आत्मकथा

आत्मकथा : एक नज़र पीछे की ओर (कड़ी 7)

पहली राष्ट्रवादी सरकार का गठन

1996 में जो आमचुनाव हुए थे, उनमें भारतीय जनता पार्टी को भारी सफलता मिली थी। पार्टी ने अपने ही बल पर 161 स्थान जीत लिये थे। संसद में सबसे बड़ा दल होने के नाते भाजपा के नेता श्री अटल बिहारी वाजपेयी को सरकार बनाने का निमंत्रण मिला। उस समय हम सबका उत्साह देखने लायक था। कानपुर में हमारे बैंक में अधिकांश लोग भाजपा समर्थक थे। इसलिए अटल जी का शपथ ग्रहण समारोह देखने के लिए सोसाइटी के कार्यालय में एक टी.वी. लाया गया। उस पर सभी ने इस कार्यक्रम को देखा। हालांकि अटलजी अपने बहुमत का जुगाड़ नहीं कर सके, इसलिए 13 दिन बाद ही उनको त्यागपत्र देना पड़ा।

उनके बाद देवगोड़ा और गुजराल की सरकारें बनीं, वे भी अधिक नहीं चलीं। इसके बाद जो चुनाव हुए, उसमें अकेले भाजपा को 183 सीटें प्राप्त हुईं और उसके सहयोगियों को मिलाकर बहुमत हो गया। इसलिए अटलजी दूसरी बार प्रधानमंत्री बने। उन्होंने प्रधानमंत्री बनते ही पहला अति महत्वपूर्ण कार्य पोखरण में परमाणु विस्फोट का किया। उन्होंने स्पष्ट रूप से घोषणा की कि अब भारत परमाणु शक्ति सम्पन्न हो गया है। इससे मुझे कितनी प्रसन्नता हुई, इसे शब्दों में नहीं बता सकता। इस विस्फोट के बाद पूरी दुनिया में भारतीय सिर ऊँचा करके चलने लगे थे। मेरा यह निश्चित मानना है कि देश का सम्मान संसार भर में बढ़ाने का एक मात्र उपाय यह है कि देश की ताकत बढ़ायी जाये। इसके अभाव में बांग्लादेश, श्रीलंका और मालदीव जैसे पिद्दी देश भी हमें आँखें दिखाते हैं, पाकिस्तान और चीन की तो बात ही अलग है। इसलिए भारत को किसी भी अन्य देश के भरोसे रहने के बजाय अपनी ताकत बढ़ानी चाहिए। श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने अमेरिका आदि के दबावों और प्रतिबंधों की चिन्ता किये बिना परमाणु विस्फोट किया और परमाणु बम बनाने की अपनी प्रतिबद्धता दोहरायी, इसके लिए निश्चित ही उनका अभिनन्दन करना चाहिए।

व्यक्तिगत कम्प्यूटर खरीदना

मेरे पास कोई अपना कम्प्यूटर नहीं था। बहुत दिनों से मेरी इच्छा एक पर्सनल कम्प्यूटर खरीदने की थी। उस समय नये पर्सनल कम्प्यूटर, जो केवल डाॅस पर चलते थे, कम से कम 25-30 हजार रुपयों में आ रहे थे। मेरे पास इतना पैसा फालतू नहीं था, इसलिए मैंने एक पुराना कम्प्यूटर खरीदने की सोची, जो चालू हालत में हो। उस समय हमारे बैंक की एडवांसशीट आदि की डाटा प्रविष्टि का कार्य श्री मनीष श्रीवास्तव किया करते थे, जो बड़े चौराहे के पास ही रहते थे। मैंने उनसे जिक्र किया तो उन्होंने बताया कि वे अपना एक पुराना कम्प्यूटर, जो चालू हालत में है, बेचना चाहते हैं और नया लेना चाहते हैं। कुछ बातचीत के बाद वे 10 हजार रुपये में वह कम्प्यूटर मुझे बेचने को तैयार हो गये। उन्होंने यह भी कहा कि कम्प्यूटर में यदि कोई खराबी आयेगी, तो उसे स्वयं ठीक कर देंगे और एक साल तक ही नहीं आगे भी करते रहेंगे। इसी विश्वास पर मैंने कम्प्यूटर खरीद लिया।

