आत्मकथा

स्मृति के पंख – 37

1971 में रमेश की नौकरी देहरादून में मिनिस्ट्री आफ डिफेन्स में लग गई और वह देहरादून आ गया। फिर 1972 में मिनिस्ट्री आफ फाइनेंस में देवास में नौकरी लग गई, जहाँ नया प्रोजेक्ट लगाया गया था। वह बराये टेªनिंग 3 माह के लिये इटली और इंग्लैण्ड भी गया था, जो मेरे लिये बहुत बड़ी बात थी और खुशी की भी। अब मुझे गुड्डी के रिश्ते के बारे में फिक्र थी। गुड्डी का कद छोटा था और तालीम भी अपनी बहनों से कम थी। एक दिन मुझे जालंधर जाना था। लड़का देखने के लिये तैयार ही था जाने के लिए कि कौशल्या (गुड्डी की मौसी) आ गई। बातों-बातों में उसने अपने मुहल्ले में एक लड़का देखने को कहा। मैं भी जालंधर जाने की बजाए उनके साथ आ गया। पहले तो लड़का देखा, उसका कारोबार अपने बहनोई के साथ था। लड़के का अपना बिजनेस था केसर, हींग वगैरा सप्लाई करने का। ज्यादा जानकारी मुझे तो उसके बिजनेस की न थी। लेकिन लगता था कि कीमती सामान का खरीद फरोख्त अच्छा रहता होगा।

बाद में जब लड़के के माता-पिता से मिला तो उनके पिता जी श्री धूमचन्द जी के स्वभाव और बातचीत से मैं ज्यादा मुतस्सर हुआ। जब मैंने अपना इरादा जाहिर कर दिया तो उन्होंने ने इतना ही कहा कि आप लड़की को मासी के घर भेज देवें, हम उधर ही देखे लेंगे। अगर लड़की पसंद आ गई तो फिर आगे बात करेंगे। और उसी ही दिन शाम 4 बजे उन लोगों ले गुड्डी को देखकर हां कर दी और मंगनी हो गई। जिस लड़की के बारे में मुझे ज्यादा फिक्र थी, उसका रिश्ता होने में जरा भी देर न लगी। अपना कारोबार भी अच्छा था। सुभाष जब कभी लुधियाना आता माता जी को रुपया दे जाता। मैंने खुद कभी बच्चों से रुपया नहीं मांगा। खुद से सुभाष माता जी को दे जाता, लिहाजा मुझे अच्छा लगता। सुभाष की शादी के बारे में शिद्दत से तमन्ना थी। मेरा शुरू से विचार था कि तलवार खानदान से सम्बन्ध जरूरी है। मेरी ख्वाहिश थी कि उनके घर की लड़की अगर मेरी बहू बन जाये तो सोने पर सुहागा होगा। मुझे कस्तूरी के लड़की का ख्याल आ गया। एक तो कस्तूरी और उसकी बीवी दोनों खुशसीरत थे और मुझे पता था कि उनकी एक लड़की सयानी भी है। ऐसा इरादा लेकर देहली कस्तूरी के घर राजेन्द्र नगर गया। कस्तूरी रेडियो स्टेशन में काम करता था, खूब मिले। फिर उसे अपनी दिली खवाहिश कह दी। अव्वल तो उसे इस बात की खुशी भी थी कि मेरा लड़का इंजीनियर है, दूसरा बराये रोजगार है, फिर भी उसने कहा कि मैं बड़े भइया भीष्म से और माता जी सलाह करके तुम्हें जवाब दे सकूँगा। कुछ ही दिनों बाद मंडी में एक फेरी वाले से एक छोटा सा रुक्का मिला, जिस पर लिखा था- ‘मैं अपने एक दोस्त की लड़की की शादी पर आगे जा रहा हूँ कल 7 बजे मेरा इंतजार करना, मैं वापस आकर रात तेरे यहाँ रहूँगा।’ और साथ ही लिखा था- ‘तू भी सोचेगा मैं कहाँ से टपक पड़ा।’

