आत्मकथा

स्मृति के पंख – 43

अब नये काम के लिए, जो टी0वी0 का लाइसेंस मिला था, काफी रुपये की जरूरत थी। मैंने वह प्लाट जो कोठी बनाने के लिए खरीदा था, फरोख्त करके इक्कीस हजार रुपये शांति स्वरूप और तिलकराज को दे दिया और कार्य स्टार्ट हो गया। तिलक टेलिविजन के नाम से बैंक से कर्जा भी लिया गया। दफ्तर भी खुल गया, लेकिन दिलों में अंधेरा था। फसल पक जाने पर अगर बांट होती, तो बात भी थी। अभी तो दाना भी न पड़ा था। खटपट शुरू हो गई शांतिस्वरूप का रवैया डिक्टेटराना था, वो चाहता था कि जो काम हो मेरी मरजी से हो। जबकि तिलकराज और प्रकाश को ऐसा अच्छा न लगता। फिर मामूली बातों पर आपस में रंजिश होने लगी। यहाँ इत्तफाक और प्यार न रहे, वहाँ भरोसा कहाँ रहता है? जब बदगुमानी बढ़ गई तो साथ चलना कैसे होता, मैं तो पार्ट टाइम साथी था और सुभाष ने भी आना जाना छोड़ दिया। एक दिन तिलकराज, प्रकाश और शान्तिस्वरूप मेरे पास आए कि दो हिस्से हैं आपके, इसलिए एक हिस्सा सुभाष और तुम्हारा, लिहाजा रुपया और लगाओ। मैंने नामन्जूरी जाहिर की तो फैसला हुआ कि बाकी रुपया शांतिस्वरूप लगाएगा। मैं अपना हिस्सा छोड़ दिया। शान्तिस्वरूप ने अपनी बीबी बाला का नाम कर लिया। शान्तिस्वरूप ने रुपया भी लगाया, कोशिश भी की, लेकिन उसके मन में भेदभाव की ज्वाला भड़क उठी थी, उसे वो बुझा न सका और फिर बात कोर्ट कचहरी तक जा पहुँची।

मैंने तिलकराज और प्रकाश को कहा, मैं जाहिरा तौर पर शान्तिस्वरूप के सेक्शन में रहूँगा, मगर कोशिश मेरी होगी कि किसी तरह उसे राहे रास्ते पर ले आऊँ, और आप सब मिलकर काम करें। शुरू में तो उन्होंने मुझ पर भरोसा किया, बाद में शायद उन्हें लगा मैं उन्हें धोखा दे रहा हूँ, जबकि मुझे अपने ससुर जी ने कह दिया कि ’तुम मेरे बेटों पर दावा करोगे‘, तो मुझे झटका लगा कि वह कैसी बात पिता जी ने कर दी। मेरी तो नेक ख्वाहिश है अपने सालों के प्रति अगर पिताजी ने ऐसा कहा था तो उन्हें ऐसी बातें कही गईं होंगी। फिर एक मौका ऐसा आ गया जबकि शान्तिस्वरूप मुझसे किसी कागजात पर दस्तखत लेने लगा। मैं खुद तो अंगे्रजी पढ़ नहीं सकता था। केवल से पढ़वाया और राय ली, तो केवल ने कहा पिताजी हम इन कागजात पर दस्तखत नहीं करते और मैने दस्तखत नहीं किये।

तिलकराज और प्रकाश को तो शायद मुझ पर शान्ति स्वरूप का साथ देने का शक ही था। लेकिन शान्ति स्वरूप को तो अब यकीन हो गया कि मैं उसका साथ देने को तैयार नहीं हूँ। इस तरह मेरी साली और साड़ू ने मुझसे तआल्लुक तोड़ दिया। 21 हजार रुपये नकद उन्हें दिया और दो महीने लगातार अपने घर में उन्हें रक्खा था कि शायद कोई रास्ता निकल आए, लेकिन सब बेसूद और आखिर में सब समेट कर शान्तिस्वरूप देहली चला गया। अब मुझे एक ही खटका रहता कि बैंक का रुपया अगर वापस न हुआ तो बैंक मुझसे वसूल कर सकता है। लेकिन बैंक ने अपनी वसूली शान्तिस्वरूप से करने को यकीनी बनाया, क्योंकि सब कुछ संभाला था शान्तिस्वरूप ने। इस काम के लिए लाइसेंस मिलने की खुशी और आज के भयानक नतीजे को देख कर लगता कि इन्सान, तू क्या है, सिर्फ एक कठपुतली, जिसके नाचने का धागा ऊपर वाले के हाथ में है।

