संस्मरण

मेरी कहानी – 32

वैसे तो जीत सिंह बचपन से ही हमारे साथ पड़ता था लेकिन हमारी दोस्ती मिडल स्कूल में जा कर बहुत बड़ गई। जीत एक ऐसा लड़का था जो जनम से ही कॉमिडी टाइप था, हर वक्त लड़कों को हंसाता रहता और हाजर जवाब इतना कि कोई भी बात कर लो मुंह तोड़ जवाब देता था। तरसेम जल्दी ही स्कूल छोड़ गिया क्योंकि उस की नेतरहीन माँ का दिहांत हो गिया था और तरसेम के एक भाई अवतार और एक बहन तारो अभी छोटे थे। मेरा खियाल है कि हमारी मिडल स्कूल की पढ़ाई के बाद ही तरसेम की छोटी उम्र में ही शादी हो गई थी। अब मेरा बहादर और जीत का मेल जोल बड़ गिया था। छुटी के बाद हम गाँव में घुमते रहते। तरसेम के मोहल्ले के बाद कंबोज मोहल्ला शुरू हो जाता था। कंबोज लोग गाँव में सब से ज़्यादा थे। कंबोज मोहल्ले में भी एक गुरदुआरा था जिस में गुरुओं के दिन मनाया करते थे। इस गुरदुआरे में बड़े बड़े संगीतकार आया करते थे। कभी इस गुरदुआरे में कोई प्रोग्राम होता तो कभी आहलुवालिओं के मोहल्ले में कथा करने वाले आ जाते। कथा रामायण या कृष्ण जी की होती थी।

यों तो कथाकार आते ही रहते थे लेकिन एक मंडली आई थी जिस को पंडित सगळी राम की पार्टी कहते थे। यह जब कथा करते तो समय को बाँध देते थे। लोग बहुत धियान से सुनते थे। रोज रात को कथा होती थी। इस मण्डली में एक युवा लड़का था जो हारमोनियम बहुत अच्छा बजाता था और नागिन फिल्म की धुनें बहुत बजाया करता था और हारमोनियम पे बीन भी बजाया करता था। फिल्म तो अभी तक हम ने देखि नहीं थी लेकिन इस फिल्म के रिकार्ड शादिओं में अक्सर बजते ही रहते थे और एक आदमी जो फिल्मों का बहुत शौक़ीन था, उस ने यह फिल्म देख ली थी और गाँव आ कर नागिन फिल्म की बहुत बातें किया करता था। नागिन फिल्म जो हम ने बहुत बाद में देखि थी आधी ब्लैक ऐंड वाइट में थी और कुछ सीन कलर में थे और वोह आदमी फिल्म की बातें इस तरह मज़े ले ले कर बताया करता था कि हम हैरान हो जाते थे। वोह कहा करता था “ओ भाई, फिल्म में नरक स्वर्ग दिखाते हैं, स्वर्ग इतना सुन्दर है कि देख कर मज़ा आता है, और नरक में दरख्त भी सूखे हुए हैं”. अक्सर वोह काशी देखि मथुरा देखि, देखे तीरथ सारे बहुत मज़े ले ले कर बताया करता था।

सारे गाँव में हम घुमते रहते थे और एक शख्स से हम डरा करते थे, वोह था कंबोज मोहल्ले का संता सिंह जो एक मिलिटरी रिटायर्ड जवान था। वोह बूढ़ा था लेकिन सिहत से एक जवान जैसा ही था। ऊंचा लंबा, छाती सीधी करके चलता और हमेशा मिलिटरी की खाकी कमीज़ पहनता जिस के कन्धों पर पीतल के बड़े बड़े बटन होते थे. कोई हट्टा कट्टा साधू उस मोहल्ले में आ जाए उस को सवाल पूछता था कि वोह क्यों मांगता था। उस को कहता, “अगर तू ने रोटी खानी है तो मेरे साथ मेरे खेतों में चल, पहले काम कर, फिर तुझे रोटी मिलेगी वरना जूते मार मार कर तेरा बुरा हाल करूँगा”. यही वजह थी कि कोई मंगता या साधू इस मुहल्ले में आने से डरता था। संता सिंह का बहुत रोब होता था और कोई उन के सामने बोलने का हौसला नहीं रखता था। संता सिंह की गैर हाज़री में कोई कोई मंगता या साधू संत बुरी हरकत करता तो पता लगने पर उसका बुरा हाल करता।

