गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

तनहा रातों का उदास मंजर जब होता है
दिल तन्हाई के साये में सिसक के रोता है

गुम होता है जब यादों के भंवर में यह
आँखों के प्यालों को अश्कों से भिगोता है

आस्तीनों में ही छुपे जब खंजरों को देखा
अंदाजा हुआ तब कैसे कोई नश्तर चुभोता है

न पूछो रुसवाई का आलम हमसे
अहद-ए-गम कैसे कोई अपना बेगाना होता है

तनहा शामों की खुशियाँ न रास आई हमें
दिल अधूरे सपनों की माला पिरोता है

गुलशन में जब रंग भरना चाहा बहार ने
देखा तब यहाँ कारोबार गुलों का होता है

–प्रिया

परिचय - प्रिया वच्छानी

नाम - प्रिया वच्छानी पता - उल्हासनगर , मुंबई सम्प्रति - स्वतंत्र लेखन राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं में रचनाए प्रकाशित राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय मंचो पर काव्यपाठ E mail - priyavachhani26@gmail.com

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