सामाजिक

भारतीय समाज में वर्ण व्यवस्था

प्राचीन काल में जो वर्ण व्यवस्था थी वो जन्म आधारित नहीं बल्कि कर्म आधारित थी l जो जैसा कर्म करता था उसे उसी वर्ण का माना जाता था l उदाहरणतः जो व्यापार करता था उसे वैश्य वर्ण में रखा जाता था राजा क्षत्रिय होता था, शिक्षा देना ब्राह्मणों का काम था, सेवा करना शूद्रों का काम था l सभी एक दूसरे के पूरक थे, कोई किसी निम्न श्रेणी का नहीं समझता था l लेकिन पहले मुगलों और फिर अंग्रेजों के द्वारा इस व्यवस्था को जन्म के आधार पर बांटा गया l जैसे राजा का बेटा राजा, शूद्र का बेटा शूद्र, वैश्य का बेटा वैश्य और ब्राह्मण का बेटा ब्राह्मण l जबकि ये जरुरी नहीं कि ब्राह्मण का बेटा ज्ञानी ब्राह्मण ही हो या व्यापारी का बेटा व्यापार में रूचि ही रखता हो l जबसे हमारे समाज को जन्म के आधार पर बांटा गया समाज में भेदभाव बढ़ता गया l क्षत्रिय, ब्राह्मण और वैश्य शूद्रों कि निम्न श्रेणी का समझने लगे l इसी बात का फायदा उठाकर मुगलों और अंग्रेजों ने शूद्रों को अपनी तरफ मिलाकर भारत पर सैकड़ों वर्षों तक राज किया l अंग्रेजों के जाने के बाद राजनितिक दलों ने अपने फायदे के लिए फिर से उन्ही मुगलों और अंग्रेजों की रणनीति अपनायी और हमारे समाज कि कभी जुड़ने नहीं दिया है l इन राजनितिक दलों में कांग्रेस का नाम सबसे ऊपर है l बाकी मुलायम सिंह, मायावती, लालू, ममता जैसे कई नेता जो समाज के जुड़ने ही नहीं देना चाहते हैं l जब तक हमारे बीच ऐसे राजनितिक दल हैं समाज कभी नहीं जुड़ सकता है l

One thought on “भारतीय समाज में वर्ण व्यवस्था

  1. मुझे नहीं लगता कि मुगलो या अंग्रेजो ने वर्ण व्यवस्था को जन्म के आधार पर स्थापित किया था. मेरा अध्ययन कहता है कि यह हमारे वेद विरोधी अर्थात वेद अनाध्यायी व पुराणपंथी हिन्दू मुख्यतया ब्राह्मणो के द्वारा किया गया। अन्यो ने इसका लाभ उठाया है। आज पौराणिक हिन्दुओं को कौन रोक रहा है कि जन्मना जातिवाद का विरोध न करें और इसे गुण कर्म व स्वाभाव पर स्थापित कर अतीत के इस अनुचित कार्य का प्रायश्चित करें। आर्य समाज जन्मना जातिवाद का विरोध करता है परन्तु वह स्वंयम भी अधिकांशतः इस बुराई से ग्रसित है.

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