एक दफा दो साधू सफ़ेद कपड़ों में गाँव में आ गए। संता सिंह कहीं गिया हुआ था। इन दो साधुओं में एक नेत्रहीन था और उस के हाथ में एक सितार थी। वोह दोनों गली गली घूम कर लोगों को उल्लू बना कर लूट रहे थे। उन्हों को पहले ही मालूम होता था कि किस घर में कोई बेटा नहीं है और वोह उस के घर चले जाते और कहते, “माई ! हमें गियान है कि आप का घर सूना सूना है, आप के घर में बेटे की किलकारियाँ नहीं हैं”. वोह इस्त्री हैरान हो जाती और उन को भीतर आने के लिए कह देती। भीतर आ कर जब वोह इस्त्री कुछ अनाज आटा ले कर आती तो एक साधू उस में से कुछ आटा ले कर हाथों से मसलता और उस इस्त्री को खाने के लिए कहता। जब इस्त्री वोह आटा मुंह में डालती तो आटा मीठा हो जाता। इस्त्री हैरान हो जाती कि संत महाराज के हाथ लगने से आटा मीठा हो गिया और वोह दोनों साधू जो मांगते इस्त्री दे देती। दरअसल उन साधुओं ने जेब में रखी हुई स्क्रीन को पहले ही हाथ लगाया होता था। स्क्रीन बहुत मीठी होती है और किसी भी चीज़ को हाथ लगाने से वोह चीज़ मीठी हो जाती है। इसी तरह उन्होंने बहुत घरों को लूटा और इस्त्रीओं से सोने के गहने तक ले लिए। एक घर मेरे दोस्त जीत की गली में था जिन के कोई बच्चा नहीं था। वोह दोनों साधू उस इस्त्री के घर चले गए और जाते ही बोले, बीबी ! तेरे घर बेटा होगा और उस का नाम भाग सिंह रखना। इस्त्री तो हैरान हो गई कि इन को कैसे पता चला कि उन के घर बेटा नहीं था। उस ने समझा कि उन के घर तो खुद भगवान चल कर आ गए थे। उस इस्त्री ने उन दोनों संतों के चरण धोये और रोटी बनाने लगी। रोटी खा कर उन दोनों ने जो कहा उस इस्त्री ने दे दिया।

अभी वोह दोनों साधू घर से बाहिर निकले ही थे कि ऊपर से संता सिंह अचानक आ गिया। जब वोह घर आया तो किसी ने उस को बता दिया था कि दो साधू गाँव में घूम कर लोगों को लूट रहे थे। मैं और जीत उस वक्त वहीँ थे। संता सिंह आते ही बोला, “रख दो यहां जो कुछ तुम ने लूटा है”. साधू जो देख सकता था गुस्से में बोला, “तू मनमुख कौन है जो धर्म कर्म के खिलाफ है ?”. संता सिंह ने बड़े जोर से उस के मुंह पर थपड मारा। यह देख कर वोह इस्त्री जिस के घर से आये थे, संता सिंह को बोलने लगी कि “तू संत लोगों का अपमान कर रहा है”. संता सिंह ने उस इस्त्री को कोई जवाब नहीं दिया और साधू को बोला, “निकालो सब कुछ जो तुम ने लोगों से लूटा है”. संता सिंह उन के कपडे जबरदस्ती उतारने लगा। बहुत लोग इकठे हो गए थे। जब कपड़े उतरने लगे तो लोग हैरान रह गए कि उन के कपड़ों में बहुत रूपए, नए कपडे और सोने चांदी के गहने थे। एक लड़के के हाथ से डंडा छीन कर संता सिंह दोनों को जोर जोर से मारने लगा। वोह कह रहे, “तुम हमारे बाप हो, हमें जाने दीजिये, हम कभी इस गाँव में नहीं आयेंगे”. सब कुछ छीन कर संता सिंह ने गुस्से में कहा, “भाग जाओ यहां से, फिर कभी तुम्हें देखा तो हल के आगे लगा कर खेत में हल चलाऊंगा”.

