संस्मरण

मेरी कहानी – 34

मेरी कहानी के काण्ड २६ में मैं ने लिखा था कि जो मैं लिख रहा हूँ , वोह बिखरे हुए माला के मणके ही हैं। कब कोई मणका माला में पिरोने के लिए मिल जाए ,कहना असंभव है। मैंने अपने बचपन के बारे में  काफी कुछ लिखा है और अभी लिखने को बाकी है। लेकिन आज सुबह जब मैं शावर ले रहा था तो मेरे मन में विचार आया कि इतनी बातें मैं लिख चुक्का हूँ लेकिन अपने घर के सदस्यों के बारे में कोई ख़ास नहीं लिखा और मैं सोचता हूँ कि अगर नहीं लिखूंगा तो बहुत कुछ अनलिखा रह जाएगा। एक बात और कि कौन सी घटना कब हुई ,यह भी लिखना बहुत मुश्किल होता है अगर आप ने डायरी ना लिखी हो तो. पिता जी के साथ मेरा साथ इतना नहीं रहा जितना दादा जी के साथ रहा। फिर भी मैं पिता जी के  बारे में  ही  पहले लिखूंगा।

बहुत सी बातें तो मुझे पिता जी से  ही पता चलीं ख़ास कर उन के विवाहता जीवन को लेकर। यों तो बचपन में मैं पिता जी से डरता और शर्माता रहता था ,फिर भी जब मैं आठवीं कक्षा तक पौहंच गिया था तो कुछ कुछ बातें करने लगा था। कुछ कुछ झिजक दूर हो गई थी। पिता जी कभी कभी शराब पी लेते थे और मीट भी खाते थे। जब उन के अफ्रीका के दोस्त आते तो वोह महफल लगाते जिस में वोह बहुत बातें करते और जब उन को कुछ नशा हो जाता तो अफ्रीकन ज़ुबांन स्वाहेली में बोलने लगते। मलावा राम  को छोड़ कर वोह किसी और गांववासी के साथ शराब नहीं पीते थे। उन की शराब इतनी ही होती थी कि वोह मज़े से बातें कर सकें। मैंने उन को कभी शराबी हो कर गिरते नहीं देखा। एक बात है कि हमारे घर में पिता जी जैसा हुशिआर कोई नहीं हुआ। वोह इतने पड़े लिखे नहीं थे लेकिन पंजाबी में काफी मुहारत रखते थे और कीर्तन तो बहुत ही बेहतरीन करते थे। गाँव के बहुत से लोगों की शादियां उन्होंने कराईं थीं। घर में हारमोनियम होने की  वजह से मेरी माँ  भी अच्छा हारमोनियम  वजा लेती थी। बड़े भइया और छोटे भइया भी वजा लेते थे।

जो ताऊ रतन सिंह के साथ होता रहा ,मैं सब कुछ देखता रहा। लेकिन कभी कभी पिता जी और ताऊ रतन सिंह इकठे दुसरे दोस्तों के साथ बैठे होते। मुझे कभी इस की परवाह नहीं हुई। जब भी कभी दोनों भाई बोलने लगते तो मैं ताऊ रतन सिंह के घर चला जाता ,कारण यह ही होता था कि ताऊ मुझे कुछ गली वाले पैसे दे देता , कभी दूकान से कुछ खाने के लिए ले देता। पिता जी जब भी अफ्रीका से आते , मकान बनाने का काम शुरू कर देते। पिता जी का एक बहुत ही प्रिय दोस्त होता था , जिस का नाम था धर्म सिंह जो जगपाल पुर गाँव से ताउलक रखता था , इस गाँव को पहले नामाने बोलते थे। धर्म सिंह की एक ही बेटी थी जिस का नाम था जीतो और मेरी बहन का नाम भी जीतो है। इन का आपिस में बहुत प्रेम था। कभी कभी हम धर्म सिंह के घर चले जाते ,कभी वोह हमारे घर आ जाते। पिता जी और धर्म सिंह मुंह बोले भाई बने हुए थे। मुझे भी धर्म सिंह बहुत अच्छा लगता था। धर्म सिंह एक मशहूर राज (मकान बनाने वाले जिन को राज भी कहते थे ) था जिस ने कुछ वर्षों बाद हमारा घर भी बनाया था जिस को मैंने डीजाइन किया था। उस वक्त पिता जी अफ्रीका में थे और सारा घर धर्म सिंह ने ही बनाया था।

