संस्मरण

मेरी कहानी – 33

तरसेम अब अपनी ज़िंदगी में मसरूफ हो गिया था और हमारा मिलन बहुत कम  हो चुका था। कभी कभी ही मैं उस के घर जाता और जब भी जाता उस की पत्नी सीबो मेरी बहुत आव भगत करती । सीबो एक बहुत सीधी साधी लड़की थी। बाहिर आ कर तरसेम सीबो की शकायतें करता रहता था। मुझे तो इतना पता भी नहीं था लेकिन तरसेम शादी करा के कुछ समझदार हो गिया था। सीबो अब इस दुनिआ में नहीं है लेकिन वोह बहुत ही मासूम होती थी। १९६५ में जब मैं इंडिया आया था तो उन लोगों को मिलने के लिए उन के घर गया था। सीबो ने ख़ास कर मेरे लिए गजरेला बनाया था। गजरेला इतना स्वादिष्ट नहीं था लेकिन मैंने उसे कहा भाबी ! इतना अच्छा गजरेला कहाँ से बनाना सीखा?, यह तो बहुत स्वाद है। उस ने खुश हो कर मेरी प्लेट में और डाल दिया। मैंने खा लिया लेकिन उस के खुश चेहरे का नूर अभी तक मुझे याद है। तरसेम के पिता जी अब बूढ़े हो चुक्के थे और उन को ऊंचा सुनाई देता था। तरसेम अब लोगों के मकान बनाता था और कुछ वर्षों बाद डुबाई चले गिया था।

जीत,बहादर और मेरा साथ अब बड़ गिया था और बाद में भजन भी हमारा दोस्त बन गिया। भजन का साथ हमें मैट्रिक तक ही मिला क्योंकि मैट्रिक पास करने के उपरांत उस की एक टांग पर एक रोग हो गिया जिस को चंबल कहते थे। किसी नीम हकीम ने उस की टांग पर कोई दुआई लगाईं जिस में नीला थोथा मिला हुआ था जिस को कौपर सल्फेट कहते हैं। सुना था कि नीले थोथे की ज़हर उस के शरीर में फ़ैल गई और भजन यह दुनीआं छोड़ गिया। कहाँ तक यह सच है मुझे पता नहीं। भजन की बहन हमारे टाऊन में ही रहती है लेकिन हम ने उस से भजन के बारे में कभी कुछ पुछा नहीं क्योंकि हम उस की याद उस की बहन को दिलाना नहीं चाहते। एक बात है कि भजन फ़ुटबाल का अच्छा पलेयर होता था और वैसे भी कुछ सख्त सुभा का होता था,कभी किसी के साथ पंगा पड़ जाए तो लड़ने के लिए आगे हो जाता था। मास्टर हरबंस सिंह से हम तो डरा करते थे लेकिन भजन ने कभी संकोच नहीं किया था हरबंस सिंह के साथ बात करने को ले कर। फ़ुटबाल खेलते वक्त भी मास्टर हरबंस सिंह के साथ भिड़ जाता था। पड़ने में भजन निल ही था और ना ही उस को कोई परवाह थी लेकिन खेलने में बहुत अच्छा था।

जब कभी कोई मिनिस्टर आता तो स्कूल में ही लोग उस का भाषण सुनने के लिए आ जाते थे। उन दिनों बी डी ओ भी आया ही रहता था। लोगों को फसलों के नए नए बीज दिखाए जाते। उन दिनों गन्ने एक ही किसम के बीजे जाते थे जिन को चन बोलते थे। यह गन्ने बहुत ही पतले कोई एक इंच विआस में होते थे जो चूपने में बहुत मज़ेदार होते थे और उन का गुड़ बहुत स्वाद होता था। अब लोगों को नए नए गन्ने दिखाए जाने लगे। एक को फ़ार्म कहते थे। लोगों ने फ़ार्म बीजने शुरू कर दिए क्योंकि एक तो चूपने में बहुत नरम होते थे, दूसरे मिठास भी अच्छी थी,तीसरे उपज दो गुनी हो गई। कुछ देर बाद एक और गन्ना बी डी ओ ले कर आया और लोगों को दिखाया। इस को बांस कहते थे। यह बहुत ही ज़्यादा बांस जैसा मोटा था। यह सिर्फ खंड बनाने के काम ही आता था और गन्ना मिल को ही जाता था। यह बहुत सख्त होता था और चूपा नहीं जा सकता था। उस समय पंजाब में किसान लोग चावल अपने घर खाने के लिए ही उगाते थे और बहुत कम लोग चावल खाते थे या जब कोई मेहमान आ जाए या शादीओं में खाए जाते थे। अब किसानों को चावल भी उगाने को कहा जाने लगा। अब तो चावल इतने होते हैं कि मंडिआं भरी होती हैं।

