गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

ज़िंदगी कतरा-कतरा पिघलती रही
शाम ढलनी ही थी शाम ढलती रही

कुछ ना कहा मैंने लब सिल लिये
आँखों के रस्ते हसरत निकलती रही

किस्मत में था उसके फक्त इंतज़ार
खल्वत-ए-शब में भी शमा जलती रही

यादों ने शोर करके ना सोने दिया
नींद आँखों में करवट बदलती रही

कुछ ऐसी पड़ी अपने रिश्तों में गाँठ
जितनी सुलझाई उतनी उलझती रही

यूँ तो सब कुछ मिला ज़िंदगी में मुझे
एक तेरी कमी थी जो खलती रही

— भरत मल्होत्रा।

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