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अंतर्मन में झांकने की जरूरत

एक टी वी चैनेल के बहस में एक भाजपा नेत्री ने कहा – “केजरीवाल को अंतर्मन में झांकने की जरूरत है”. उसी बहस में कांग्रेस के नेता जे. पी. अग्रवाल ने कहा – “अगर केजरीवाल अपनी बात पर टिके नही रहते हैं तो जनता का राजनीतिज्ञों पर से भरोसा उठ जाएगा. मानता हूँ, वे अभी नए हैं, पर वे तो नयी राजनीति का वादा कर के आए हैं. जनता ने उनपर अभूतपूर्व भरोसा किया है. या तो वे जनता से किये गए वादों को पूरा करें या फिर इस तरह के अव्यवहारिक वादा करने से दूसरी राजनीतिक पार्टियाँ भी बचें”.
निश्चित ही सैधांतिक रूप से कही गयी दोनों नेताओं की बातें समीचीन है, पर यह सिर्फ केजरीवाल के लिए नहीं, सबके लिए. केजरीवाल तो नए हैं अभी राजनीति सीख रहे हैं. गलतियों से सीख लेते हैं, माफी भी माँगते हैं, यथोचित सुधार भी करते हैं. अब फिर से प्रशांत भूषण और योगेन्द्र यादव को पार्टी में लौटने की बात कह रहे हैं. शायद उनको अपनी भूल का अहसास हो रहा है. विभिन्न मुकदमों में और सार्वजनिक स्तर पर उनकी बहुत छीछालेदर हो रही है. उनके कई मंत्री और विधायक विवादों में फंसते जा रहे हैं. अंतत: उनकी विश्वसनीयता पर सवाल उठना भी लाजिमी है. फिर अपने द्वारा किये कार्यों का बहुत महंगा और बार-बार प्रचार, मोदी जी को भी परास्त कर दे रहा है. शायद यह उनकी आगे की रणनीति का हिस्सा हो.
पर, मेरा कहना है कि सभी को अपने अंतर्मन में झांकने की जरूरत है, चाहे वो मोदी जी हों, भाजपा के वरिष्ठ और सम्मानित नेता या अन्य पार्टियों के नेता. सभी अतिउत्साह में उल्टा-सीधा बयान दे देते हैं और बाद में उसको सही साबित करने का असफल प्रयास करते हैं या गलत ढंग से पेश किये जाने पर अपना स्पष्टीकरण देते फिरते हैं.
केजरीवाल जब लोगों से चंदा मांगते हैं तो उनको गलत ठहराया जाता है और दूसरी पार्टियाँ जिनमे भाजपा सबसे आगे है, अपने प्रचार प्रसार में जो खर्चे करती है, वो धन बिना चंदे के कहाँ से आता है? वह भी तो बतलाना चाहिए. केजरीवाल का तो सब कुछ सामने उनके साईट पर उपलब्ध भी रहता है. दूसरी पार्टी का लेखा-जोखा कहाँ रहता है? इसकी छान-बीन भी तो होनी चाहिए. मोदी जी का बनारस दौरा तीसरी बार रद्द हुआ. हर बार महंगे पंडाल बनाये गए और इस बार तो एक मजदूर की मौत भी हो गयी. एक बयान भी जारी नहीं किया गया. केजरीवाल की सभा में एक किसान ने आत्महत्या कर ली तो खूब हंगामा हुआ और
केजरीवाल की पार्टी ने उसका मुआवजा भी दिया, माफी भी माँगी पर मोदी जी ?
आज दिल्ली में कानून ब्यवस्था की जो स्थिति है, उसके लिए दिल्ली पुलिस जो केंद्र के अधीन है, क्या कर रही है और उसके लिए केंद्र सरकार कितनी दोषी है इसका भी तो मूल्यांकन होना चाहिए. दिल्ली पुलिस जितनी सक्रियता के साथ आम आदमी पार्टी के सदस्यों, विधायकों पर पैनी नजर रख कार्रवाई करती है, उतनी ही पैनी दृष्टि दूसरी तरफ क्यों नहीं जाती? उप-राज्यपाल और केजरीवाल सरकार के बीच जो जंग लगातार जारी है, उसपर केंद्र सरकार ख़ामोशी क्यों अख्तियार कर लेती है. दिल्ली के मुख्य मंत्री को प्रधान मंत्री से मिलने का समय तक नहीं दिया जाता है, वही पी. एम. किसी से भी रात के दो बजे भी मिलने का वादा करते हैं. दिल्ली की केंद्र सरकार तीसरी बार भूमि अधिग्रहण बिल पर अद्ध्यादेश लाकर फिर उसे ठंढे बसते में डाल देती है. इसे क्या कहा जाय? कानून विशेषज्ञ ही इस पर अपनी राय रख सकते हैं, पर किरकिरी तो मोदी सरकार की हुई है. उसी तरह विदेशों में भले ही भारत का नाम आज आदर के साथ लिया जा रहा है, पर काफी जगहों पर खासकर अमेरिका, चीन और पाकिस्तान में किरकिरी भी हुई है.
