आत्मकथा

स्मृति के पंख – 33

हमारे साथियों ने अलग होकर पेशावर फ्रूट कं. नाम रखा। उनकी मुहूरत वाले दिन जब गुरुग्रंथ साहब के पाठ की समाप्ति थी, मैंने भगवान से प्रार्थना की कि मुझे शांति और बल देना। मेरी अरदास स्वीकार होकर, जब हमारा काम फिर से शुरू हो गया, तो उन लोगों को दुख होने लगा। खास तौर पर कुन्दन लाल तो बिल्कुल मामूली बातों पर हमसे झगड़ा करने की तैयार रहते। उनका फड़ हमसे बाद में था, इसलिए कहते रहते- रास्ते में बोरी क्यों पड़ी है? अपने फड़ पर रखो, हमारा रास्ता रुकता है। सिर्फ तंग दिली की बात थी, वरना उनसे कुछ फर्क पड़ने वाला नहीं था। हमें सुनाकर बेहूदा बकवास भी करते। उनकी कोशिश थी कि किसी तरह झगड़ा हो। मैं सोचता खून इतना सफेद भी हो सकता है? कल तक एक जगह खाने वाले आज इस तरह दुश्मन बन गए। ताराचन्द को गुस्सा आ जाता। मैं उसे कहता- ‘भाई गुस्सा मत करो, हमारा काफिला चलता रहेगा, यह खुद ब खुद थक जायेंगे। अगर हम भी उन जैसे बन गये, तो यह मण्डी वाले लोग हम फ्रंटियर वालों का तमाशा देखेंगे। मण्डी में सिर्फ एक ही दुकान हमारी फ्रंटियर की थी, यह आजमाइश इम्तहान में हमने पास होना है, फेल नहीं।’

मेरी बातें ताराचन्द मान जाता। उसकी आदत में गुस्सा था। अगर लड़ाई झगड़ा हो जाता, तो रोज की ही बात हो जाती। मेरा रोजाना का पाठ था उसे शांति व सबर से रखना आहिस्ता-आहिस्ता मेरी बातों का प्रभाव उन पर पड़ा। जिम्मेदारी से काम करना, उसे संभालना हम दोनों पर निर्भर था। बाकी तीन साथी बराएनाम थे। घर तरबूज़ के बारे में सोचना जरूरी था। अगर 10 रुपये रोजाना फी मेम्बर उठाते हैं, तो 50 और 20 रुपये दुकान का खर्चा। 70 रुपये कमाई के हों तब तो हो सकता है। हमने सोचा हम दो रह जाएं तो दुकान का काम ठीक चल सकता है। 5 मेम्बर नहीं चल सकते। अब सवाल था द्वारकानाथ गरीब के रुपए का। सीताराम उसका बहनोई था। उसे वह दुकान में रखना चाहेगा। फिर भी मैंने उससे बात की। उसे मेरी बात पसन्द तो आई, लेकिन सवाल वही सीताराम का था। मैंने कहा कि अगर दो रिश्तेदार अपने अलग करूँगा तो आपका रिश्तेदार भी अलग होगा। अगर तुम्हें मंजूर नहीं, तो मैं अलग हो जाता हूँ। पाँचों का गुजर नहीं हो सकता।

द्वारकानाथ को सीताराम पर इतना भरोसा न था। उसे यह विश्वास था कि अगर मैं दुकान में रहूँगा, तो उसका रुपया निकल आयेगा। इसलिए उसने हमारी तकलीफ मान ली। वह लोग जो दूर से अलग होकर अपना काम अच्छी तरह चला रहे थे, मुझे अपने दुख सुख से भी अलग रखने का मंसूबा बना चुके थे। मुझे उनके अलग होने पर खुशी थी, क्योंकि जो लोग दिल से नफरत करते हैं, उनसे संबंध रखना कोई अच्छी बात नहीं। लेकिन उन लोगों में भ्राताजी के ससुराल वाले भी थे। भ्राताजी ने कल मुझसे जवाब मांगना था। कारोबारी हालात में सगे भाई भी अलेहदा होते हैं, लेकिन परिवारिक जीवन में ये दरार होना इखलाकी दिवालियापन था। ऐसा सोच कर एक दिन भ्राताजी के ससुराल के घर गया। साथ में द्वारकानाथ गरीब और पी.एफ.सी. के स. ज्ञान सिंह को साथ लेकर गया, इस ख्याल से कि हमारा पारिवारिक जीवन ठीक से चलना चाहिए। लेकिन उन लोगों ने, जिनमें भ्राताजी के साले, उनके ससुर के भाई भोलाराम व कुन्दन लाल ने भी हमारी कोई बात मानी नहीं। और इस तरह हमारा पारिवारिक संबंध टूट गया। गरीब साहब ने रास्ते में मुझे आते हुये कहा- ‘तुम्हारी तो रिश्तेदारी है, कभी फिर इकट्ठे हो सकते हो, लेकिन मेरा संबंध इन लोगों से जिन्दगी भर टूटा रहेगा।’