अभी तक हम अपने पुराने घर में ही रहते थे जो छोटा था लेकिन अच्छा बना हुआ था। इस घर से मेरी यादें बहुत जुड़ी हैं। मेरा सारा बचपन इसी घर में गुज़रा। मैं पहले लिख चुक्का हूँ कि पिता जी और मलावा राम की दोस्ती बहुत थी यह बात दुसरी है कि कुछ देर बाद इस  दोस्ती को विराम लग गिया था । कोई भी घर अच्छी चीज़ बनती , मलावा  राम के घर भी जाती। एक दफा पिता जी ने पकौड़े बनाए और एक प्लेट में रख कर मुझे दे दिए कि जाह ” मलावा राम को दे आ “. पिता जी बहुत तेज़ बोलते थे , मुझे ऐसा समझ लगा कि पकौड़े ” मलावी को दे आ “. यह घर भी एक ब्राह्मण का घर था जिस की पत्नी का नाम था मलावी। मैं पकौड़े ले गिया और मलावी के घर चले गिया और मलावी को कहा , ” पिता जी ने यह पकौड़े आप को भेजे हैं “. मलावी हैरान सी हो गई किओंकि वोह उस समय जवान थी। कुछ देर बाद मलावी प्लेट ले कर हमारे घर आ गई और माँ को बोली ,” तेज कौरे यह पकौड़े मुझे किओं भेजे हैं ?”. पिता जी भी पास ही थे और बोले , “मलावी बहन , दरअसल मैंने मलावा राम को भेजे थे ,गुरमेल को समझ नहीं लगी “. माँ बोली ,” मलावी बहन ,अब आप ही इन्हें खाएं ,बहुत अछे बने हैं “. मलावी चले गई और बाद में पिता जी और माँ हंसने लगे कि हमारा गुरमेल भी बस बुधु है। इस बात को ले कर बहुत दफा हँसे।

ताऊ रतन सिंह का लड़का यानी मेरा बड़ा भाई बहुत चालाक था। सही बात कहूँ कि यह दोनों बाप बेटा हमारे साथ दुश्मनी ही रखते रहे। एक दफा पिता जी रतन सिंह के घर चले गए , उस वक्त तक रतन सिंह के घर तीन पोतीआं थीं। कुछ देर बाद पिता जी आ गए। बाद में रतन सिंह के बेटे चरन सिंह ने  पिता जी पर दोष थोंप दिया कि उस की पोस्ट ऑफिस की बुक चोरी हो गई और साधू सिंह (मेरे पिता जी ) ही हमारे घर आये  थे । पिता जी अगर सी आई डी में होते तो बहुत कामयाब होते। पिता जी को मालूम था कि चरन सिंह को पैसों की जरुरत है और उस ने पोस्ट ऑफिस से पैसे निकलवाने थे। इस लिए पिता जी हर घड़ी चरन सिंह का पीछा करते। एक दिन चरन सिंह पोस्ट ऑफिस की तरफ जा रहा था। दुसरी तरफ से पिता जी आ रहे थे। चरन सिंह ने गर्मी की वजह से सर के ऊपर तौलिया रखा हुआ था। पिता जी को देख कर उस ने तौलिया कुछ जेब के ऊपर कर दिया। पिता जी झट से समझ गए। जब आमने सामने दोनों मिले तो बातें करने लगे। फिर पिता जी ने पुछा कि ,” किया पोस्ट ऑफिस की बुक मिली या नहीं ?” चरन सिंह ने कहा ,”सब जगह ढूँढी लेकिन पता नहीं कहाँ चले गई “. पिता जी ने एक सैकंड में एक हाथ से तौलिया उठा कर दुसरे हाथ से बुक उस की जेब में से निकाल ली और बोले “यह किया है ?”. चरन सिंह के पास कोई जवाब नहीं था। इस बात से चरन सिंह की बहुत बेइजती हुई , जिस जिस ने भी सुना चरन सिंह को भला बुरा बोला।

