संस्मरण

मेरी कहानी 56

रंजीत सिंह के बाद फिजिक्स के प्रोफेसर अजीत सिंह थे जो काफी स्मार्ट होते थे और हर रोज़ नई नेकटाई लगाते थे। पढ़ाने में बहुत अच्छे थे। कुछ शो अप्प भी ज़्यादा करते थे ,हो भी क्यों ना ,जवानी की उम्र और आगे बैठी होती थी खूबसूरत लड़किआं। पीठ पीछे अजीत सिंह और कुछ लड़किओं की बातें होती रहती थीं ,कहाँ तक यह सच और झूठ था मुझे पता नहीं। इन लड़किओं के बीच एक लड़की होती थी जिस के सर के बाल बिलकुल सफ़ेद होते थे और सभी लड़के पीठ पीछे उस को बुड़िआ कहते थे। एक दिन वोह क्लास रूम में मूर्क्षित हो गई। पता नहीं क्या कारण था। सभी लड़किओं ने उसे संभाला और उस को कहीं ले गईं। कालज का चपड़ासी होता था गुरनाम सिंह जो सारा दिन क्लासों में जा कर प्रोफेसरों को एक रैजिस्टर पकड़ा देता था और प्रोफेसर उस पर कुछ लिखा हुआ पड़ कर साइन कर देते थे। एक दिन गुरनाम सिंह अजीत सिंह की क्लास में आया और एक पार्सल पकड़ा दिया। अजीत सिंह ने पार्सल खोला और उस में से एक सर्टीफिकेट और एक नैकटाई निकाली। फिर अजीत सिंह बताने लगा कि उस ने लंदन के एक कालज से कॉरस्पॉन्डेंस कोर्स किया था ,जिस का सर्टीफिकेट और यह नैकटाई कालज वालों ने भेजी थी। सभी विद्यार्थिओं ने अजीत सिंह को वधाई दी। लेकिन क्लास के बाद बाहर जा कर कुछ लड़के हंसने लगे कि अजीत सिंह यह नैकटाई अपने आफिस में भी मंगवा सकता था ,सिर्फ उस ने लड़किओं को ही दिखाना था।

कुछ भी हो ऐसी बातें तो कॉलजों में होती ही रहती हैं लेकिन मैं तो सिर्फ उन दिनों को याद ही कर रहा हूँ। अजीत सिंह बहुत अच्छे थे ,इस से मैं तो मुनकर नहीं हो सकता ,मेरे लिए तो वोह बहुत अच्छे इंसान थे। ५५ ५६ साल के बाद पढ़ाई की सभी बातों का याद आना तो बहुत असंभव है लेकिन कुछ बातें हैं जो याद हैं। फिजिक्स के तीन भाग होते थे ,HEAT,LIGHT AND SOUND . हीट की एक बात याद है CALORIE जो यूनिट ऑफ हीट कहते थे , साउंड को जब पड़ते थे तो एक ट्यूनिंग फोर्क होता था जिसे जोर से किसी चीज़ से टकरा कर एक शीशे की ट्यूब के ऊपर कर देते थे ,जिस में से एक लाऊड साउंड आने लगती थी। कैसे उस साऊंड को मैअर करते थे ,याद नहीं। लाइट में एक शीशे का प्रिज़्म होता था जिस को एक प्लेन शीट पर रख कर प्रिज़्म की लाइट को देख कर पेपर शीट पर पिन्ज़ लगाते थे और बाद में उस शीट पर लाइनें खींच देते थे। लाइट में सात रंग होते हैं जिन को याद रखने के लिए एक छोटी सी फ्रेज़ बनी होती थी जो सभी रंगों को याद रखने का आसान तरीका होता था। इस को कहते थे ,बैनी आह पीना ला यानी रंग जो इस पर्कार होते थे ,बैंगनी ,आसमानी ,हरा ,पीला ,नीला , नसवारी और लाल।