वोह दोनों रोते हुए जा रहे थे, हम सबी पीछे पीछे जा रहे थे। कुछ दूर जा कर सभी पीछे मुड़ने लगे और वोह दोनों रोते जा रहे थे। गाँव वाले संता सिंह के साथ बातें कर रहे थे कि एक ने कहा, संता सिंघा उन साधुओं के पास कोई वजाने वाली चीज़ थी, वोह ले लेते तो उन का काम हमेशा के लिए बंद हो जाता। संता सिंह बोला, “अरे यह तो मैंने सोचा ही नहीं “और उन के पीछे भागने लगा। हमारे लिए तो यह एक तमाशा ही था, हम भी साथ साथ भागने लगे। संता सिंह ने जल्दी ही उन को पकड़ लिया और सितार छीनने लगा। वोह छोड़ नहीं रहे थे। इस छीनने बचाने में वोह सितार टूट गई और संता सिंह ने उन्हें जाने दिया। संता सिंह रोज़ जपुजी साहिब का पाठ किया करता था और यह अक्सर खेतों से वापिस आते समय रास्ते में ही ऊंची ऊंची किया करता था। संक्रात को गुरदुआरे जाता और हर गुरपर्व में आगे बड़ कर काम करता और जरूरतमंदों की दिल खोल कर मदद करता, लेकिन वोह सख्त बहुत था और हट्टे कट्टे मंगतों और साधुओं को सीधा कर देता था, इस लिए इस मोहल्ले में इस तरह का कोई आदमी सोच समझ कर ही आता था।

इस घटना के बाद मैं और जीत, जीत के घर आ गए. जीत के घर भी मेरे बहुत अच्छे दिन गुज़रे हैं। जीत के पिता जी बहुत धार्मिक और गियानी पूर्ण सिंह जी कहलाते थे. जीत की माँ बहुत हंस मुख थी। जीत का एक बड़ा भाई था मलकीत और दो छोटी बहनें थी। जीत के घर हमारे कुछ और दोस्त भी आ जाते जिन में हरदयाल जिस को लाडी कहते थे आता ही रहता था। हमारा मीटिंग रूम अक्सर होता था एक ऐसा कमरा जिस में होता था घर का फालतू सामान और एक होता था एक पुराना ग्रामोफोन जिस का बक्सा लकड़ी का होता था और उस के आगे होता था बड़ा सा पीतल का स्पीकर जिन की फोटो रिकार्डों पर भी होती थी और उस के मुंह की ओर एक कुत्ता बैठा होता था, यह हिज़ मास्टर्ज़ वॉयस वालों का ट्रेड मार्क होता था। ज़ाहिर है यह ग्रामोफोन जीत के पिता जी ने अपनी जवानी के दिनों में खरीदा होगा। एक बॉक्स होता था रिकार्डों के लिए जिस में सब पुराने पुराने गीतों के रिकार्ड ही हुआ करते थे। यह रिकार्ड हम ने इतनी दफा सुन लिए थे कि बहुत से गाने हमें याद हो गए थे। बहुत से गाने तो पंजाबी के ही हुआ करते थे लेकिन कुछ हिंदी में भी होते थे। एक था, हम राम चन्दर की कथा सुनाते हैं ऐं ऐं ऐं, हम कथा सुनाते हैं। एक था, पल्ला मार के बुझा गई दीवा, अख नाल गल कर गई। इस गाने पर हम बहुत शुगल किया करते थे, कभी हम स्पीड को हाई कर देते, जिस से गाना इतना फास्ट होता कि जैसे कुकड़ों की लड़ाई हो रही हो, फिर बिलकुल ही स्लो स्पीड पर कर देते और हंसने लगते। क्योंकि रिकार्ड पुराने और घिसे हुए होते थे, तो कभी गाना ट्रैक पे अटक जाता और एक ही बात, पला मार के बुझा, पल्ला मार के बुझा, पल्ला मार के बुझा. . . . . . . . . . . . . होती जाती और हम खूब हँसते।

एक होता था सारंगी और छोटे डमरुओं का गीत जो बहुत हाई नोट पे गाया हुआ था और इस गाने के आखिर में दो लफ़ज़ गलती से रिकार्ड हो गए होंगे, यह थे “ओ बस”। इस पर हम हँसते हँसते लोट पोट जाते थे। इस गाने की रिकॉर्डिंग के वक्त किसी ने इशारा किया होगा कि गाना बंद कर दो और क्योंकि यह गाना ग्रुप में गाया जाता था और किसी ने इशारा समझा नहीं हुआ होगा और एक ने जिस ने समझ लिया होगा, कह दिया होगा कि “ओ बस करो “और यह इस में रिकार्ड हो गिया होगा। और इन रिकार्डों में एक होता था जिस में सिर्फ बातें ही की हुई थीं। यह रिकार्ड हम ने इतनी दफा सुना था कि अभी तक मुझे याद है। यह पंजाबी में था। इस की दोनों साइड मैं पंजाबी में ही लिखूंगा क्योंकि हिंदी में लिख कर वोह बात नहीं बन सकेगी।