बाकी मुझे अनन्तराम से मिलने की बहुत खुशी थी और कल 7 बजे का इंतजार करने लगा। ठीक समय पर अनन्तराम भाभी नीलम के हमराह अपनी कार से आये थे। भाभी नीलम से तो कई दफा पहले मुलाकात हो चुकी थी। उनकी मासी जी यहाँ सरधना रहती थी। जब भी आते तो मुझे और बच्चों को जरूर मिल कर जाते थे। एक दिन ऐसा इत्तेफाक भी हुआ जबकि जिस दिन उन्होंने मुझे कहा मैं आऊंगी ओर वह न आये, तो मैं समझा कि वे बगैर मिले चले गये हैं। लेकिन दूसरे दिन आ गये, मैंने उन्हें कह दिया कि मैं तो सोच बैठा था कि शायद आप बगैर मिले चले जायेंगे। उन्होंने कहा- ‘भई ऐसे भी हो सकता है? जब मैं वापस जाती हूँ तो पूरी डिटेल पूछते हैं। अगर मिलकर न जाती तो उन्हें जवाब कैसे देती?’ और मुझे भाभी नीलम के जवाब से खुशी हुई कि आपके प्यार मेल में कोई कमी नहीं आई बल्कि जुदाई के बाद प्यार बढ़ा है। और आज वो जोड़ी मेरे सामने खड़ी थी। कितना अरसा गुजर गया था। बहुत खुशी हुई उन्हें मिलकर। उनकी भतीजी कस्तूरी लाल की लड़की की बारे में सारी बातचीत कही।

दूसरे दिन जब हमसे विदा होने लगे तो अनन्त राम ने कहा कि कस्तूरी की लड़की बी0ए0 फर्स्ट डिवीजन है और पढ़ रही है। दो साल बी0ए0 के, फिर आगे तालीम जारी रखें, तो भी दो साल का अर्सा गुजर सकता है, जबकि सुभाष तो फस्र्ट क्लास इंजीनियरिंग करके बारोजगार बन चुका है। तुम्हें तो फौरी शादी करनी है। मेरी निगाह में एक बढ़िया लड़की है। वह भी तलवार है, लड़की को मैं अपनी बेटी बराबर समझता हूँ। उस लड़की के बारे में तुम्हें अपनी सलाह देता हूँ। मेरी भतीजी से ज्यादा खूबसूरत भी है, लड़की एम0ए0 तक पढ़ी लिखी है। ज्यादा नेक है और खासबात है कि वह घरेलू लड़की है। जिसमें पूरे खानदान का भी मुझे बखूबी इल्म है। फैसला करना तुम्हारा और लड़की वालों का काम है। तुम मुझमें पूरा इत्तेफाक करोगे, यकीनन ही लड़की का पिता तलवार साहब भी जरूर फैसले का ऐहतेराम करेंगे। ऐसी बातचीत कर वे चले गये।

निर्मला की शादी हो जाने पर मुझे लगता कि उसकी माता जी के साथ पूरा सहयोग घर की देखभाल शायद गुड्डी यकीनन न कर सके क्योंकि मुझे गुड्डी में ज्यादा बचपना लगता था। लेकिन अपने आड़े वक्त में गुड्डी ने बहुत ज्यादा तआकुन (सहयोग) और कदर माता जी की, और बाहर का काम पूरी जिम्मेदारी से निभाया। वही बात सच हुई कि एक जन जाए दूजा आये, फिर भी जोत जले। निर्मला के बाद जो खला (सूनापन) मैं समझता था बिल्कुल न हुआ। छोटी उम्र से ही केवल आज्ञाकारी बेटा था रमेश। बड़ा था वो तो भाग दौड़ कर लेता, सुभाष के साथ लड़ता झगड़ता भी था, जब मुझे निर्मला ने बताया। लेकिन केवल में कोई ऐसी बात न थी, बचपन में आज्ञाकारी था ही, लेकिन जब वह सयाना हुआ, तो उसे ऐसा लगा जैसे हमने प्यार कम दिया है। प्यार तो हमारा उसके प्रति ज्यादा था, लेकिन शायद वो व्यवहार में कुछ कमी रह गई हो, तभी उसे ऐसा लगता था लेकिन मुझे केवल पर ज्यादा प्यार आ जाता था। मां बाप का दिल कैसा होता है अपने लोगों के प्रति उनके मन में न जाने ऐसे ही प्यार पैदा क्यों होता है?

1971 में जब रमेश को सर्विस देहरादून में लग गई थी, तो उसने केवल को, जिस किराये के मकान में खुद रहता था, बोर्डिंग से निकाल कर अपने यहाँ रक्खा, ताकि दोनों भाई मिल जुल कर रहें। कुछ अर्से तक दोनों भाई इकट्ठे रहे।

परिचय - राधा कृष्ण कपूर

जन्म - जुलाई 1912 देहांत - 14 जून 1990

3 thoughts on “स्मृति के पंख – 37

  1. लेखक को अपने कठोर परिश्रम का फल मिलना ही था।

  2. जिंदगी पटरी पर आ ही गई , जिंदगी से लड़ता लड़ता इंसान बूडा हो जाता है , जीना इसी का नाम है.

  3. आज की कहानी में अनेक सुखद घटनाएँ पढ़कर प्रसन्नता हुई। श्री राधा कृष्ण कपूर जी का जीवन अब सुख व शांति के मार्ग पर अग्रसर है। अच्छा लग रहा है।

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