फिजिक्स के प्रैक्टिकल प्रोफैसर ओम परकाश धीर जी कराते थे। धीर जी हमारी प्रैक्टिकल की कापिओं पर जो साइन किया करते थे , एक बहुत ही अजीब ढंग से किया करते थे और मैंने उन के सिग्नेचर की इतनी प्रैकट्स की कि पैह्चान्ना मुश्किल था. एक दिन धीर क्लास रूम में आया नहीं था। मैंने धीर के दस्तखत करके सब लड़कों को दिखाए और सभी हैरान हो गए। एक लड़का आया और मुझे बोला कि उस की कापी में बहुत दिनों से धीर ने दस्तखत नहीं किये और उन पर दस्तखत मैं कर दूँ। मैं दस्तखत करने लगा तो जीत ने उसी वक्त मेरा हाथ पकड़ लिया और बोला ,” कालज से छुटी कराने का इरादा है ? अगर पता चल गिया तो कालज से निकाल दिए जाओगे ” . मैंने भी अपनी गलती मान ली और इस गुनाह से बच गिया। एक दिन मैं किसी काम के लिए प्रोफैसर अजीत सिंह के ऑफिस में गिया। वहां एक और प्रोफैसर भी था। अजीत सिंह अभी अभी हमारी क्लास ले कर आया था। जब मैं दफ्तर के अन्दर गिया तो अजीत सिंह ने अपनी पगड़ी उतारी हुई थी और दोनों हाथों से सर को पकडे हुए था और साथी प्रोफैसर को बोल रहा था कि उस का सर फटा जा रहा था। अजीत सिंह ने मेरी तरफ देखा और लाल लाल आँखों से मेरी तरफ देख कर बोला ,” किया है ?” . साथी प्रोफैसर जिस का नाम मुझे पता नहीं बोला ,” बेटा इस वक्त जाओ ,फिर कभी आना “मैं भी समझ गिया और कमरे से बाहर आ गिया। लेकिन बहुत दफा मुझे इस छोटी सी घटना की याद आती है और सोचता हूँ कि जरुर अजीत सिंह का ब्लड प्रैशर हाई होगा। क्लास में अजीत सिंह कितने स्मार्ट थे और इस वक्त किया थे ,कभी कभी सोच कर हैरानी होती है।

पंजाबी के प्रोफैसर गुरनाम सिंह ऊंचे लम्बे और तगड़े शख्स थे और हमेशा मुस्कराते रहते थे। कुछ समय पंजाबी हमें गुरदित सिंह प्रेमी ने भी पड़ाई थी लेकिन कई साल हम प्रोफैसर अतर सिंह से ही पड़े। यह प्रोफैसर अतर सिंह बहुत ही स्मार्ट ,गोरे , दाह्ड़ी बहुत नीट और फिक्सो लगा कर रखते थे ,उम्र के होंगे तीस पैंतीस साल, हाथों की उंगलिया बहुत नाज़ुक लड़किओं जैसी , और एक अजीब नजाकत से बोलते थे। बुल्ले शाह ,कबीर ,फरीद , शाह हुसैन और शाह मुहम्द बहुत ही अच्छी तरह पडाते थे। जब बाबा फरीद के श्लोक पडाते तो बहुत मज़े से पडाते थे। एक श्लोक था ,”अज ना सुत्ती कंत सिओं ,अंग मुड़ मुड़ जाए ,जाओ पूछो दुहाग्नी तुम कियों रैण वहाए “. इस शलोक पर लड़के बहुत कुछ बोलते और हँसते थे किओंकि इस के सीधे अर्थ तो होते थे कि ” आज मैं अपने पती के साथ सोई नहीं ,इस लिए अंग टूट रहे हैं , उस विधवा से पूछो कि तुम कियों रो रही हो “. दुसरे अर्थ भगवान् की और इशारा करते थे कि ” आज मैंने भगवान् का नाम नहीं लिया ,इस लिए अंग टूट रहे हैं ,उन लोगों से पूछो जो कभी भगवान् का नाम नहीं लेते “.

एक किताब होती थी “मेरे चोनवें इकांगी “इस किताब में वन एक्ट प्ले होते थे। मेरे डैस्क पर एक और लड़का होता था जो बहुत शरारती होता था। इस वन एक्ट प्ले वाली किताब पे एक औरत के करैक्टर का नाम गलत प्रिंट हुआ हुआ था। करैक्टर का नाम तो था ,”कर्मों ” लेकिन वहां लिखा हुआ था ,”करड़ो “. और तो किसी ने इस बात का कोई नोटिस नहीं लिया लेकिन यह लड़का सब को दिखा कर हंसा रहा था। इस छोटी सी बात को ले कर बात का बतंगड़ बनाना उस की एक खूबसूरती ही थी। यह लड़का ऐसा था कि इस को देख कर ही हंसी आ जाती थी ,खुल कर नहीं हँसता था ,हीं हीं कर के मिन्ना सा हँसता और सब को हंसा देता था । प्रोफैसर प्रेमी ने एक बार कहा था कि कॉमेडियन वोह है जो छोटी छोटी सी बातों से लोगों को हंसाये और यही टैलेंट इस लड़के में थी लेकिन यह लड़का कुछ देर बाद कालज छोड़ गिया था और फिर कभी नहीं देखा। एक किताब होती थी कहानिओं की जिस में एक कहानी होती थी लाल सिंह कमला अकाली की लिखी जो बहुत रुमांटिक थी और फ्रोफैसर साहब बहुत मज़े से पडाते थे। इस प्रोफैसर अतर सिंह से मुझे बहुत कुछ मिला।

