आत्मकथा

आत्मकथा : एक नज़र पीछे की ओर (कड़ी 13)

वर्ष 2000 की समस्या

उस वर्ष 1998-99 में कम्प्यूटर वाले एक विचित्र समस्या से जूझ रहे थे। उस समय कम्प्यूटर में तारीखों में वर्ष को 2 अंकों में दिखाया जाता था। सन् 2000 आने पर इससे काम चलना संदिग्ध था और कई कम्प्यूटरों के बेकार हो जाने की आशंका थी। इस आगामी संकट का पता काफी देर से चला। यदि एक-दो वर्ष पहले पता चल जाता, तो शायद संकट इतना गहरा न होता। भारत में हालांकि कम्प्यूटरीकरण उस समय तक कम मात्रा में ही था, इसलिए संकट कम था। लेकिन विकसित देशों में इसको बहुत गहराई से महसूस किया जा रहा था। हमारे कम्प्यूटर भी पुराने थे, लेकिन हमने अपने प्रोग्रामों में सुधार करके इस संकट से बचने के उपाय कर लिये थे।

इस समस्या से निबटने का प्रशिक्षण लेने के लिए मुझे दो बार कोलकाता और एक बार मुम्बई का भ्रमण करना पड़ा। हालांकि इन प्रशिक्षणों से हमें कोई फायदा नहीं हुआ, लेकिन इसी बहाने भ्रमण हो गया। मुम्बई में मेरे सहयोगी अधिकारी श्री के.सी. श्रीवास्तव मेरे साथ गये थे और इलाहाबाद से मेरे मित्र श्री सुधीर श्रीवास्तव भी आये थे। हमने मुम्बई खूब घूमा। सिद्ध विनायक मंदिर, हाजी अली की दरगाह, महालक्ष्मी मंदिर, चौपाटी आदि घूमे और जुहू बीच पर भी गये। हमारा कालेज दादर में समुद्र के किनारे पर है। खाली समय में हम समुद्र तट पर घूमने चले जाते थे। हालांकि वहाँ का पानी रुका होने के कारण बदबू काफी थी।

फिर हमने वर्ष 2000 की समस्या पर अपने मंडल की शाखाओं के अधिकारियों को प्रशिक्षण दिया। हमारी रायपुरवा शाखा में काफी स्थान खाली था। हमने वहीं टेंट हाउस से कुर्सियाँ किराये पर लेकर प्रशिक्षण आयोजित किये। हमने एक-दो बार अपने केन्द्र पर भी प्रशिक्षण कार्यक्रम किये थे, जब सहभागियों की संख्या कम होती थी। ऐसे ही एक मौके पर हमें दो दिन प्रशिक्षण देना था और आपस में यह चर्चा कर रहे थे कि कौन-कौन क्या पढ़ायेगा। उस समय श्रीमती रेणु सक्सेना किसी अन्य शाखा में लगी हुई थीं। इसलिए मैंने मजाक में कहा- यदि रेणुजी होतीं तो बहुत मदद मिलती, क्योंकि वे 10 बजे से 5 बजे तक नाॅन-स्टाॅप बोल सकती हैं। इस पर सब लोग खूब हँसे।

अतुल भारती का कार्य

बैंकों के प्रधान कार्यालय में प्रायः मंडलीय प्रमुखों की बैठकें हुआ करती हैं। हमारे मंडलीय प्रमुख भी ऐसी बैठकों में पूरी तैयारी के साथ जाया करते थे। उनकी तैयारी कराने का दायित्व विकास विभाग पर होता था और इस कार्य में वे विभिन्न विभागों की मदद लिया करते थे। उस समय हमारे मंडलीय कार्यालय के विकास विभाग में श्री मोहम्मद इस्माइल पदस्थ थे। एक बार एक बैठक के लिए चार्ट आदि कम्प्यूटर से बनाने के लिए उन्होंने मेरे कम्प्यूटर सेंटर के अधिकारी श्री अतुल भारती को शाम को बुला लिया। उन्होंने मुझे इस बारे में कुछ नहीं बताया। उस दिन रात को करीब 9 बजे हमारे पास श्री भारती की पत्नी श्रीमती निवेदिता का फोन आया कि भारती जी अभी तक नहीं लौटे हैं और फोन करने पर कह रहे हैं कि मंडलीय कार्यालय में कुछ काम है और जल्दी ही आ जायेंगे। मैंने कहलवा दिया कि आ जायेंगे, चिन्ता मत कीजिए।