एक दिन मैं और पिता जी बाइसिकलों पर  मेरे नानके गाँव डींगरीआं को जा रहे थे। डींगरीआं आदम पुर  के नज़दीक है। आदम पुर से पहले रेलवे लाइन आती है। रेलवे लाइन को पार करने के बाद पिता जी मुझे कहने लगे ,”ज़रा ठहर जा “. दुसरी  तरफ से एक बज़ुर्ग आ रहा था। जब वोह बज़ुर्ग नज़दीक आया तो पिता जी ने उस को बोला ,” सत  सिरी अकाल जी “. बज़ुर्ग ने भी शायद पहचान लिया था और सत  सिरी अकाल बोला। फिर बातें होने लगी और  मेरी तरफ इशारा कर के पिता जी बोले ” यह मेरा बेटा  है “. बज़ुर्ग नें मेरी तरफ देखा , उस की आँखों में नमी दिखाई दी और बोला “जीते रहो बेटा , फिर धीरे से बोला ,यह हमारे भाग्य में नहीं लिखा था “. मुझे तो कुछ समझ में नहीं आया और कुछ देर बाद हम चल पड़े। आदम पर पौहंच कर पिता जी एक हलवाई की दूकान की ओर चल पड़े और कहने लगे “चल चाह पीते  हैं”।

कुर्सिओं पर बैठते ही पिता जी बोले ,” यह बज़ुर्ग मेरा पहला ससुर था”। गुरमेल ! “तुम को पता  नहीं है तेरी माँ  से शादी होने के पहले मेरी दो शादियां पहले भी हो चुक्की थीं। तुम हैरान होंगे कि क्यों ? , तो सुन , ” तेरे दादा और मैंने ज़िंदगी की कठोरता को बहुत झेला  है। यों तो हमारा घर गाँव में ही होता था लेकिन हम ने एक छोटा सा घर अपने खेतों में भी बनाया हुआ था ,घर में मैं, तेरे दादा जी और तेरी दादी जी जिस को तुम ने नहीं देखा बस तीनों ही थे। मैं उस वक्त पांच शी साल का ही हूँगा कि तेरी दादी को एक दिन इतना बुखार हुआ कि दो दिन बाद वोह मुझे और तेरे दादा जी को छोड़ कर इस दुनिआ से रुखसत हो गई। मैं बहुत रोया। शमशान घाट  कुछ ही दूरी पर था, लकड़ीआं जल रही थी और मैं देख रहा था , शाम हो गई थी और तेरा दादा मुझे अकेले खेतों में छोड़ कर किसी काम के लिए गाँव को चले गिया था। तेरे दादा जी के जाने के बाद मैं अकेला  रो रहा था। उस आग जिस में मेरी माँ जल रही थी को देख देख कर बहुत रो रहा था। तेरे दादा जी हालांकि जल्दी ही आ गए लेकिन वोह सीन मेरी आँखों से कभी दूर नहीं हुआ। तेरे दादा जी ही रोटी बनाते और कपडे धोते।

तेरे दादा जी की दूर से रिश्तेदार की बहन बनती जिस को तुम भी जानते हो ,उस ने मेरी शादी चौदां पंद्रां साल  की उम्र में ही एक लड़की से करवा दी क्योंकि घर में बहुत कठिनाई थी और घर को संभालने वाला कोई नहीं था लेकिन वोह विचारी दो साल बाद ही एक बीमारी से चल वसी। फिर दुबारा मेरी शादी इस बज़ुर्ग की लड़की से हो गई। ज़िंदगी कुछ आसान हो गई थी लेकिन वोह विचारी भी एक रोग के कारण दुनिआ को छोड़ गई। इस बज़ुर्ग यानी मेरे ससुर ने बहुत जोर दिया कि मेरी शादी इस की दुसरी लड़की से हो जाए लेकिन मैं नहीं माना। एक हमारा रिश्तेदार अफ्रीका में रहता था।  वह एक दिन आया और तेरे दादा जी से  बोला कि क्यों ना मैं अफ्रीका उन के साथ चलूँ। तेरे दादा जी ने हाँ कर दी और कुछ ही महीनों में मेरे पासपोर्ट बन गिया। तेरे दादा जी को अकेला छोड़ कर केवल सत्रा साल की उम्र में मैं अफ्रीका चले गिया। तीन साल बाद जब मैं वापिस इंडिया आया तो तेरी मां से मेरी शादी हो गई। बस यह ही है मेरी कहानी और इसी लिए यह बज़ुर्ग तुझे देख कर उदास हो गिया और हो सकता है इस के मन में खियाल हो कि कितना अच्छा होता कि उन की बेटी ज़िंदा होती और वोह बज़ुर्ग तुझे दोहते के रूप में देखता”.