प्रोफैसर टंडन इतिहास पढाते थे। इतहास की किताब हमारे कालज के ही प्रोफैसर गुरबक्श सिंह छाबरा की लिखी हुई थी और एक और किताब थी जो रामगढ़िया कालज के कुछ समय पहले रहे प्रिंसीपल किरपाल सिंह नारंग की लिखी हुई थी जो बाद में पंजाब यूनिवर्सटी के वाइस चांसलर बन गए थे। टंडन साहब बहुत अच्छा पडाते थे और शेर शाह सूरी के चैप्टर को बहुत ही विस्तार से पढ़ाते थे। टंडन की पड़ाई कुछ बातें अभी तक याद हैं। शेर शाह सूरी की बनाई जीटी रोड को बहुत सीरीअसली और डीटेल से पडाते थे और ख़ास कर उस के इन्साफ की बातें भी बताया करते थे। एक दफा शेर शाह के एक सिपासलार ने जो घोड़े पर सवार था और एक गाँव में जा रहा था ,ने एक नहा रही औरत को देखा। किओंकि औरत अपने घर में छोटी सी दीवार के पीछे नहा रही थी और सिपास्लार घोड़े पर था ,इस लिए उस ने औरत को देख लिया। औरत को जब मालूम हुआ तो भाग कर भीतर चली गई और अपने खावंद को बताया। खावंद ने शेर शाह सूरी के दरबार में हाज़र हो कर उस सिपास्लार की शिकाएत की। शेर शाह ने उसी तरह सिपालार की बीवी को नहाने का हुकम दिया और शकाएत करने वाले शख्स को घोड़े पर बिठा कर उसी तरह सिपासलार की बीवी के साथ कराया ।

एक और बात जो औरंगजेब के मुतलक थी। औरंगजेब ने हुकम दे दिया था कि उस के राज में किसी को मिऊजिक बजाने की इजाजत नहीं होगी ,किओंकि वोह कट्टर सुन्नी था और सुन्निओं को मिऊजिक वर्जित था। राजधानी के सभी गवैयों ने इकठे हो कर जलूस निकाला। उन लोगों ने एक अर्थी बनाई ,उस पर गाने वाले साज़ रख दिए और रो रो कर लाल किले के बाहर चलने लगे। औरंगजेब किले की दीवार पर आया और बोला ,” कौन मर गिया है ?” साजिंदों ने जवाब दिया ,” जी राग मर गिया है “. औरंगजेब ने पुछा ,” इन साजों को कहाँ ले जा रहे हो “, साजिंदों ने जवाब दिया ,” जी इन्हें दफनाने ले जा रहे हैं “. औरंगजेब बोला ,” इन को ज़रा गेहराई तक नीचा गाड़ना ताकि फिर बाहर ना निकल आये “. इस बात को टंडन बहुत विस्तार से बताता था। उन की बताई हिस्टरी अभी तक याद है।

ऐक्नौमिक्स के प्रोफैसर होते थे मिस्टर कुमार। यह कोई ६० ६२ के होंगे। यह अक्सर हँसाते रहते थे। जब कोई कुटेशन देनी होती तो इंग्लिश में बात करते थे वरना सारा लैक्चर पंजाबी में देते थे ,इस लिए हर बात आसानी से समझ आ जाती थी। अक्सर हमें कहते रहते थे कि हमें बैनहैम की इकनॉमिक्स पड़नी चाहिए क्योंकि कोर्स में तो एक और ही किताब होती थी। एक और किताब जो कुमार साहब ने रिकमेंड की हुई थी हम ने ला रखी थी जो वाकई बहुत अच्छी थी। यह किताब डीटेल में लिखी हुई नहीं थी सिर्फ उतनी थी जो आसानी से समझ आ जाती थी। याददास्त को ताज़ा करने के लिए लिखना चाहूंगा कि एकनॉमिक्स में एक होता था पापुलेशन थिउरी जिस में दुनीआं की आबादी के बारे में बताया हुआ था कि अगर दुनीआं की आबादी बढ़ जाए तो किया होगा और आबादी को कंट्रोल में कैसे रखा जा सकता है , कुदरत कैसे आबादी को कंट्रोल में रखती है। कुमार साहब कहते थे कि अगर आबादी ज़्यादा बड़ जाए तो आकाल से आबादी बहुत कम हो जायेगी , आंधीआं तूफ़ान और बाढ़ से भी आबादी कम हो जायेगी। उन का बैनहैम की किताब से एक कुटेशन होता था जो मैं कभी नहीं भूला और इस को मैंने बहुत जगह लिखा है,( this table of nature is for limited number of guests and those who come un invited will starve” .

