धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

निर्लिप्तता

निर्लिप्तता का अर्थ है सांसारिक मायामोह से दूर रहना। यह कर्म के बन्धन से निवृत्ति भी है। गीता में एक अपूर्व युक्ति बताई गई है, जिससे मनुष्य शुद्ध, पवित्र और निर्लिप्त या निष्कलंक बन सकता है। यह युक्ति है कर्मों को ब्रह्म में अर्पण करना अर्थात् सब कर्म परमेश्वर को समर्पित करके आसक्ति रहित होकर सब व्यवहार करना। ऐसा करने से वह व्यक्ति इसी प्रकार निर्लिप्त रहता है, जैसे कि तालाब में खिला हुआ कमल का पुष्प कीचड़ और गंदगी से निर्लिप्त रहता है। मनुष्य को यदि परमेश्वर को प्राप्त करने की अभीप्सा है, तो उसे परमेश्वर के समान बनना होगा। ईश्वर के समान गुण धर्मवाला बनना ही अन्तिम सिद्धि होगी। साथ ही जैसा कि परमेश्वर सत्-चित्-आनन्द-स्वरूप है, वैसा ही बनना होगा। जो मनुष्य गुणमयी प्रकृति और परमेश्वर को यथावत् जानता है, उसको कर्म करते हुए भी निर्लिप्तता सिद्ध करने का उपाय ज्ञात होता है और फिर उसके पुनर्जन्म लेने का कारण शेष नहीं रहता है।

मनुष्य जो भी कर्म करे, वह परमेश्वर के लिए करे और उसके फल-भोग की इच्छा न रखे। अविनाशी परमात्मा अनादि और निर्गुण होने के कारण शरीर में रहते हुए भी न कुछ करता है और न किसी से लिप्त होता है। कठोपनिषद् में कहा गया है कि जैसे सूर्य सब पदार्थों को प्रकाशित करने के कारण सब का चक्षु जैसा है, फिर भी किसी से संसर्ग होने के कारण दोषयुक्त नहीं होता है, वैसे ही सब जीवों की अन्तरात्मा एक जैसी है, फिर भी वह लोगों के दोषों से दोषी अथवा दुःखों से दुःखी नहीं होती है।

कर्म-बन्धन को दूर करने के उपायों पर विचार करते हुए गीता में कहा गया है कि जो भोगों से आसक्त नहीं है, जिसका चित्त ज्ञान से पूर्ण है और जो यज्ञ के लिए कर्म करता है, उस मुक्त के सब कर्म नष्ट हो जाते हैं। जो समत्व रूपी योग का आचरण करता है, जिसका हृदय शुद्ध है, जिसने अपने मन को जीत लिया है, जिसने इन्द्रियों का संयम किया है और जो सब भूतमात्र को अपनी आत्मा के समान अनुभव करते हुए निर्लिप्त रहता है, उसको हम सिद्ध पुरुष समझ सकते हैं, उसी को मुक्त कह सकते हैं।

कृष्ण कान्त वैदिक

3 thoughts on “निर्लिप्तता

  1. Is sunder lekh ke liye dhanyawad. Mere niji gyan me nirlipt manushya banna mahakathin hai. Bina kamna ke to palak bhee nahi jhapakti. Yadi kamna sunya honge to Karam sunya ho jayenge. Anuman hai ki ved vihit karmo ko kar hee manushya mukti ko prapt hota hai. Dhanyavad.

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