मुझे 21 हजार का इतना दुख न था, जमीन बिक गई इसका भी दुख न था, सुभाष की मुलाजमत (नौकरी) जाने का मुझे बेहद दुख था, जिसे हासिल करने के लिए मेरी बरसों की तैयारी और सुभाष की पूरी मेहनत बेकार हो गई थी। दावा करने से पहले मैंने बरखू लाल तलवार से अमृतसर मिलना चाहा, शायद वो कोई रास्ता निकाल सके। मैं फोन पर उनसे तारीख फिक्स करके, सुभाष को साथ लेकर उसकी कोठी पर अमृतसर पहुँचा। उन दिनों वह अमृतसर रहता था। बड़े लम्बे अर्से बाद मिला था। उसे ये हैरानी थी कि ऐसा हुआ कैसे उसके साथ एक दूसरे सज्जन भी बैठे थे। सुभाष से भी उसी ने पूछा चीफ इन्जीनियर से मिले? फिर उसने चीज इन्जीनियर के लिए एक खत दिया। दूसरे दिन हम दोनों उन्हें दफ्तर में मिले। उन्होंने हमारे सामने फोन किया और यह भी कहा कि तलवार साहब का आदमी है, यह काम करना ही है। हमें चन्द दिन बाद आने को कहा जब देखना हम उन्हें मिलने गये तो उनकी तबदीली हो गई थी। वे चार्ज देकर चले गये थे। आखिरी आशा की किरन जो फूटी थी, वह भी बुझ गई थी।

क्वार्टर जो सुभाष को मिला था उसने पूरा सामान हमारा पड़ा था। पड़ोसी जो क्वार्टर के निचले हिस्से में रहते थे, उन्होंने हमें तार दिया कि महकमे ने क्वार्टर खाली करवा कर तुम्हारा सारा सामान नीलाम कर देगा। पता करने पर मालूम हुआ कि महकमे ने सुभाष के किराये के चार हजार रुपये बना दिये थे। नौकरी से तो सुभाष को डिसमिस कर दिया था क्वार्टर उसके कब्जे में था। उसे हिदायत थी और रुपया देना भी जरूरी था। सामान अपने बेटे और बहू का नीलाम हो जायेगा। मेरे लिए तो उनकी तो पूरी तस्वीर दिखती थी, जो उनकी शादी के समय मेरी आंखों ने देखी थी। लेकिन अब रुपये का इन्तजाम करना मुश्किल था। मैंने केवल को कहा कि अदालत में किश्तों में देने के लिए दरख्वास्त दे और अदालत ने चार किश्तों में रकम देने के लिए हमारी दरख्वास्त मंजूर कर ली। एक किश्त तो राकेश ने दे दी। बाकी के लिए मैंने रमेश को लिख दिये कि एक-एक हजार की बकाया किश्तें तुम भिजवाते रहना, तब कहीं जाकर हम अपना सामान निकाल सकते हैं।

रमेश उन दिनों देवास में था और फिर थोड़े अर्से बाद, शायद एक साल बाद केवल को भी नौकरी से निकाल दिया। जिसकी वजह भी केवल से जुबानी कुछ पता न चल सकी। मैं केवल को साथ लेकर देहली मोदी साहब को कोठी पर उन्हें मिलने गया। मुलाकात भी हुई लेकिन उसने कहा मैंने इसके काम को देखकर इसे निकाल दिया है। यह हमारे काम का नहीं है। मैंने दोबारा भी कहा लड़का एलएल0बी0 है, समझ लेगा, उसे बहाल रखिये लेकिन वो माना नहीं। पहले सुभाष की समस्या थी, अब केवल की भी हो गई। अगर ज्यादा पढ़े लिखें न होते तो उन्हें छोटा-मोटा काम करने को कहता। अब मुश्किल है कि दोनों अच्छे तालीमयाफ्ता हैं। केवल ने तो लुधियाना में प्रैक्टिस करना नहीं माना और चंडीगढ़ मान गया। मैंने कहा ठीक है चंडागढ़ ही सही मगर कुछ करो, वह चंडीगढ़ प्रैक्टिस करने चला गया।

