कविता

मेरा नाता

जिधर देखती हूँ,
गम की परछाइयाँ है|
ना मुहब्बत की डगर,
ना प्यार की खाइयाँ है |

दुःख को ही बना लिया है,
हमने अपना|
खुशी तो लगती है अब कोई,
भयानक सपना|

दुःख से ही है ,
अब मेरा नाता |
खुशी के बदले,
गम ही है भाता |

दुखी मिलता है,
जब कोई अदना |
रिश्ता है कोई ,
लगता है अपना |

गम को कहो,
कैसे छोड़ दूँ|
किस्मत को ,
भला कैसे मोड़ दूँ|

किस्मत व गम,
जब दोनों ही है पर्याय|
तो फिर क्यों करूँ,
मैं हाय -हाय|

सुख ने तो कुछ ही पल,
पकड़ा था हाथ|
गम ही ने तो निभाया है,
जीवन भर साथ |
+++सविता मिश्रा +++

*सविता मिश्रा

श्रीमती हीरा देवी और पिता श्री शेषमणि तिवारी की चार बेटो में अकेली बिटिया हैं हम | पिता की पुलिस की नौकरी के कारन बंजारों की तरह भटकना पड़ा | अंत में इलाहाबाद में स्थायी निवास बना | अब वर्तमान में आगरा में अपना पड़ाव हैं क्योकि पति देवेन्द्र नाथ मिश्र भी उसी विभाग से सम्बध्द हैं | हम साधारण गृहणी हैं जो मन में भाव घुमड़ते है उन्हें कलम बद्द्ध कर लेते है| क्योकि वह विचार जब तक बोले, लिखे ना दिमाग में उथलपुथल मचाते रहते हैं | बस कह लीजिये लिखना हमारा शौक है| जहाँ तक याद है कक्षा ६-७ से लिखना आरम्भ हुआ ...पर शादी के बाद पति के कहने पर सारे ढूढ कर एक डायरी में लिखे | बीच में दस साल लगभग लिखना छोड़ भी दिए थे क्योकि बच्चे और पति में ही समय खो सा गया था | पहली कविता पति जहाँ नौकरी करते थे वहीं की पत्रिका में छपी| छपने पर लगा सच में कलम चलती है तो थोड़ा और लिखने के प्रति सचेत हो गये थे| दूबारा लेखनी पकड़ने में सबसे बड़ा योगदान फेसबुक का हैं| फिर यहाँ कई पत्रिका -बेब पत्रिका अंजुम, करुणावती, युवा सुघोष, इण्डिया हेल्पलाइन, मनमीत, रचनाकार और अवधि समाचार में छपा....|