कविता

हर एक पल कल-कल किए

हर एक पल कल-कल किए, भूमा प्रवाहित हो रहा;

सुर छन्द में वह खो रहा, आनन्द अनुपम दे रहा ।

सृष्टि सु-योगित संस्कृत, सुरभित सुमंगल संचरित;

वर साम्य सौरभ संतुलित, हो प्रफुल्लित धावत चकित ।

आभास उर अणु पा रहा, कोमल पपीहा गा रहा;

हर धेनु प्रणवित हो रही, हर रेणु पुलकित कर रही ।

सीमा समय की ना रही, मीमांसा भास्वर रही;

युग निकलते क्षण बिखरते, हैं पात्र मधुरम विचरते ।

हर देश शाश्वत हो रहा, रुन- झुन सुने झंकृत रहा;

‘मधु’ मानसी गति तज रहा, लय ले प्रमित थिरकित रहा ।

— गोपाल बघेल ‘मधु’, टोरोंटो, ओंटारियो, कनाडा

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