उस समय मेरा भतीजा मुकेश चन्द कृषि विज्ञान में अपनी पीएच.डी. की थीसिस लिख रहा था। मैंने सोचा कि उसकी थीसिस मैं तैयार कर दूँगा, इससे मुझे अच्छा अनुभव हो जाएगा। मुकेश ने यह भी कहा कि वह अपनी यूनिवर्सिटी के विद्यार्थियों से इस तरह का बहुत सा कार्य दिला देगा। वास्तव में वह काफी काम लाया भी। परन्तु उसको करते-करते कई बार रात के 11 तक बज जाते थे और काम कराने वाले किसी भी समय आ जाते थे। इससे श्रीमती जी परेशान हो गयीं और मैंने बाहर का काम लेना बन्द कर दिया, क्योंकि स्वास्थ्य सबसे महत्वपूर्ण था। इसके बाद हालांकि वह कम्प्यूटर अच्छा चल रहा था, परन्तु मेरे पास कोई काम नहीं था। केवल गेम खेला करता था और मुकेश की थीसिस बनाया करता था। मुकेश ने अपनी थीसिस टाइप कराने के लिए अपनी युनीवर्सिटी का एक टाइपिस्ट भी लगा दिया था।

मैंने कम्प्यूटर के साथ एक नया और अच्छा डाॅट मैट्रिक्स प्रिंटर भी खरीदा था। उस पर काफी छपाई हुई भी, लेकिन जब मैंने बाहर का काम लेना बन्द कर दिया, तो उस पर केवल मुकेश की थीसिस ही छापी गयी। उसके बाद उस पर बहुत कम छपाई हुई है और अभी तक वह मेरे पास बेकार ही रखा है। बाद में जब मुकेश की थीसिस का कार्य समाप्त हो गया, तो मैंने वह कम्प्यूटर केवल 4 हजार रुपये में एक स्वयंसेवक को बेच दिया।

शतरंज के खिलाड़ी

हमारे बैंक की कानपुर की मुख्य शाखा में उस समय ऐसे दो-तीन बाबू पदस्थ थे, जो शतरंज के अच्छे खिलाड़ी थे। एक थे श्री एस.के. जैन, दूसरे थे श्री धवन और तीसरे थे श्री संजय कुमार। लंच के समय उनमें बाजियाँ हुआ करती थीं। वे अपना लंच पहले ही ले लेते थे और लंच के समय का उपयोग शतरंज खेलने में किया करते थे। मुझे यह पता चला तो लगभग रोज ही मैं उनकी बाजी देखने पहुँच जाता था। श्री जैन बैंकों की प्रतियोगिताओं में कई बार शतरंज में पुरस्कार जीत चुके थे, इसलिए बहुत उच्च कोटि के खिलाड़ी थे। श्री धवन भी उनकी टक्कर के ही खिलाड़ी थे। उनकी बाजी देखना आनन्ददायक होता था। मैंने उनसे बहुत कुछ सीखा। कभी-कभी मैं भी उनके साथ खेलता था और प्रायः हार जाता था। लेकिन धीरे-धीरे मेरे खेल में निखार आता गया और मैं भी अच्छा खिलाड़ी माना जाने लगा था। लेकिन मैंने किसी टूर्नामेंट में भाग नहीं लिया।