यह इतहास का एक पन्ना ही है क्योंकि उस समय बज़ुर्ग लोग अक्सर कहते थे कि, “ओ जी अब बुरा ज़माना आ गिया है, लड़के लड़किआं पड़ कर सिनिमा देखने लगे हैं और उन की आदतें खराब हो रही हैं, लड़कीओ को तो पढ़ाना ही नहीं चाहिए”. यह कुछ इस पर्कार है, एक साइड थी, सिनमें दी बीमारी।
बेटा, घर में दाखिल होते हुए “ओ झाई झाई, मैनू छेती रोटी पका के देह ”
माँ, “औन्त्रिया सिर सड़िया, हुन ते सवेर दा घर पैर पाया ई, हुन किथे उजड़ना ईं ?”
बेटा, ओ माई गुडनैस, “झाई तैनूं पता नहीं अज्ज सन्डे है ?, मैं पिक्चर देखण जाना ”
माँ, “वे पिचकर दिआ लगदिया, जाह पहलां आटा पिया के लिया, तेरा भाईया हटिओं आऊँगा तां तेरे सिर विच की सुआह पाऊँगा ”
बेटा “ऐं आटा ते मुकिआ ही रहना, आटा पिआन गियाँ मेरी इज़त खराब हुंदी आ ”
बेटी, “झाई, झाई, मैं भी सिनमा देखण जाऊँगी ”
माँ, “हाए वे लोको, मैं केहड़े बन्ने डुब मरां, मुंडा ते विगिड़या ते विगड़िया, कुड़ी भी सिर ते इश्क दा पटारा चुक्की फिरदी आ ”
बाप अंदर आता हुआ, “ए मैं किहा, की घर विच गाजरां विकण लगियां होईआं, किया हो गिया तुहानू ?”
माँ, “ऐ मैं किहा, होर पड़ा ला सुथरी उलाद नूँ, मुंडा ते विगड़िया ते विगड़िया कुड़ी भी सर ते इश्क दा पटारा चुक्की फिरदी आ ”
बेटा, पिता जी नूँ, “गुड ईवनिंग डैडी जी ”
बाप, “ओए डड्डू दिया पुत्रा, हर वेले अंग्रेजी कुतरदा रहना। किसे सच किहा यारो, न निआने पढ़ाओ, न सिनमें दी बीमारी लगाओ, बई अज्ज कल दिओ लोको, मेरी गल मन्दे ओ तां बिलकुल निआने ना पढ़ाओ ”
आखिर में एक छोटा सा गाना,
सिनमा देख देख के यारो, बिगड़े मुंडे कुड़ीआं ने, सिनमा देख देख के यारो बिगड़े मुंडे कुड़ीआं ने।
सस्सी पुनू हीर सिआल,
देखण सोहणी ते महींवाल,
सस्सी पुनू हीर स्याल,
देखण सोहणी ते महींवाल।
हाँ, परदेसी ढोला देखण जी, रल मिल के तुरीआं ने। सिनमा देख देख के यारो. . . . . . .