हमारी मिडल स्कूल की पढ़ाई खत्म होने को थी। एक दिन एक मिनिस्टर आया और साथ में बी डी ओ भी। मिनिस्टर ने लोगों को वधाई दी कि हकूमत की तरफ से हमारे गाँव से ले कर फगवारे तक सड़क बनाने की मंजूरी मिल गई थी। लोगों ने बहुत तालिआं बजाईं। मिनिस्टर ने यह भी बताया कि इस सड़क से पहले कैल (छोटी सी नदी )पर पुल बनाया जाएगा। लोगों की ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा और लोग बहुत देर तक तालिआं बजाते रहे। हम को तो ख़ास कर ख़ुशी हुई क्योंकि हम ने फगवारे पड़ने जाया करना था। जैसा कि मिनिस्टर ने कहा था कैल पर पुल बनना जल्दी ही शुरू हो गिया। कैल ज़्यादा दूर नहीं थी, इस लिए हम कैल पे पुल बनता देखने जाते। बस हमें एक ही बात की इंतज़ार थी कि जल्दी जल्दी पुल बन जाए। यह शायद १९५६ था और स्कूल में हमें छुटियाँ थीं। एक दिन हमें पता चला कि गाँव में भारत समाज सेवक कैम्प लग रहा है और कपूरथले के महिन्द्रा हाई स्कूल से विद्यार्थी आ रहे हैं। पुल अभी बन ही रहा था और जल्दी ही सड़क बननी भी शुरू होने वाली थी। भारत समाज सेवक का काम उन दिनों में बहुत परचलत था. यहां भी कहीं सड़क बननी होती किसी हाई स्कूल या किसी कालज के लड़के सड़क पर काम करने आते। क्योंकि हमें स्कूल में छुटियाँ थीं और स्कूल के सभी कमरे खाली थे, इस लिए महिन्द्रा हाई  स्कूल के विद्यार्थी हमारे स्कूल में ठैहराए गए। जिस दिन सड़क का काम शुरू होना था, उस दिन एक बहुत बड़ा शामिआना लगाया गिया और एक मिनिस्टर, बी डी ओ साहिब और कुछ अन्य अफसर आये। शामिआने के नीचे बहुत कुर्सियां थीं और लाऊड स्पीकर का भी इंतज़ाम था।

पहले किसी मिनिस्टर ने सड़क के स्थान पर पहला फावड़ा चलाया, लोगों ने तालिआं बजाईं और फिर वोह सभ लोग शामिआने के नीचे कुर्सिओं पर बैठ गए। उसी मिनिस्टर ने पहले कोई लैक्चर दिया, उस के बाद बी डी ओ और कुछ और भी लोगों ने बोला। इस के बाद शुरू हुआ मनोरंजन का प्रोग्राम। महिन्द्रा स्कूल के लड़कों ने बहुत अच्छा प्रोग्राम किया लेकिन मुझे तो सिर्फ एक ही गीत याद है और जिस लड़के ने गाया उस का नाम तो याद नहीं लेकिन उस को मस्ताना कहते थे और जो गीत उस ने गाया वोह अपने आप में इतहास है। यह गीत जिस ने गाया था वोह सुरिंदर कौर का गाया हुआ था। सुरिंदर कौर और प्रकाश कौर दिली की दो बहने थीं जिन्होंने उन दिनों बहुत से लोग गीत रिकार्ड करवाये थे। जो गीत इस लड़के मस्ताने ने गाया था, वोह था ” जुत्ती कसूरी पैरीं ना पूरी, हाए रब्बा वे मैनूं तुरना पिया “.यह गीत इस लड़के ने इतना अच्छा गाया कि मैं भी इस गाने का बस मस्ताना ही हो गिया। आज तक यह गाना मुझे बहुत अच्छा लगता है। इस गाने में इतहास यह है कि उन दिनों लोग बहुत सीधे साधे होते थे। मुझे सिर्फ पंजाब का ही पता है कि उस समय पति आगे आगे चलता था और पत्नी पीछे पीछे चलती थी। इकठे नहीं चलते थे क्योंकि यह सभयता के खिलाफ समझा जाता था। इस गाने के अर्थ यह हैं कि कोई पति सुसराल से अपनी पत्नी को अपने गाँव को ले कर पैदल जा रहा है। पति आगे आगे जा रहा है और पत्नी पीछे पीछे जा रही है। इस गाने में पत्नी के जज़्बात दिखाई देते हैं। पत्नी कह रही है कि उस ने कसूरी जुत्ती पहनी हुई है जो पैरों को काट रही है (उन दिनों कसूर शहर की बनी जुतीआं फेमस थीं जो अब पाकिस्तान में है ) क्योंकि जुत्ती पैरों में पूरी फिट नहीं। हाए रब्बा मुझे पैदल चलना पड़ा है। सुरिंदर कौर के सभी गानों से हमारी आज़ादी के पहले की पंजाबी सभयता दिखाई देती है।

