Monthly Archives: October 2015


  • ग़ज़ल

    ग़ज़ल

    ये गरज़ की रिश्तेदारियां मेरे शहर की रस्म-ए-आम है, मुफलिसों की कदर नहीं यहां तवंगरों को सलाम है खंजर है हर आस्तीन में और हर निगाह में फरेब है, कोई किसी का नहीं रहा ये मुकाम...

  • घर-घर दीप जले/गीत

    घर-घर दीप जले/गीत

    घर घर दीप जले   ज्योति-पर्व आया मनभावन घर-घर दीप जले। रजत हुआ रजनी का आँगन श्यामल गगन तले।   थमे-थमे दिन पंख लगाकर फिर गतिमान हुए। हाथ बढ़ाकर खुशियों ने ऊँचे सोपान छुए।   नष्ट...


  • गज़ल  : बयान ए दिल

    गज़ल : बयान ए दिल

    चाँद को पहलू में लेके चाँद से चाँद का दीदार कर लें फलक से बातें करें पुरअसर दिल पे एतबार कर लें ।। कभी तो रुक के देखूँ कुछ वक़्त को गुलज़ार कर लें बेकरार वक़्त...

  • नकली फूल….

    नकली फूल….

    नकली फूल, बनावट की खुशबु का है व्यापार गुलशन की क्यूं फिक्र करे, व्यापारी सत्तादार। होने लगे आदर्श कलंकित, हर दिन बारंबार बिकता है अब झूठ लगाकर, बोली सरे बाजार॥ होने लगा पतन कुछ ज्यादा, वाणी...


  • ग़ज़ल

    ग़ज़ल

    शाम तनहा है और सहर तनहा, उम्र अपनी गई गुज़र तनहा छुप गए साये भी अँधेरों में, रात को हो गया शहर तनहा कोई दस्तक ना कोई आहट है, किसको ढूँढे मेरी नज़र तनहा मंजिलों पर...