कविता

“मत ठुकराओ सनम”

बोलो सजन मंजूर है क्या

तनिक बताओ कसूर है क्या

छाई रहूँ कि परछाई रहूँ

तेरे नैनों में मेरा गुरुर है क्या ||

नजरों में तेरा ही श्रृंगार करूँ

हर पल तेरा ही दीदार करूँ

तुं माने कहाँ तुं जाने कहाँ

तुझे सपनों में पाके गुहार करूँ ||

तुं रूठा रहें मै मनाती   रहूँ

सांसों से सांसें मिलाती रहूँ

तुने पिया मेरा गहना लिया

अब किस जेवर को लुटाती रहूँ ||

मानों सनम मत जाओ सनम

सौतन से न नेह लगाओ सनम

खोल चित-चितवन से देखों मुझे

सात फेरों को मत ठुकराओ सनम ||

महातम मिश्र

*महातम मिश्र

शीर्षक- महातम मिश्रा के मन की आवाज जन्म तारीख- नौ दिसंबर उन्नीस सौ अट्ठावन जन्म भूमी- ग्राम- भरसी, गोरखपुर, उ.प्र. हाल- अहमदाबाद में भारत सरकार में सेवारत हूँ

2 thoughts on ““मत ठुकराओ सनम”

  • विजय कुमार सिंघल

    वाह

    • महातम मिश्र

      सादर धन्यवाद विजय कुमार सिंघल जी, आप की प्रतिक्रिया से मनोबल बढता है

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