और जैसा कि मेरा ख्याल था कुछ अरसा बाद भ्राताजी ने मुझसे यह प्रश्न इन अल्फाज में किया, “उन लोगों से तो मैं कोई उम्मीद नहीं रखता। वह तो ऐसे ही हैं। लेकिन तुमसे ऐसा हो जाये, ऐसा सोच भी नहीं सकता। फिर ऐसा क्यों हुआ?’ और मैं अपनी सफाई देने के लिए उन्हें गरीब साहब के पास ले गया कि यह सवाल इनसे पूछो। तब सारे हालात गरीब साहब ने भ्राताजी को सुनाए कि तेरे भाई ने कोई कसर नहीं छोड़ी। अपने पर कोई बात नहीं आने की। हम भी इन लोगों के साथ उन लोगों के पास गये थे। लेकिन वह लोग बिल्कुल नहीं माने। अब मुझे खुशी थी कि भ्राताजी को तसल्ली हो गई कि मैंने पूरी कोशिश की है। कभी ख्याल आता कि मैंने भाभीजी को सीता का दर्जा दिया था। उन्होंने अपने देवर के बारे में भाइयों से इतना भी पूछने की जरूरत न समझी कि बतलाओ मेरे देवर का कसूर क्या है? मैं इस घर की बेटी हूँ, तुमने मेरे देवर से नहीं, मुझसे दुख सुख छोड़ दिया। लेकिन भाभीजी ने ऐसा कुछ भी न सोचा न समझा और न ही किया और उनके भाई के परिवार से हमारा संबंध टूट गया।

फिर भाई श्रीराम, रामलाल मल्होत्रा व सीताराम कपूर को अलग करना पड़ा। कोई चारा ही न था। मजबूरन ऐसा करना पड़ा, फिर भी भाई श्रीराम और बहन गोरज हमसे काफी नाराज रहे। अब हम दो हिस्सेदार बाकी रहे मैं और मेरा ताराचन्द। गरीब साहब को मैंने मना लिया कि तुम्हें सूद नहीं दे सकते, असली रकम दे देंगे। सबसे पहले उसका रुपया उतारने की कोशिश की। बाबू शांति स्वरूप कपूर (सुपुत्र मूलचन्द कपूर) ने गरीब साहब के पास मकान की रजिस्ट्री रखकर रुपया उधार लिया था। उनका आपस में किसी बात पर झगड़ा हो गया, तो मूलचन्द कपूर मेरे पास आया और बोला गरीब साहब जेवर नहीं देता। मैं जाकर गरीब से मिला तो उसने कहा- जैसा फैसला सूद के बारे में हुआ है, उतना सूद यह लोग नहीं देते। मैंने कहा- गरीब साहब, कितना कम देते हैं। ईश्वर ने तुम्हें बहुत दे रखा है, इनसे झगड़ा अच्छा नहीं। मैंने कहा- कपूर साहब रुपये निकालो। उसने असली रकम गिन दी। सूद की रकम काफी बनती थी।

मैंने कुछ रुपया उठाकर गरीब साहब को दे दिया और कहा कि रजिस्ट्री व गहने इन्हें दे दो। गरीब साहब ने पूरा रुपया मेरी झोली में रख दिया और जेवर और रजिस्ट्री लेने घर चला गया। उन्हें रजिस्ट्री और गहने देने के बाद उसने जितना मैंने जितना सूद का रुपया दिया कुछ भी नहीं बोला और आपस में खुशी से दोनों रूखसत हो गये। मेरी छोटी साली, जिसका रिश्ता शांति स्वरूप के साथ हुआ था, एक दिन हमारे घर बातों-बातों में रोने लगी। मैंने उसे प्यार किया और पूछा क्या बात है रोती क्यों हो? उन दिनों मेरे ससुराल वालों की हालत भी मेरे जैसे ही थी। उसे लगता मेरी शादी कैसे होगी। मैंने उसे ढाढ़स बंधाते हुये कहा- रोती क्यों हो, मैं जो बैठा हूँ। तेरी शादी शान से होगी, घबराओ मत।

ऐसे में एक दिन दुकान में इत्तला मिली कि मकान की छत गिरी है। जिस छत के गिरने की इतलाह दी थी, उसी कमरे में राज के साथ अभी-अभी बैठ कर मैं आया था। दौड़ता हुआ घर आया पूरी गली गर्दों के गुब्बारों से आती पड़ी थी। उस मलबे के ऊपर मैंने देखा कि जिस चारपाई पर मैं और राज अभी-अभी बैठे थे। वह टूटी पड़ी थी मेरा दिल धक धक कर रहा था। घर पहुँचने पर सबसे पहले राज से पूछा और उसे गले लगाया। भगवान का शुक्र था, वह नीचे उठकर आई ही थी और छत गिर गई।

राधा कृष्ण कपूर

जन्म - जुलाई 1912 देहांत - 14 जून 1990

3 thoughts on “स्मृति के पंख – 33

  • गुरमेल सिंह भमरा लंदन

    इतने दुःख ? पड़ कर रोने को मन करता है , बहुत दफा सुना है कि यह रिश्ते नाते सब झूठे हैं ,जब ऐसी घटनाएं किसी के साथ होती हैं तो सच ही लगता है . यह छत गिरना तो ऐसा है कि जिस को राखे साईआन मार न सके कोए . इतनी तकलीफें इस शख्स के हिस्से आ गईं पड़ कर बहुत दुःख होता है.

  • Man Mohan Kumar Arya

    Satya palan aur satya dharan ka dharm nibhate huve dikhai de rahe hain charit Nayak Sh Radha Krishan Kapur ji.

  • विजय कुमार सिंघल

    लेखक ने कैसे कैसे दु:ख सहे थे, क्या क्या सहन किया था, पढकर रोना आता है। ईश्वर ऐसे दिन किसी को न दिखाये। लेकिन सबको लेखक जैसी हिम्मत अवश्य दे।

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