बाद में श्री जैन रिटायर हो गये और श्री धवन का स्थानांतरण किसी अन्य शाखा में हो गया, तो शतरंज की बाजियाँ भी समाप्त हो गयीं। वैसे कभी-कभी मैं अपने कम्प्यूटर सेंटर में लंच के समय शतरंज खेल लेता था। मेरे केन्द्र के आॅपरेटर श्री प्रदीप कुमार गुप्ता, मुख्य शाखा के बाबू श्री अनिल कुमार पारीख और सेवा शाखा के श्री आर. के. सेठ प्रायः मुझसे शतरंज खेलते थे। ज्यादातर मैं उनको हरा देता था, परन्तु कई बार हार भी जाता था।

फ्लैट बदलना

मैं लिख चुका हूँ कि पहले हम अशोक नगर वाले मकान में प्रथम तल्ले पर पीछे वाले फ्लैट में रहते थे। उसी मकान में उसी मंजिल पर आगे वाला फ्लैट भी बैंक ने ले रखा था। प्रारम्भ में उसमें श्री पी.के. कपूर रहा करते थे, जो हमारे कार्यालय के मुख्य प्रबंधक थे। शीघ्र की उनका स्थानांतरण कोलकाता हो गया, तो उनके खाली फ्लैट में एक सिख परिवार रहने आया। वे थे श्री पृथीपाल सिंह भाटिया। वे बहुत सज्जन आदमी हैं। उनकी श्रीमती सरदारनी जी से हमारी श्रीमती जी की बहुत घनिष्टता हो गयी थी। उनके दो पुत्रियां हैं, जो दोनों ही योग्य हैं। संयोग से हमारे तत्कालीन सहायक महा प्रबंधक श्री राम विजय पाण्डेय जी से उनकी बहुत घनिष्टता थी। लेकिन जब पाण्डेय जी का स्थानांतरण सिलीगुड़ी हो गया, तब कुछ समय बाद भाटिया जी का स्थानांतरण भी कानपुर से बाहर हो गया और उनको वह फ्लैट खाली करना पड़ा।

(पादटीप– श्री भाटिया जी, आजकल हमारे बैंक में महा प्रबंधक (मानव संसाधन) हैं.)

तब तक हमें अपने वाले फ्लैट में रहते हुए लगभग एक वर्ष हो गया था और उसकी तीन साल की लीज की अवधि पूरी होने वाली थी। हमारे मकान मालिक उस फ्लैट की लीज आगे बढ़ाने को तैयार नहीं थे और अधिक किराये पर किसी और को देना चाहते थे। हालांकि मकान मालिक हमसे जबर्दस्ती खाली नहीं करा सकते थे, फिर भी उसका किराया बहुत कम था, इसलिए हमने सोचा कि यदि हमें आगे वाला फ्लैट मिल जाये तो दोनों की समस्या हल हो जाएगी। उस फ्लैट पर हमारे ही कार्यालय के श्री. ए.एल. दौलतानी का हक बनता था और वह उनको एलाॅट होने वाला था। परन्तु मेरी समस्या को जानकर हमारे तत्कालीन सहायक महाप्रबंधक श्री एस.के. सिन्हा ने वह फ्लैट मुझे एलाॅट कर दिया। इसके लिए मैंने उन्हें हार्दिक धन्यवाद दिया। इस तरह हम आगे वाले फ्लैट में आ गये, जो अधिक अच्छा था। हम लगभग 7 वर्ष उस फ्लैट में रहे और फिर मकान मालकिन से अनबन हो जाने पर ही उसको खाली किया। इसकी कहानी आगे लिखूँगा।

शिवानी

जब हमने अपना पीछे वाला फ्लैट खाली कर दिया, तो उसमें एक मारवाड़ी जोड़ा रहने के लिए आया। उनका हाल ही में विवाह हुआ था। पति का नाम था श्री राजेश बियानी और उनकी पत्नी का नाम था शिवानी। राजेश जी चार्टर्ड एकाउंटेंट थे। वे बहुत सीधे-साधे सज्जन थे। शिवानी बहुत सुन्दर और हँसमुख थी। शीघ्र ही उनकी घनिष्टता हमारे परिवार से हो गयी। उस समय तक हमारी श्रीमती जी बहुत अकेली हो गयी थीं, क्योंकि सरदारनी जी के चले जाने के बाद उनसे बातें करने वाली कोई नहीं थी। शिवानी के आ जाने के बाद उनका मन लग गया। वह थी भी बहुत प्यारी। अपने घर का काम खत्म करने के बाद लगभग सारे समय हमारे ही फ्लैट में रहती थी।