इस रिकार्ड की दुसरी साइड होती थी, हिन्दुस्तानी और पंजाबी की लड़ाई, जिस में था पंजाबी का खरवापन और हिंदी बोलने वाले की शराफत, जो कुछ इस तरह था,
हिन्दुस्तानी, “स्लामालेकम भाई साहब !”
पंजाबी, “बालकम सलाम, सुणा बई सलाम तां बुरी तरह केहना जिस तरह ईद पड़ के आया हुना ”
हिन्दुस्तानी “भाई साहब मैं तुम से यह पूछना चाहता हूँ कि चिड़िआ घर को रास्ता कौन सा जाता है ”
पंजाबी “ओए चिड़िआ घर दिआ जानवरा, तेरे लई उथे कोई पिंजरा खाली नहीं होईअा, होर की ”
हिन्दुस्तानी “हैं ! बड़े बद्तमीज़ हो तुम, हम तुम से चिड़िआ घर का रास्ता पूछ रहा है और तुम यहां झपके दे रहे हो बड़े बद्तमीज़ हो तुम ”
पंजाबी “ओए कमीज इथे नहीं लभ्दी चिड़िआ घर विच, अजाएब घर विच बेछक मिल जाए ”
हिन्दुस्तानी “ओए नामाकूल ! तुम्हारे ऐसा लंगोटा दूंगा कि तेरी बतीस बाहिर आ जायेगी ”
पंजाबी “ओए तूँ देवेंगा लंगोटा, तेरे इक लग जाऊ, दंड कढ के बाहिर रख दऊंगा, कुते का पूतर ना होवे तां ”
हिन्दुस्तानी “हट जा ओए चिमनी के ”
पंजाबी “ओए चिमनी के, ठहर तैनू दसां “एक थपड़ मारता है।
हिन्दुस्तानी “ओ मर गए, कोई है इस शहर में ?”
एक सिपाही पंजाबी को, “क्यों ओए लड़ रहे हो ?”
पंजाबी “ओ साहब, कोई गल नहीं, यह प्रौहणा दिलिओं आया, चार खट्टे मिठे मुक्के दिखाले एहनूं ”
सिपाही “बक न ओए, चलो थाने ”
जज “क्यों ओए तुम लड़ रहे वहां ?”
हिन्दुस्तानी “नहीं जनाब, लड़ तो नहीं रहे थे, बस सैर कदमी कर रहे थे ”
जज “अग्गे नूं नहीं लड़ना, नहीं ताँ करां हुणे तिन तिन साल दी कैद, जाओ जा के सलाह करो ”
हिन्दुस्तानी पंजाबी को “पंजाबी भाई मुझे मुआफ कर देना, आइंदा ऐसी गलती कभी नहीं होगी, भाई, अब हम तुम्हारे शहर में आये हुए हैं तो कोई गाना वाना तो सुनाओ ”
पंजाबी “हैदाँ पे दा पुत बण, लै सुण ”
गाना “एह की यार तेरे दिल विच आई होई ए, जुत्ती कन्ना दे नाल लटकाई होइ ए, टिंड (सर ) छितर दे वांग चमकाई होइ ए ”
एक दो लाइने और थीं जो मुझे याद नहीं। बस यह हंसी मज़ाक चलता ही रहता था, वोह दिन कितने अच्छे थे।

चलता ……

परिचय - गुरमेल सिंह भमरा लंदन

१९६२ में बीए फाइनल की पढ़ाई छोड़ कर इंग्लैण्ड चले गए. लन्दन में निवास कर रहे हैं. किताबें पढने और कुछ लिखने का शौक बचपन से ही रहा है। पिछले १३ वर्ष से रिटायर हैं और बोलने में कठिनाई की समस्या से पीड़ित हैं. पांच वर्ष से रेडिओ एक्सेल बर्मिंघम को कहानियाँ भेज रहे हैं. 'जय विजय' के लिए लघु कथाएँ लिखते हैं. संस्मरण लिख रहे हैं.

6 thoughts on “मेरी कहानी – 32

  1. नमस्ते एवं धन्यवाद महोदय। आज की क़िस्त का विवरण रोचक एवं प्रभावशाली है। श्री सन्ता सिंह का व्यक्तित्व, कार्य व व्यव्हार मुझे उचित लगा। ऐसे समाज विरोधी दुष्टों के प्रति उनका व्यव्हार उचित ही था। आज भी समाज ऐसा ही लोग भिन्न भिन्न प्रकार से कर रहें हैं। लगता है कि सारे देश के संता सिंह जैसा बनने पर ही अज्ञानता के कारण भोले भाले लोगो का शोषण करने वाले छलि गुरुओं से हमें मुक्ति मिल सकती हैं। अन्य सभी प्रसंग भी रोचक व स्वाभाविक हैं।

    1. मनमोहन भाई, आप ने सही कहा , आज भी संता सिंह जैसे लोगों की जरुरत है किओंकि साधू संतों और हट्टे कट्टे मंगतों की फ़ौज भारत में इतनी बड गई है कि वोह जनता पर एक बोझ है . लोगों का आर्थिक शोषण करते हैं , और साथ ही लोगों को अंधविश्वास में धकेलते हैं .

    1. राज किशोर भाई , बहुत बहुत धन्यवाद .

  2. ठग साधुओं के बारे में जानकर मजा आया. उसी तरह ग्रामोफोन के रिकार्ड कि बातचीत पढ़कर मजा लिया. आभार !

    1. विजय भाई , इन लुटेरों का बस यह ही इलाज है , ग्रामोफोन तो हम ,रिकार्ड सुनते ही रहते थे और यही हमारा ऐन्तार्तेंमैन्त रूम होता था .

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