इस फंक्शन के बाद सड़क का काम शुरू हो गिया। हमारे घर के लिए यह दिन बुरा था क्योंकि यहां से सड़क शुरू हुई,पहले हमारी जमींन ही बीच में आ गई। जो पहला पुराना रास्ता होता था वोह हमारे कुएं के पछम  की ओर से जाता था, अगर वही रास्ते पर सड़क बनती तो हमारा कोई नुक्सान ना होता लेकिन अब यह सड़क कुएं के पूर्व की और बननी शुरू हुई जिस में अकेले हम ही नहीं थे दूसरे भी बहुत लोग थे जो पर्भावत  हुए। वादा तो किया गिया था कि हमें कहीं और ज़मीं दे दी जायेगी लेकिन आज तक किसी को भी कुछ नहीं मिला। गांंव के सारे लोग अपने अपने फावड़े और बेलचों से खुदाई कर रहे थे। निशाँन लगा दिए गए थे। जिन जिन की जमीन पर्भावत थी वोह शोर मचा रहा था। क्योंकि जमीन किसान के लिए एक माँ के बराबर होती है, इस लिए कई लोग बहुत दुखी थे। इन में एक थी एक बुड़िआ जिस का नाम था लच्छी। वोह बहुत शोर मचा मचा कर अफसरों के आगे हाथ फैला रही थी लेकिन उस की कोई नहीं सुनता था। यह जमीन भी इतनी अच्छी थी कि जिसे कहते हैं सोना उगलने वाली थी। महिन्द्रा स्कूल के लड़के भी काम कर रहे थे।

सेवा और मोहिन्दर साथ साथ फावड़ा चला रहे थे कि सेवे का फावड़ा मोहिन्दर के एक पैर पर लगा,जिस से खून निकलना शुरू हो गिया। मोहिन्दर का पिता जो साथ ही काम कर रहा था सेवे से लड़ने लगा और कहने लगा कि सेवे ने जान बूझ कर फावड़ा मारा था। बी डी ओ जो ऊंचा लम्बा सिंह था सब देख रहा था। वोह आया और मोहिन्दर के पिता जी को समझाने लगा कि उस लड़के से अचानक लग गिया था लेकिन मोहिन्दर का पिता बार बार यह ही कहता जा रहा था कि जान बूझ कर मारा था। बीडीओ उस से लड़ने लगा कि वोह क्यों खामखाह झगड़ा कर रहा था। इस के बाद वोह चुप हो गिया। हमारे गाँव की सड़क सिर्फ दो किलोमीटर ही बननी थी, इस के बाद बार्न गाँव की ज़मीन शुरू हो जाती थी और बार्न गाँव नें प्लाही गाँव तक सड़क बनानी थी और आगे पलाही गाँव ने इस सड़क को फगवारे तक ले जाना था। यह कच्ची सड़क तकरीबन एक महीने में पूरी हो गई और इस सड़क के पूरा होने से तकरीबन एक हफ्ता पहले भारत समाज सेवक कैम्प भी ख़त्म हो गिया और सभी महिन्द्रा स्कूल के लड़के वापिस चले गए। आज यह सड़क बहुत अच्छी है और इस पे कारें बसें और सभी प्रकार के वाहन चल रहे हैं और यह सड़क बहुत बिज़ी हो गई है।

चलता  ……

परिचय - गुरमेल सिंह भमरा लंदन

१९६२ में बीए फाइनल की पढ़ाई छोड़ कर इंग्लैण्ड चले गए. लन्दन में निवास कर रहे हैं. किताबें पढने और कुछ लिखने का शौक बचपन से ही रहा है। पिछले १३ वर्ष से रिटायर हैं और बोलने में कठिनाई की समस्या से पीड़ित हैं. पांच वर्ष से रेडिओ एक्सेल बर्मिंघम को कहानियाँ भेज रहे हैं. 'जय विजय' के लिए लघु कथाएँ लिखते हैं. संस्मरण लिख रहे हैं.