लगभग 12 बजे फिर उनका फोन आया कि भारती जी अभी तक नहीं आये हैं और फोन पर कह रहे हैं कि बस आने वाले हैं। मैंने कहलाया कि हो सकता है काम लम्बा हो गया हो। आ जायेंगे। लेकिन सुबह ढाई-तीन बजे फिर उनका फोन आया कि वे अभी भी नहीं आये हैं। अब मुझे चिन्ता हुई। इसलिए मैं तत्काल पैदल ही मंडलीय कार्यालय गया। वहाँ जाकर देखा कि भारती जी चार्ट बनाने में लगे हुए थे। उनको चार्ट बनाने का पर्याप्त ज्ञान नहीं था। इससे चार्ट सही नहीं बन रहा था और वे उससे परेशान थे। परन्तु काम बीच में छोड़ना भी नहीं चाहते थे। यह देखकर मुझे बहुत गुस्सा आया। पहले तो मैंने भारती जी को डाँटा कि जब आपको इसका पूरा ज्ञान नहीं है, तो यह काम क्यों हाथ में लिया है? इस तरह तो आप हफ्ते भर में भी चार्ट नहीं बना पायेंगे। फिर मैंने मो. इस्माइल को भी डाँटा कि जब इनसे काम नहीं हो रहा था, तो मुझे क्यों नहीं बुलाया?

फिर मैंने वह काम स्वयं किया और केवल एक घंटे में सारे चार्ट बनाकर दे दिये। तब मैं घर जाकर सोने गया। इसके बाद यह कार्य मैं स्वयं करने लगा था। बाद में श्रीमती शालू सेठ और कु. तेजविंदर कौर के आ जाने के बाद वे दोनों चार्ट आदि बना देती थीं। वे दोनों इस कार्य में बहुत कुशल थीं।

कानपुर में दंगे

हमें कानपुर में रहते हुए 3-4 साल हो गये थे। कानपुर पूरी तरह शांतिपूर्ण ढंग से चल रहा था। एक दिन श्रीमती वीनू ने कहा कि जब हम वाराणसी में थे तो बहुत सुना करते थे कि कानपुर में बहुत दंगे होते हैं। यहाँ तो कुछ नहीं होता। यह सन् 1999 की बात है। संयोग की बात कि इसके कुछ महीने बाद ही कानपुर में भयंकर दंगे हुए। इनकी शुरूआत भी चमनगंज के कुख्यात क्षेत्र से हुई। बात बहुत मामूली थी। एक हिन्दू दुकानदार और मुस्लिम ग्राहक के बीच कहा-सुनी हो गयी थी। यही बात बढ़ते-बढ़ते साम्प्रदायिक दंगों का रूप ले गयी। जैसा कि हमेशा होता है, प्रारम्भ में हिन्दुओं का बहुत नुकसान हुआ, जिससे पुलिस सक्रिय हो गयी और दंगों का रूप मुस्लिम-पुलिस संघर्ष हो गया। इसके बाद मुस्लिमों को बहुत नुकसान उठाना पड़ा। किसी तरह शांति हुई, परन्तु पुलिस तैनात रही।

एक दिन नई सड़क इलाके में पुलिस गश्त कर रही थी। तभी किसी मसजिद से या उसके पीछे के किसी मकान से चली एक गोली ने एक पुलिस अधिकारी के प्राण ले लिये। इस मूर्खतापूर्ण हरकत का परिणाम बहुत बुरा हुआ। पुलिस ने इसका बदला सामान्य मुसलमानों से चुकाया। लगभग एक माह दंगों में झुलसने के बाद शहर में शान्ति स्थापित हुई।

इन दिनों हमारा बैंक लगभग बन्द था। जो इलाके दंगों के क्षेत्र से बाहर थे, वहाँ की शाखाएँ चल रही थीं, परन्तु बहुत से कर्मचारी और अधिकारी जो दूर से आते थे, उनको छुट्टी दी जाती थी। मुझे भी कई दिन अपना कम्प्यूटर सेंटर बन्द रखना पड़ा, क्योंकि उसका रास्ता परेड से होकर जाता था, जो नई सड़क के मुस्लिम बहुल इलाके से सटा हुआ है। मेरे रास्ते में बकरमंडी भी पड़ता था, जहाँ मुसलमान बड़ी संख्या में रहते हैं।

