कविता

गुर्राना सही वक़्त हो तो

बनना नहीं किसी की देवी
बनना नहीं किसी की दासी
भुलाना नहीं तुम हो जननी जगतजननी रूपा
भुलाना नहीं अपने जज्बातों को
निभाना अपने चुने रिश्तों को
निभाना अपने मिले दायित्वों को
डरना नहीं दहलीज़ पार की तो
डरना नहीं मंजिल नहीं दिख रही तो
थामना अपने हौसले के पंख को
थामना मदद मांगने वाले हांथो को
दहाड़ना दिखे कामुक आँख तो
दहाड़ना रोके कोई राह तो
पकड़ना अपने ऊपर उठे हाँथ को
पकड़ना कलम बेलन तलवार को
जूझना जो झंझावत आये तो
जूझना दक्षता का अवसर आये तो
सीखना नए युग के चलन को
सीखना पुराने युग के अनुभव को
गुर्राना हक़ है तुम्हारा तो
गुर्राना सही अवसर हो तो

*विभा रानी श्रीवास्तव

"शिव का शिवत्व विष को धारण करने में है" शिव हूँ या नहीं हूँ लेकिन माँ हूँ

2 thoughts on “गुर्राना सही वक़्त हो तो

  • सत्री के लिए प्रेरक कविता ,जो आज हर औरत को हो जाना चाहिए .

    • विभा रानी श्रीवास्तव

      आभार आपका

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