वह बहुत बोल्ड भी थी। जैसा महसूस करती थी फौरन बोल देती थी। एक बार की बात, वे हमारी श्रीमती जी के साथ अशोक नगर के एक होम्योपैथिक डाक्टर को दिखाने गयीं। जब काफी देर तक डाक्टर ने किसी मरीज को नहीं बुलाया, तो उन्होंने जाकर देखा कि क्या बात है। वास्तव में डाक्टर साहब किसी से फोन पर बात कर रहे थे और आधा घंटा बीतने पर भी बात खत्म नहीं हो रही थी। तो शिवानी ने फौरन डाक्टर को डाँट दिया कि इतने मरीज आपसे मिलने का इंतजार कर रहे हैं और आप इतनी देर से फोन पर फालतू बातें किये जा रहे हैं। आपके लिए दूसरों के समय की कोई कीमत नहीं है? यह सुनकर बेचारे डाक्टर साहब सहम गये और फौरन फोन बन्द करके मरीज देखने में लग गये।

लगभग 2 वर्ष वहाँ रहने के बाद शिवानी ने कानपुर में ही श्याम नगर के इलाके में अपना फ्लैट खरीद लिया था और उसमें चली गयी थी। हम उसके गृहप्रवेश में तो नहीं जा पाये, परन्तु बाद में मिलने गये थे। बाद में उसके एक बच्ची हुई, जिसके साथ वह हमसे मिलने आयी थी। वह अभी भी कानपुर में रहती है, परन्तु उससे हमारा सम्पर्क टूट गया है।

परिचय - डाॅ विजय कुमार सिंघल

नाम - डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’ जन्म तिथि - 27 अक्तूबर, 1959 जन्म स्थान - गाँव - दघेंटा, विकास खंड - बल्देव, जिला - मथुरा (उ.प्र.) पिता - स्व. श्री छेदा लाल अग्रवाल माता - स्व. श्रीमती शीला देवी पितामह - स्व. श्री चिन्तामणि जी सिंघल ज्येष्ठ पितामह - स्व. स्वामी शंकरानन्द सरस्वती जी महाराज शिक्षा - एम.स्टेट., एम.फिल. (कम्प्यूटर विज्ञान), सीएआईआईबी पुरस्कार - जापान के एक सरकारी संस्थान द्वारा कम्प्यूटरीकरण विषय पर आयोजित विश्व-स्तरीय निबंध प्रतियोगिता में विजयी होने पर पुरस्कार ग्रहण करने हेतु जापान यात्रा, जहाँ गोल्ड कप द्वारा सम्मानित। इसके अतिरिक्त अनेक निबंध प्रतियोगिताओं में पुरस्कृत। आजीविका - इलाहाबाद बैंक, डीआरएस, मंडलीय कार्यालय, लखनऊ में मुख्य प्रबंधक (सूचना प्रौद्योगिकी) के पद से अवकाशप्राप्त। लेखन - कम्प्यूटर से सम्बंधित विषयों पर 80 पुस्तकें लिखित, जिनमें से 75 प्रकाशित। अन्य प्रकाशित पुस्तकें- वैदिक गीता, सरस भजन संग्रह, स्वास्थ्य रहस्य। अनेक लेख, कविताएँ, कहानियाँ, व्यंग्य, कार्टून आदि यत्र-तत्र प्रकाशित। महाभारत पर आधारित लघु उपन्यास ‘शान्तिदूत’ वेबसाइट पर प्रकाशित। आत्मकथा - प्रथम भाग (मुर्गे की तीसरी टाँग), द्वितीय भाग (दो नम्बर का आदमी) एवं तृतीय भाग (एक नजर पीछे की ओर) प्रकाशित। आत्मकथा का चतुर्थ भाग (महाशून्य की ओर) प्रकाशनाधीन। प्रकाशन- वेब पत्रिका ‘जय विजय’ मासिक का नियमित सम्पादन एवं प्रकाशन, वेबसाइट- www.jayvijay.co, ई-मेल: jayvijaymail@gmail.com, प्राकृतिक चिकित्सक एवं योगाचार्य सम्पर्क सूत्र - 15, सरयू विहार फेज 2, निकट बसन्त विहार, कमला नगर, आगरा-282005 (उप्र), मो. 9919997596, ई-मेल- vijayks@rediffmail.com, vijaysinghal27@gmail.com