नये ए.जी.एम. साहब

उन्हीं दिनों हमारे कानपुर मंडल में नये सहायक महाप्रबंधक आये। वे थे श्री शिव नन्दन प्रसाद सिंह (संक्षेप में, श्री एस.एन.पी. सिंह)। ये भी बिहारी थे, लेकिन पिछले साहब श्री सिन्हा की तुलना में एकदम विपरीत थे। इनका स्वभाव बहुत मधुर था और एक मधुर मुस्कान हमेशा इनके चेहरे पर खेलती रहती थी। इनकी विशेषता यह थी कि ये किसी को छुट्टी देने से मना नहीं करते थे। इसी विशेषता के कारण ये सभी अधिकारियों में बहुत लोकप्रिय थे। मेरे ऊपर भी इनका बहुत स्नेह था। प्रारम्भ में शायद मेरी क्षमताओं में उनको कोई सन्देह था, लेकिन तभी मैंने एक कार्य ऐसा किया कि उनको मेरे ऊपर पूर्ण विश्वास हो गया।

हुआ यह कि पहले बैंकों की शाखाओं में आपस में जो लेन-देन होता था, वह दो प्रकार से होता था। एक तो यह कि एक शाखा दूसरी शाखा के नाम जमा सूचना (क्रेडिट एडवाइस) जारी करती थी, जिसकी पावती दूसरी शाखा पहली शाखा को भेज देती थी। दूसरा तरीका यह था कि एक शाखा दूसरी शाखा को नामे सूचना (डेबिट एडवाइस) जारी करती थी और दूसरी शाखा उनको उतनी राशि का क्रेडिट एडवाइस भेजकर लेन-देन पूरा कर देती थी। इनमें पहली विधि पूरी तरह सुरक्षित थी, क्योंकि लेन-देन शीघ्र ही पूरा हो जाता था। परन्तु दूसरी विधि बहुत गड़बड़ थी, क्योंकि दूसरी शाखा लापरवाही से या जानबूझकर किसी कारण से अपनी क्रेडिट एडवाइस नहीं भेजती थी। इससे वह राशि पहली शाखा के बकाया वसूली खाते में पड़ी रहती थी, जिसे बिल्स रेमिटेड खाता (बी.आर. खाता) कहा जाता था। ऐसा प्रायः तब होता था जब किसी बाहरी शाखा का चेक जमा किया जाता था और उसका भुगतान पहले ही कर दिया जाता था।

लगभग सभी शाखाओं में बी.आर. खाते में एक बड़ी राशि इकट्ठी हो गयी थी, जिसकी वसूली नहीं हो रही थी। इसलिए बैंक ने पहला निर्णय तो यह किया कि डेबिट एडवाइस जारी करना पूरी तरह बंद कर दिया। केवल क्रेडिट एडवाइस जारी होने लगे। दूसरा निर्णय यह किया कि बी.आर. खाते में जितनी भी पुरानी प्रविष्टियाँ थीं, उनको समाप्त करने का आदेश दिया। इस आदेश के पालन की जिम्मेदारी कानपुर मंडल में मुझे दी गयी। हमारे तत्कालीन मुख्य प्रबंधक श्री एम. के. पटनायक इसकी देखरेख कर रहे थे। उन्होंने सभी शाखाओं से बी.आर. खाते में बकाया प्रविष्टियों की सूची मँगायी और उसको कम्प्यूटर में भरने के लिए मुझे भेज दिया। उस समय हमारे मंडल में लगभग 22 करोड़ की रकम इस खाते में फँसी हुई पड़ी थी।

मैंने इस सूची को कम्प्यूटर में भरकर उस डाटा के आधार पर सभी शाखाओं के लिए पत्र छपवाये और उनसे तत्काल प्रविष्टि समाप्त करने का अनुरोध किया। जो रकम किसी खातेदार से वसूली जानी थी, वह भी वसूलने का आदेश दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि मात्र एक माह के अन्दर ही यह सारी रकम प्राप्त हो गयी और बी.आर. खाता लगभग खाली हो गया। इस कार्य में बैंक का अधिक खर्च भी नहीं हुआ, केवल एक-एक बार शाखाओं को पत्र भेजने का ही खर्च हुआ। इस कार्य से हमारे सहायक महाप्रबंधक महोदय बहुत प्रसन्न हुए और मेरी क्षमताओं में उनको विश्वास हो गया।