वित्त विभाग के आंकड़े बताते हैं कि प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में बृद्धि हुई है. उत्पादन बढ़ा है, पर जबतक उसका लाभ आम जनता तक नहीं पहुंचता, उपलब्द्धि नहीं कही जा सकती. क्या बेरोजगारों को रोजगार देने में यह सरकार कामयाब हुई है. कृषि उत्पाद के बेहतर उत्पादन, उसके रख-रखाव और वितरण में सुधार हुआ है? मोदी जी की यही तो कल्पना थी- “सबका साथ सबका विकास”- हो रहा है क्या? इसक सही उत्तर तो बिहार विधान सभा के चुनाव में ही पता चल सकेगा. बिहार में १५० आधुनिक रथों को हरी झंडी दिखा दी गयी, पर बिहार के लिए ‘विशेष पैकेज’ का क्या हुआ? कुछ निवेश को बढ़ावा दिया गया क्या? शिक्षण संस्थान, आधारभूत संसाधन में बृद्धि हुई क्या? मेरा मानना है कि अगर काम का असर धरातल पर दिखेगा तो प्रचार-प्रसार की बहुत ही कम आवश्यकता होगी. टी. वी. पर खूब विज्ञापन आते हैं गैस सब्सिडी छोड़ने की. लाखों लोगों ने सब्सिडी छोडी भी है, पर उसका लाभ गरीब लोगों तक पहुंचा है क्या? ये आंकड़े भी बताये जाने की आवश्यकता है. प्रधान मंत्री जन-धन योजना, बीमा और पेंशन योजना का धरातल स्तर पर लाभ के आंकड़े को भी दिखाने की जरूरत है. किसानों को ऋण देने में सहूलियत हुई है क्या? जमीन की मिट्टी की जांच कायदे से हो रही है क्या? तदनुसार फसलें लगाई जा रही है क्या? संतुलित उत्पादन और उसका संतुलित वितरण ब्यापक चीज है. जिसका समुचित पालन जरूरी है ताकि किसान आत्महत्या न करे और उन्हें उचित मुआवजा दिया जाय.
‘कोलगेट’ के उद्भेदन से सरकार को फायदा हुआ है, पर बहुत सारी बिजली कंपनियों(जिनमे डी. वी. सी. शामिल है) को कोयले के अभाव में अपने जेनेरेटर बंद करने पड़ रहे हैं. टाटा स्टील जैसी कंपनी को पिछले दिनों लौह अयस्क और कोयले की आपूर्ति में बाधा पहुँची है.यह सब नौकरशाही और सरकारी कामों के समयबद्ध निस्तारण न होने के कारण हुआ है. फिर ‘डिजिटल इण्डिया’ और ‘मिनिमम गवर्नमेंट और मैक्सिमम गवर्नेन्स’ का गाना किस लिए? नौकरशाही के कार्यप्रणाली में बदलाव लाने की जबर्दश्त आवश्यकता है.
स्वच्छ भारत अभियान का परिणाम कितना सामने आया है? क्या सभी शहर और गांव स्वच्छता के प्रति जागरूक हुए हैं? इसका परिणाम तो तभी दिख जाता है, जब थोड़ी सी वर्षा में दिल्ली, मुंबई और चंडीगढ़ शहरों में जल जमाव हो जाता है.जम्मू कश्मीर और केदारनाथ की यात्राओं में लगातार ब्यवधान जारी है.
मैं तो कहूँगा कि हम सबको अपने अन्दर झांकने की जरूरत है …क्या हम अपनी ड्यूटी सही तरीके से कर रहे हैं? क्या हम स्वच्छता को अपना रहे हैं? क्या हम प्राकृतिक संसाधनों का सही इस्तेमाल कर रहे हैं? क्या राष्ट्र भावना हम सब में जाग्रत हुई है? क्या हम अन्याय का विरोध कर पा रह हैं? क्या हम किसी कमजोर की मदद कर रहे हैं?. क्या हम सरकारी हेल्प-लाइन का इस्तेमाल कर रहे हैं? क्या हमारी किसी भी शिकायत का असर हो रहा है? अगर नहीं तो हम सबको अन्दर झांकने की जरूरत है…”पर उपदेश कुशल बहुतेरे” …यह तो हम सभी जानते हैं.
इसके अलावा और बहुत कुछ बातें हैं जो मोदी सरकार को सोचने की जरूरत है- जैसे बुजुर्ग फौजी महीने भर से एक रैंक एक पेंसन के लिए हड़ताल पर है और सांसदों को वेतन भत्ते बढ़ाये जाने की मांग हो रही है. गेस्ट अध्यापकों से वादाखिलाफी करके घर बैठा दिया गया है. हरियाणा के किसानों का 350 करोड़ रूपये का भुगतान रुका हुआ है और वो भी धरने पर है. बेटी बचाओ का नारा देते हुए करनाल में नर्सिंग की छात्राओं पर लाठीचार्ज करवाया गया. बुजुर्गों की पेंशन प्रक्रिया इतनी मुश्किल बना दी गई है कि हर जिले के अखबार पर बैंकों में धक्के खाते बुजुर्गों की तस्वीरें हैं. सरकारी कर्मचारियों से प्राइवेट हस्पतालों में इलाज करवाने की सुविधा छीन ली है… नियम बदलना है तो एम एल ए और मंत्रीयों को भी कहिये कि वो भी अपना इलाज सरकारी हस्पताल में ही कराएं. आमूल-चूल परिवर्तन की शख्त आवश्यकता है. बिना सिस्टम को सुधारे सिर्फ बातों से कुछ नहीं होनेवाला. सकारात्मक कदम की उम्मीद के साथ – जवाहर लाल सिंह, जमशेदपुर

 

2 thoughts on “अंतर्मन में झांकने की जरूरत

  • आभार आदर्मीय श्री विजय कुमार सिंघल जी!

  • विजय कुमार सिंघल

    बहुत अच्छा लेख !

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