हम काम में मेहनत के बाद ही कामयाबी मिलती है। खास तौर पर वकालत और डाक्टरी, जिसमें अच्छी सूझ-बूझ और मेहनत के साथ मंजिल मिलती है। थोड़ा बहुत काम भी केवल को मिल जाता, तो भी मुझे तसल्ली मिल जाती। मैं उस वक्त का इन्तजार करता जब हमें कामयाबी मिलेगी। शादी की फिक्र भी करनी है। द्वारका नाथ गरीब साहब जिसने मेरे सारे बच्चों को देखा था, तो सुभाष के शगुन लेने के समय भी बुलाने पर आया था। उसकी एक ही लड़की थी, दूसरी कोई औलाद न थी। उससे बातचीत हुई। मुझे लगा उसे खुशी हूुई, क्योंकि मेरा तो सब कुछ आइने की तरह जीवन उसके सामने था। जब कभी दुकान पर मिलने आता तो भी घंटा आधा घंटा बातें होतीं। बात आगे बढ़ती रही और फिर एक दिन लड़के लड़की को दिखाने को स्टेज तक हम पहुँच गये। काफी हाउस में दोनों ने एक दूसरे को देखा, साथ में हम भी थे। काफी देर बातें हुई और यह कर हम जुदा हुए कि मैं तुम्हें जवाब दूँगा। तकरीबन एक हफ्ता बाद उसका रुक्का मिला जिसमें लिखा था, मुझे खुशी है। लेकिन अगर तुम छोटे लड़के के लिए मंजूर करो तो। मैंने रुक्का फाड़ दिया और सोचने लगा कि क्या गरीब साहब अपने आपको पठान कह सकने के काबिल हैं। जिस लड़के के साथ एक साथ बैठकर तूने लड़की को दिखाया, खिलाया, पिलाया और मुझसे यह उम्मीद रखता है कि वही लड़की मैं अपने छोटे लड़के के लिए स्वीकार कर लूँगा? मुझे अफसोस आया गरीब साहब की अक्ल पर, तुमने अगर ना करनी है तो साफ ना कर दो। इससे पहले मैं कमलेश और सुभाष उसके घर भी गये थे और गरीब साहब हर पड़ाव पर आगे ही बढ़ते गये, बस आखिर में उसने जो लिखा वह मुझे बहुत तल्ख लगा। मैंने रमेश को लिख दिया कि सुभाष और कमलेश को मैं तुम्हारे पास भेज रहा हूँ इसलिए कि उसका मन भी लगे और तुम कोई काम भी उनको दिलवा दो। उन्हें इस हालत में देख कर मुझे अच्छा नहीं लगता, हो सकता है वहाँ सेट हो जाए और सुभाष, कमलेश, बेटी आशु के हमराह देवास चले गये। देवास में भी सुभाष के लिए नौकरी का बन्दोबस्त रमेश ने कर दिया था।

सुभाष ने देवास की नौकरी भी छोड़ दी। रमेश के साथ जो कार्ड का काम, जो रमेश ने वहाँ अपना निजी शुरू किया था, जिसमें स्क्रीन प्रिंटिंग का काम रूमालों पर और कार्डों पर करता था। जिसमें वहाँ उसकी आमदनी भी थी और काम भी काफी करने से उसका मन लगा रहा। उसके सरकारी क्वार्टर में ही दोनों भाई रह रहे थे।

परिचय - राधा कृष्ण कपूर

जन्म - जुलाई 1912 देहांत - 14 जून 1990

3 thoughts on “स्मृति के पंख – 43

  1. विचारे राधा कृष्ण जी , इस को कहते हैं घोर तपस्या . सुना था कुछ लोग पुठे लटक कर तपस्या करते थे .यह पुठे लटकना नहीं तो और किया हो सकता है . जब कभी ल्दाइआन झगडे होते हैं तो ऐसी सथितिओन में खून हो जाते हैं . ऐसा ही हमारे साथ ताऊ रतन सिंह और उस के बेटे ने किया था . ताऊ के बेटे ने तो पिता जी को मरवाने का प्रोग्राम भी बनाया हुआ था , अटैक हुआ ,पिता जी बहुत जख्मी हुए लेकिन बच गए . अब ना ताऊ है ना ताऊ का बेटा और ना मेरे पिता जी लेकिन सचाई की जीत होती है , ताऊ के खानदान का गाँव से नामोनिशान ख़तम हो गिया है , उन के कोई बेटा नहीं हुआ ,खानदान ख़तम हो गिया . लेकिन इंसान समझता ही नहीं है .

  2. पूरी कथा पढ़ी। श्री राधा कृष्ण कपूर जी के जीवन की गाड़ी ऊबड़ खाबड़ मार्ग पर चली जा रही है। अगली क़िस्त का इंतजार है।

  3. लेखक को अपनी सज्जनता का मूल्य कई बार चुकाना पड़ा. सगे सम्बन्धियों ने उनको कदम कदम पर धोखा दिया. यह बहुत शर्मनाक है. ऐसे सम्बन्धी भी होते हैं. फिर भी लेखक का धैर्य प्रशंसनीय है.

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