परिचय - डाॅ विजय कुमार सिंघल

नाम - डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’ जन्म तिथि - 27 अक्तूबर, 1959 जन्म स्थान - गाँव - दघेंटा, विकास खंड - बल्देव, जिला - मथुरा (उ.प्र.) पिता - स्व. श्री छेदा लाल अग्रवाल माता - स्व. श्रीमती शीला देवी पितामह - स्व. श्री चिन्तामणि जी सिंघल ज्येष्ठ पितामह - स्व. स्वामी शंकरानन्द सरस्वती जी महाराज शिक्षा - एम.स्टेट., एम.फिल. (कम्प्यूटर विज्ञान), सीएआईआईबी पुरस्कार - जापान के एक सरकारी संस्थान द्वारा कम्प्यूटरीकरण विषय पर आयोजित विश्व-स्तरीय निबंध प्रतियोगिता में विजयी होने पर पुरस्कार ग्रहण करने हेतु जापान यात्रा, जहाँ गोल्ड कप द्वारा सम्मानित। इसके अतिरिक्त अनेक निबंध प्रतियोगिताओं में पुरस्कृत। आजीविका - इलाहाबाद बैंक, डीआरएस, मंडलीय कार्यालय, लखनऊ में मुख्य प्रबंधक (सूचना प्रौद्योगिकी) के पद से अवकाशप्राप्त। लेखन - कम्प्यूटर से सम्बंधित विषयों पर 80 पुस्तकें लिखित, जिनमें से 75 प्रकाशित। अन्य प्रकाशित पुस्तकें- वैदिक गीता, सरस भजन संग्रह, स्वास्थ्य रहस्य। अनेक लेख, कविताएँ, कहानियाँ, व्यंग्य, कार्टून आदि यत्र-तत्र प्रकाशित। महाभारत पर आधारित लघु उपन्यास ‘शान्तिदूत’ वेबसाइट पर प्रकाशित। आत्मकथा - प्रथम भाग (मुर्गे की तीसरी टाँग), द्वितीय भाग (दो नम्बर का आदमी) एवं तृतीय भाग (एक नजर पीछे की ओर) प्रकाशित। आत्मकथा का चतुर्थ भाग (महाशून्य की ओर) प्रकाशनाधीन। प्रकाशन- वेब पत्रिका ‘जय विजय’ मासिक का नियमित सम्पादन एवं प्रकाशन, वेबसाइट- www.jayvijay.co, ई-मेल: jayvijaymail@gmail.com, प्राकृतिक चिकित्सक एवं योगाचार्य सम्पर्क सूत्र - 15, सरयू विहार फेज 2, निकट बसन्त विहार, कमला नगर, आगरा-282005 (उप्र), मो. 9919997596, ई-मेल- vijayks@rediffmail.com, vijaysinghal27@gmail.com

6 thoughts on “आत्मकथा : एक नज़र पीछे की ओर (कड़ी 13)

  1. विजय भाई, आप की कम्पिऊतर नॉलेज को सलाम करना बनता है . जो आप ने दंगों की बात लिखी है , भारत में यह बहुत बुरा होता है . दंगे होते ही रहते हैं . एक बात है कि मुसलमान भारत में जितने सेफ हैं दुनीआं में कहीं नहीं हैं . शिया सुन्नी मज़े से रह रहे हैं . अरबों में ही एक दुसरे की मस्जिदों को बम्बों से उदा रहे हैं .

    1. आभार भाई साहब !
      आपका कहना सही है। मुसलमानों के ७४ फ़िरक़े यानी सम्प्रदाय हैं। आश्चर्य की बात यह है कि संसार में भारत अकेला देश है जहाँ इन सभी फ़िरक़ों के लोग आनंद से रहते हैं और उन सबको बराबर अधिकार मिले हुए हैं।

  2. आपके कार्यालीय कंप्यूटर ज्ञान व कठिन समस्यांओं के समाधान में सफलता के उंदाहरण पढ़कर प्रसन्नता हुई। पूरी कथा रोचक एवं सराहनीय है। हार्दिक धन्यवाद।

  3. शुभ प्रभात भाई
    रोचक जानकारी के साथ सुंदर आलेख

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