5 thoughts on “मेरी कहानी – 33

  1. गन्ने की अनेक किस्मो का वर्णन पढ़कर ज्ञान में वृद्धि हुई। प्रभु की रचना के क्या कहने। कहते हैं की विवेकी पुरुषों को संसार की प्रत्येक वस्तु में ईश्वर नजर आता है परन्तु साधारण लोगो को यह समझ में नहीं आता। उन्हें जो कोई कुछ कह देता है उसे वह भोले लोग उसे वैसा ही मान लेते हैं। आपके गाँव में सड़क व पुल बना, इससे आपको बहुत सुविधा हुई होगी। आपको मुआवजा नहीं मिला यह अनन्याय था। यह सोच कर संतोष किया जा सकता है कि इससे जिन लोगो को सुविधा मिली होगी उसमे आपकी भूदान वा चैरिटी का योगदान है। क़िस्त बहुत रोचक एवं प्रभावशाली है। हार्दिक धन्यवाद श्रद्धेय श्री गुरमेल सिंह जी।

    1. मनमोहन भाई, यह पुल और सड़क बन्ने से हमारे गाँव को किया दुसरे सभी गाँवों को बहुत फैदा हुआ है . मुआवज़े की बात तो हम कब के भूल चुक्के हैं लेकिन जो इन सड़कों से गाँव को फैदा हुआ है वोह अधभुत है . अब तो मैं गाँव को पिछले दस साल से शरीरक कष्ट के कारण जा नहीं सका हूँ लेकिन अब पता चला है कि यह सड़क दोनों तरफ से बड़ी और खुली कर दी गई है और जीटी रोड से कम नहीं है . गाँव की उन्ती इतनी हुई है कि बताना मुश्किल है . किश्त पसंद करने व हौसला अफजाई के लिए धन्यवाद .

      1. हार्दिक धन्यवाद श्रद्धेय श्री गुरमेल सिंह जी। आपके उत्तर से पूर्ण संतोष हुआ। एक नियम याद आ गया। मनुष्य को अपने ही उन्नत्ति में संतुष्ट नहीं रहना चाहिए किन्तु सबकी उन्नत्ति वा सुख में अपनी उन्नत्ति सुख समझना चाहिए। इसी से मिलता जुलता नियम एक और है कि मनुष्यों को सार्वजनिक सर्वहितकारी नियम के पालन में परतंत्र रहना चाहिए और प्रत्येक हितकारी नियम के पालन में सब स्वतंत्र रहें/हैं।

  2. यह क़िस्त पढ़कर अच्छा लगा. आपके गाँव में तो वायदे के अनुसार पुल और सड़क जल्दी ही बन गए. शायद इसी कारण पंजाब आज भी खुशहाल है. हमारा उतर प्रदेश होता तो 10 साल तक वायदे ही करते रहते और शायद कागज पर बन भी जाती, परन्तु सारा पैसा नेताओं, अधिकारीयों और ठेकेदारों की जेब में चला जाता.

    1. विजय भाई , यह सही है कि पंजाब में उन्ती बहुत हुई है . परकाश सिंह बादल ने पंजाब के लिए बहुत काम किया है .यह ठीक है कि उन्होंने अपने लिए भी बहुत कुछ कर रखा है लेकिन इस को उन की तन्खुआह ही समझ लें तो फिर भी बहुत काम हुआ है . मैं कहीं पहले भी लिख चुक्का हूँ कि हमारे नज़दीक ही एक गाँव है चाहेरू जो बिलकुल छोटा और पछडा हुआ गाँव था लेकिन अब इस में शानदार जूनिवार्सती बनी हुई है . गरीब लोगों को जिन का कोई नहीं है उन को पेंशन मिलती है और आटा दाल बगैरा बहुत ही सस्ते रेत पर ऐसे लोगों को मिलटा है . मेरी पत्नी की बड़ी बहन जो गाँव में रहती है ,उस के पती इस दुनीआं में नहीं हैं और कोई बच्चा भी नहीं है , वैसे तो हर वक्त हम उस को सपोर्ट करते रहते हैं , फिर भी उस को पांच सौ रुपैया महीना हकूमत की तरफ से पेंशन मिलती है और राशन भी बहुत ही सस्ते में हकूमत की तरफ से मिलता है . उस के घर में फ्री में हकूमत ने शौचालय बना दिया है ,इस को लगे अब पांच साल छे साल हो गए हैं .

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