इस घटना के बाद पिता जी के साथ नज़दीकी कुछ और बड़ गई थी। जब मैं दसवीं क्लास में था तो पिता जी ने मेरी माँ को अपने पास अफ्रीका बुला लिया। माँ की यह चाहत बहुत देर से थी कि वोह अफ्रीका चली जाए ,इसी लिए उस ने मनत मानी हुई थी कि अगर उस का काम अफ्रीका जाने का हो जाए तो वोह तल्हन गुरदुआरे पांच रूपए चढ़ाएगी। अफ्रीका जाने के बाद माँ ने मुझे बहुत दफा लिखा था कि उस की मनत के पांच रूपए मैं तल्हन चढ़ा आऊँ। जब हमारे मैट्रिक के एग्जाम हो गए तो कुछ देर बाद मैट्रिक के रिज़ल्ट देखने हम रामगढ़ीआ स्कूल फगवारे चले गए। मेरी फर्स्ट डवीजन थी ,जीत और बहादर की सैकंड और भजन की थर्ड डवीजन आई। सारे पास हो गए थे और हम ने उसी वक्त स्कूल से ही सीधे तलहन जाने का प्रोग्राम बना लिया। मैंने सोचा कि माँ की मनत के पांच रूपए भी चढ़ा आऊंगा। जब हम तल्हन गुरदुआरे पुहंचे तो काफी लोग वहां बृक्षों की छाँव के नीचे बैठे थे। जोत वाले कमरे में एक गियानी जी हर किसी से उन की मनत की चीज़ें ले कर गुरबानी के शलोक पड़  रहा था। मैं ने भी पांच रूपए गियानी जी को दे दिए। गियानी जी ने शलोक पड़के मुझे परसाद दे दिया।

जब मैं वापिस आ कर दोस्तों के साथ बैठ गिया तो कुछ गियानी आपिस में लड़ने झगड़ने लगे। कुछ लोग उठ कर उन लोगों को झगडे का कारण पूछ रहे थे तो एक गियानी ने बताया कि एक गियानी ने बहुत से लड्डू अपने एक रिश्तेदार को दे दिए थे। जब उस से पुछा गिया तो वोह आगे बोला ” मैं दे सकता हूँ क्योंकि मेरी चौथी ढेरी(हिस्सेदारी ) बनती है”. इस बात पर लोग बातें करने लगे कि  यहां रह कर भी यह लोग इतनी नीची सोच रखते थे. मेरे सभी दोस्त मुझे कहने लगे कि मैं अपने पांच रूपए वापिस लूँ और फगवारे जा के इन पांच रूपए की फिल्म देखें।

हम सभी उठ खड़े हुए और एक और जगह को जाने के लिए तैयार हो गए जिस के बारे में हम ने सुन रखा था कि एक डेरा था जिस पर एक सिंह जी को हवा आती थी  और वोह कोई जिन भूत हो , किसी की कोई भी समस्य हो बता देता था। उस सिंह का डेरा चार पांच सौ  गज़ की दूरी पर ही था  .