7 thoughts on “आत्मकथा : एक नज़र पीछे की ओर (कड़ी 7)

  1. विजय भाई, लिखने का ढंग मुझे बहुत अच्छा लगा किओंकि छोटी छोटी बात लिखने से जीवनी लिखने में एक सतुश्त्ता सी हो जाती है. बाजपाई जी की बातें लिखीं बहुत अच्छा लगा. दरअसल अटल जी ने सिआसत को एक नई देशा की तरफ ले जा खड़ा किया. बचपन से कांग्रस ही देखता आया था, बीजेपी अब टॉप पार्टी बन गई है. शतरंज का लिखा, मुझे बस बेसिक ही आता है और कभी कभी हम खेलते थे. शतरंज खेलते वक्त पता ही नहीं चलता कि वक्त कैसे बीत गया. अब तो कभी कभी कम्पिऊतर के साथ खेल लेता हूँ लेकिन कम्पिऊतर प्रायः जीत जाता है.फिर भी वक्त पास हो जाता है.

    1. धन्यवाद, भाई साहब ! कम्प्यूटर से शतरंज पहले मैं भी खेलता था. प्रायः मैं भी हार जाता था, लेकिन कई बार जीत भी जाता था. अब इतना समय नहीं मिलता.

  2. छोटी छोटी लघु कथा को समेटे उम्दा लेखन

  3. इस भाग में आपने जीवन की अनेक घटनाओं को संछेप में समेटा है। सभी पठनीय एवं रोचक है। आपने अटल सरकार द्वारा आणविक विस्फोट किये जाने पर जिस आत्मगौरव की अनुभूति की थी वैसा ही मेरा भी निजी अनुभव है और शायद अधिकांश देशवासिओं का होगा। आपने पीसी खरीदने का उल्लेख किया है। इसके अनुभव भी दिए हैं। प्रायः ऐसा ही होता है। मैंने भी शायद ६ या ७ साल पहले डेस्टोप लिया था। आरम्भ में इतना उपयोग नहीं था। परन्तु विगत तीन वर्षों से यह मेरा सबसे अधिक निकटवर्ती है। इसे मित्र भी कहा जा सकता है। यदि यह न होता तो शायद वर्तमान में जो कुछ कर पा रहा हूँ वह संभव न होता। आप शतरंज खेलना जानते है। मुझे इसका कुछ ज्ञान नहीं है। आर्य समाज ज्वाइन करने के बाद शायद यह सब चीजे सेकेंडरी लगने लगी और स्वाध्याय वा सामाजिक कार्य ही मेरा मुख्य क्षेत्र बन गया। अन्य कार्यों के लिए समय ही नहीं मिला। फ्लैट बदलने और शिवानी जी का वर्णन भी रोचक एवं सराहनीय है। लेख के लिए हार्दिक धन्यवाद।

    1. आभार, मान्यवर ! छोटी छोटी यादें मिलकर ही जिंदगी की पूरी कहानी बनती हैं. हर छोटी बड़ी घटना का अपना महत्त्व होता है. मैं उनमें भी अधिक महत्वपूर्ण घटनाओं को लिखता हूँ.

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