एक चैप्टर होता था डिमांड और सप्लाई का। अगर डिमांड सप्लाई से बड़ जाए तो कीमतें बड़ जाती हैं ,इसी तरह अगर सप्लाई डिमांड से बड़ जाए तो कीमतें नीचे आ जाती हैं। बहुत दफा जब प्रोड्यूसर एक ही हो तो मनॉपली की स्थिति हो जाती है और कन्ज़्यूमर को चीज़ लेनी ही पड़ती है चाहे यह मैहँघी ही क्यों न हो ,इस को कहते हैं ,( consumer is a milch cow in the hands of a producer ).इसी तरह इम्पोर्ट एक्सपोर्ट का चैप्टर होता था जिस में कुमार साहब हंसाया करते थे कि फ़र्ज़ करो इंडिया पाकिस्तान को X कमोडिटी भेजता है और पाकिस्तान इंडिया को Y भेजता है। अब इंडिया को Y की बहुत जरुरत है लेकिन पाकिस्तान वाईआं भेज नहीं रहा। अब इंडिया बार बार पाकिस्तान को लिख रहा है कि वाईआं भेजो वाईआं भेजो ,मैं वाइओं के बगैर मरा जा रहा हूँ। बस यही बात कुमार साहब ऐसे बताते थे कि सभी जोर जोर से हँसते थे। एक चैप्टर होता था बैंकरप्ट्सी यानी दीवालापन का ,इस में कुमार साहब खूब हँसाते थे।

इन प्रोफेसरों के इलावा कुछ और प्रोफेसर भी आये जिन में एक थे दत्ता साहब और एक और थे जिन की नेकटाई नीचे की ओर बहुत लम्बी होती थी और लड़कों ने उन का नाम टाया साहब रखा हुआ था। एक और थे जो जवान थे और दत्ता साहब से उन की दुश्मनी थी और एक दफा उस ने दत्ता साहब को चाक़ू दिखा दिया था जिस की वजह से लड़कों ने दत्ता साहब के हक्क में सारे शहर में मुजाहरे किये थे और बैनर उठाये हुए थे जिस पर एक चाक़ू पेंट किया हुआ था और नीचे की तरफ खून बहता दिखाया हुआ था और नीचे लिखा हुआ था ,छुरेबाजी नहीं चलेगी ,नहीं चलेगी और फिर यह मुजाहरे का मजमा फगवारे के पुलिस स्टेशन रिपोर्ट करने गिया था। बस यह कालज की यादें सिर्फ उन प्रोफेसरों को मेरी शर्धांजलि है जिन में से बहुत शायद इस दुनिआ में नहीं होंगे क्योंकि इन घटनाओं को अब ५५ साल हो चुक्के हैं।

चलता …

 

6 thoughts on “मेरी कहानी 56

  • विजय कुमार सिंघल

    बहुत खूब, भाईसाहब ! आपके कालेजके गुरुओं के बारे में पढकर आनंद आया।
    सभी कालेजों में सभी तरह के शिक्षक होते हैं, जिनकी अपनी अपनी विशेषतायें होती हैं। आपके द्वारा किया गया उनका वर्णन रोचक है।

    • गुरमेल सिंह भमरा लंदन

      विजय भाई , वैसे तो सभी गुरु अछे ही होते हैं ,हर कोई अपने तरीके से पडाता है लेकिन मैंने उन को याद करने का यही तरीका ढूंडा है .

  • मनमोहन कुमार आर्य

    नमस्ते एवं हार्दिक धन्यवाद आदरणीय श्री गुरमेल सिंह जी। आज की क़िस्त में वर्णित सभी स्मृतियाँ मनभावन हैं। पढ़कर उपन्यास का सा आनंद आया। मुझे भी इंटर पास किये हुए ४५ वर्ष हो चुके हैं। आपकी स्मृतियों की ही तरह की कुछ कुछ अपनी स्मृतियाँ स्मृति पटल पर सजीव हो उठीं। ईश्वर को गुरुओं का गुरु कहा गया है। गुरुओं से हमें जो ज्ञान मिलता है उसका आदि श्रोत ईश्वर है। आपके, अपने व सभी सच्चे गुरुओं सहित प्रथम व आदि गुरु ईश्वर को सादर नमन है। हार्दिक धन्यवाद।

    • गुरमेल सिंह भमरा लंदन

      मनमोहन भाई , आप ने सही कहा ,माता पिता के बाद गुरु ही होते हैं जिन से बहुत कुछ हासल होता है . इन गुरुओं को हम कभी भी भूल नहीं सकते .

  • विभा रानी श्रीवास्तव

    आपके हर गुरुओं को मेरी भी
    विनम्र श्रद्धांजलि

    आपकी यादाश्त बहुत अच्छी है

    • गुरमेल सिंह भमरा लंदन

      आप का बहुत बहुत धन्यावाद बहना. याददाश्त भगवान् की ही देन है .

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