसेम कहने लगा,” यार ! तल्हण गाँव में मेरी एक दूर के रिश्ते की मासी है, एक दफा मैं गिया भी था, चल हम उस का घर ढूँढ़ते हैं “. गाँव गुरदुआरे के नज़दीक ही था,हम गाँव के बीच चले गए और तरसेम की मासी का घर ढूँढ़ते ढूँढ़ते एक जगह पुहंचे तो तरसेम बोला, “बस यही है”. घर के साथ ही बहुत लकडें पड़ी थी और कुछ किसान लोग वहां बैठे थे। दरअसल यह लोग तरखान थे और किसान लोग अपने खेती बाड़ी में काम आने वाली चीज़ें जैसे हल छकड़े यहां से रिपेअर कराते थे। हम भी जा कर वहां एक बड़ी लकड़ी पर बैठ गए। एक आदमी आरी से एक बड़ी लकड़ी को काट रहा था।

तरसेम ने मेरे कान में कहा, यही वोह आदमी है। कितने पागल थे हम ! न तो हम ने उस आदमी को सत  सिरी अकाल कहा, ना ही हम ने बताया कि हम कहाँ से आये थे। हो सकता है उस आदमी ने हम को पहचाना ही ना हो वरना ऐसा तो हो नहीं सकता था कि वोह हमें ना बुलाये। बहुत देर तक हम बैठे रहे। जब किसी ने भी हम को नहीं बुलाया तो तरसेम ने मेरे कान में वहां से उठ जाने को कहा। हम उठ कर बाहिर आ गए। तरसेम कहने लगा,” चल यार किसी दूकान से मेरे वाली दुअन्नी का कुछ खाने के लिए लेते हैं “. उस वक्त यह गाँव बहुत छोटा सा था और घुमते घुमते एक ही दूकान मिली, यहां भी मूंगफली के सिवाए कुछ और नहीं था। छोटी सी दूकान थी जिस में कुछ  पीपे पड़े थे जिस में दालें बगैरा पड़ी थीं। हम ने दुकानदार को दो आने की मूंगफली देने को कहा। उस ने तोल कर मूंगफली तरसेम की कमीज़ के आगे वाले पलड़े में डाल दी। मूंगफली ले कर जब हम दूकान से बाहिर हुए तो दुकानदार दौड़ा आया और बोला,” ओए हेरा फेरी करते हो ? यह दुअन्नी तो खोटी है। “. किया करते मूंगफली उस के पीपे में डाल दी और चुप चाप राणीपुर की और चल दिए।

अब हमारी हालत ऐसी थी कि हम से बोला नहीं जाता था अगर बोलते भी तो बची हुई शक्ति भी खत्म करने जैसी ही थी , भूख बहुत लगी हुई थी। जब वापिस हम बेरीओं  वाले रास्ते पे आये तो हम कच्चे बेर ही खाने लगे। जो बेर आते वक्त  हम कच्चे सोच कर छोड़ आये थे अब सवाद लगने लगे। बेर खा कर हम चलने लगे और वक्त भी जल्दी बीत रहा था और उधर सूर्य देवता भी हमें चितावणी दे रहा था। इस बात को ज़्यादा न लिखूं, जब हम घर पुहंचे तो सूर्य ढल चुक्का था और रात होने को थी। आते ही पहले माँ कड़क कर बोली,” कहाँ था तू, तेरा दादा जगह जगह घूम आया है, बोल कहाँ था तू ?. ” कुछ ही देर में दादा जी आ गए और लगे मुझे चपेड़ें मारने। झिड़कें और चपेड़ें खाने के बाद खूब रोटीआं भी खाईं और चारपाई पर बिस्तरे में सो गिया। माँ और दादा जी की सजा तो भूल गिया, अब मास्टर जी की सजा का डर सता रहा था। जब डरते डरते स्कूल पुहंचे तो स्कूल में पहले ही खबर ताज़ी थी। अब मास्टर जी ने हमारे दोनों के साथ किया वोह तो कोई अनहोनी नहीं थी। मुज़रिमों की तरह हम मास्टर जी के सामने पेश हुए तो संक्षेप में ही बताऊंगा कि हम को मुर्गा बनाया गिया। हमारी टांगों में दर्द और खिचाव इतना था कि वोह सजा कभी भूली ही नहीं। जब रहम की अपील मंजूर हुई तो वार्निंग मिल गई कि आगे से ऐसा किया तो सारा दिन टांगों के नीचे से कानों को हाथों से पकड़ना पड़ेगा यानी कि हमारा रोस्ट मुर्गा बन जाएगा।

यह कड़वी लेकिन बचपन की वोह यादें हैं जिन को भूलना असंभव है। जब मैं बोल सकता था तो १३ साल पहले मैंने रेडिओ पर खुद बोल कर यह घटना सुनाई थी और जो आस पास के गाँवों वाले लोग थे वोह सुन कर बहुत हँसे थे और उन के बहुत कॉमेंट आये थे।

चलता……

परिचय - गुरमेल सिंह भमरा लंदन

१९६२ में बीए फाइनल की पढ़ाई छोड़ कर इंग्लैण्ड चले गए. लन्दन में निवास कर रहे हैं. किताबें पढने और कुछ लिखने का शौक बचपन से ही रहा है। पिछले १३ वर्ष से रिटायर हैं और बोलने में कठिनाई की समस्या से पीड़ित हैं. पांच वर्ष से रेडिओ एक्सेल बर्मिंघम को कहानियाँ भेज रहे हैं. 'जय विजय' के लिए लघु कथाएँ लिखते हैं. संस्मरण लिख रहे हैं.

4 thoughts on “मेरी कहानी – 31

  1. बचपन की घटनाओं को रोचक अवं प्रभावशाली ढंग से प्रस्तत किया गया है। पढ़कर अच्छा लगा। धन्यवाद।

  2. यह क़िस्त पढ़कर मजा आया. घर वालों को बिना बताये इधर उधर हम भी चले जाते थे, लेकिन स्कूल से भागकर नहीं और गाँव के आसपास ही रहते थे, ज्यादा दूर नहीं जाते थे.

    1. विजय भाई, यह बचपन की शरारतें ही हैं , दरअसल मुझे पिता जी का ही डर होता था और वोह ज़िआदा बिदेस में ही रहते थे . माँ और दादा जी का इतना डर नहीं होता था .यह भी हम कैसे अपने आप चले गए मुझे भी समझ नहीं आती किओंकि मैं इतना भी शरारती नहीं होता था . बस किसी लड़के ने कहा और बगैर सोचे समझे तैयार हो गए .

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