चलता………

परिचय - गुरमेल सिंह भमरा लंदन

१९६२ में बीए फाइनल की पढ़ाई छोड़ कर इंग्लैण्ड चले गए. लन्दन में निवास कर रहे हैं. किताबें पढने और कुछ लिखने का शौक बचपन से ही रहा है। पिछले १३ वर्ष से रिटायर हैं और बोलने में कठिनाई की समस्या से पीड़ित हैं. पांच वर्ष से रेडिओ एक्सेल बर्मिंघम को कहानियाँ भेज रहे हैं. 'जय विजय' के लिए लघु कथाएँ लिखते हैं. संस्मरण लिख रहे हैं.

6 thoughts on “मेरी कहानी – 34

  1. विजय भाई , पिता जी की पहले की शादीओं के बारे में मुझे पता ही नहीं था , यह तो अचानक पिता जी के ससुर से मिलने के बाद ही हुआ ,वर्ना शाएद अभी तक पता ना चलता . पिता जी और माता जी जब कभी घर में खुश होते तो हार्मोनिअम ले कर बैठ जाते और बहुत हँसते . जो उन का आपिस में प्रेम था शाएद मैंने भी विरसे में पाया है , इसी लिए हम, मिआं बीवी दोस्तों की तरह रहते हैं .

  2. भाई साहब, आपके पिताजी के बारे में जानकर अच्छा लगा. परिस्थितिवश उनको तीन विवाह करने पड़े, लेकिन प्रतीत होता है कि वे हमेशा अपनी पत्नी के प्रति समर्पित रहे.

  3. नमस्ते एवं धन्यवाद आदरणीय श्री गुरमेल सिंह जी। पूरी कथा पढ़कर हार्दिक आनंद की अनुभूति कर रहा हूँ। आपकी नानाजी से मुलाकात और पिताजी द्वारा अपनी जिंदगी मुख्यतः पहले के दो विवाहों के बारे में विस्तार से बताना, उसे जानकार पिताजी के प्रति आदर का भाव उत्पन्न हुआ। यदि उन्होंने उस अवसर पर ना बताया होता तो शायद आपको पता न चलता। आपके ताऊ श्री रतन सिंह के परिवार द्वारा चोरी का इल्जाम और पिताजी द्वारा उसका बुद्धिपूर्वक जो जवाब दिया गया वह सराहनीय है। शायद ही कोई इस प्रकार से सोच पता हो। आप ने मेट्रिक प्रथम श्रेणी में किया यह भी सुखद एवं अभिनंदनीय है। आपके सुनने में मालवा व मलावी में जो अंतर आया वह पढ़कर भी आपके बालपन व भोलेपन ने प्रभावित किया। आज की क़िस्त के लिए धन्यवाद। अगली क़िस्त की प्रतीक्षा है।

    1. मनमोहन भाई , जब पहले नाना जी से मुलाकात हुई तो उस वक्त मुझे ऐसा कोई अहसास नहीं था किओंकि मैं युवा अवस्था में था लेकिन अब किओंकि उमर्वान हूँ , अब उस के जज़्बात को समझता हूँ . ताऊ रतन सिंह और चरन सिंह की कभी कभी याद आती है कि अगर वोह कहीं से पांच मिनट के लिए मेरे सामने आ जाएँ तो उन से पूछूँ कि इस दुश्मनी और हम से जलन का उन को किया फैदा हुआ लेकिन यह जिंदगी है .मलावा मलावी की बात पर अभी भी मुझे हंसी आ जाती है . कथा की ऐप्रीशीएशन के लिए धन्यवाद

  4. आत्मकथा में छोटी सी छोटी बात लिखना याददाश्त को दाद देना बनता है
    जिज्ञासा बरकरार रखती लेखनी

    1. विभा बहन, अगर आप मेरी कहानी का पहला एपिसोड पड़ोगे तो जो देहरादून के वाकिआत मैंने लिखे हैं , जब मैं अपनी माँ को बताता था तो वोह हैरान हो जाती थी कि मैं तो उस वक्त बहुत छोटा था ,फिर मुझे वोह बातें कैसे याद रह सकती थी लेकिन यह सच है कि वोह बचपन की बातें मुझे याद है और इस की पुश्टी मनमोहन भाई ने कर दी है किओंकि वोह देहरादून की एक एक चीज़ को जानते हैं .

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