इतिहास

लाखामंडल की ईश्वरा प्रशस्ति

नगाधिराज हिमालय की यमुना घाटी मंदिर स्थापत्य कला की दृष्टि से अत्यंत वैभवशाली व सम्पन्न रही है। उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के जौनसार-बावर क्षेत्र में स्थित लाखामंडल स्थान पुरातात्विक धरोहर के रूप में विश्व विख्यात है। यह स्थान जनपद मुख्यालय से मसूरी होकर जाने वाले राजमार्ग पर लगभग ११०कि०मी० दूर मध्य हिमालय उपत्यका में अवस्थित है। चकराता होकर भी लाखामंडल को एक अन्य राजमार्ग जाता है, किंतु यह अपेक्षाकृत अधिक लंबा मार्ग है। समुद्र तल से इस स्थान की ऊंचाई लगभग १३७२ मीटर है । इस स्थल का संबंध महाभारत की एक ऐतिहासिक घटना से जुड़ा है जिसके अनुसार कौरवों ने छलपूर्वक पांडवों को लाक्षागृह में बंदी बना कर जला कर नष्ट करने का कूटनैतिक षडयंत्र रचा था, किंतु कौरव गण अपने षडयंत्र में सफल नहीं हो सके थे।

गुप्तोत्तर काल में सातवीं शताब्दी में सिंहपुर के यदुवंशीय शासक श्री भास्कर वर्मन की पुत्री ईश्वरा ने अपने पति श्री चन्द्र गुप्त (जालंधर का शासक) की पुण्य स्मृति में लाखा मंडल में शिव मंदिर का निर्माण कराया था। उक्त ऐतिहासिक मंदिर के परिसर से दो शिला लेख प्राप्त हुए हैं-Lakha mandal shilalekh

(१)लाखामंडल का खंडित शिला लेख

(२)रानी ईश्वरा की लाखामंडल प्रशस्ति।

प्रस्तुत लेख में ईश्वरा प्रशस्ति का सविस्तार विवेचन किया गया है।

यह अभिलेख गुप्तोत्तर कालीन ब्राह्मी लिपि में संस्कृत भाषा में उत्कीर्ण किया गया है।अभिलेख का आकार २’१०.५”×१’×९” है तथा इसमें २२ श्लोक हैं। लिपि के आधार पर ब्यूलर महोदय ने इसे सातवीं शताब्दी ई० तथा प्रोफेसर एफ०कील हार्न ने सातवीं शताब्दी ई० के अंत का माना है । अन्य पुरावेत्ताओ’ डा०दया राम साहनी एवं प्रोफेसर काशी प्रसाद जायसवाल ने इसका काल छठी शताब्दी ई० निर्धारित किया है। उक्त प्रशस्ति में ११ पीढियों के बारह राजाओं का नामोल्लेख है जिनकी स्थिति प्राक् गुप्त काल से ले कर हर्षवर्धन के शासनकाल तक रही होगी।इन शासकों का क्रम बद्ध विवरण निम्नवत है__
१-राजर्षिश्री सेन वर्मन__यह सिंह पुर के यदुवंश का संस्थापक था। संभवत: सेनवर्मन के पश्चात यदुवंश ने प्रसिद्धि पायी थी। प्रो०जायसवाल महोदय के अनुसार यह २५० ई० में सिंहासनारूढ़ हुआ। लगभग ६३५ ई० तक यदुवंश के १२ शासकों ने लाखामंडल तथा यमुना घाटी के निकटवर्ती जौनसार बावर क्षेत्र में शासन किया।
२-नृपतिश्री आर्यवर्मन __यह एक चरित्र वान शासक था।
३_श्री देववर्मन__यह प्रजा वत्सल सम्राट था। इसने प्रजा के भय को सदा के लिए समाप्त कर दिया। यह दानदाता तथा शत्रुओं का विध्वंस करने वाला था।
४_श्री देवप्रदीप्तवर्मन __क्रोधी स्वभाव का होने के कारण इसने कभी अपने शत्रुओं को क्षमा नहीं किया। इस प्रकार यह स्वाभिमानी शासक था।
५_श्री ईश्वर वर्मन__यह एक धार्मिक प्रवृत्ति का राजा था।
६_श्री वृद्धि वर्मन __यह समृद्धि शाली शासक व लोगों को सहायता प्रदान करने वाला शासक था।
७_श्री सिंह वर्मन__यह बलवान शासक था जो शत्रुओं के लिए खतरनाक,किंतु दूसरों के लिए मृदु स्व भाव वाला था।यह अपने दान कार्य के लिए भी प्रसिद्ध था।
८_श्री जलवर्मन __यह एक शान्ति प्रिय राजा था।
९_श्री यज्ञवर्मन __यह भी धार्मिक प्रवृत्ति का शासक था।वंश के अंतिम तीन शासकों हेतु’घांघल’शब्द प्रयुक्त हुआ है जिस का अर्थ वीर योद्धा से है।
१०_श्री अचलवर्मन __यह एक शान्ति प्रिय शासक था, किंतु युद्ध काल में अपने शत्रुओं को बहुत दंडित भी करता था।
११_श्री दिवाकर वर्मन__यह एक अत्यधिक शक्ति शाली शासक था। अभिलेख में इसके लिए ‘महा घांघल’ (महान वीर योद्धा) शब्द प्रयुक्त हुआ है।
१२_श्री भास्कर वर्मन__यदुवंश का अंतिम शासक श्री भास्कर वर्मन था। इसके लिए प्रशस्ति में ‘रिपु घांघल'(शत्रुओं के लिए महान वीर योद्धा) शब्द प्रयुक्त हुआ है। इसने अन्य राजाओं पर विजय प्राप्त की। ऐसा प्रतीत होता है कि इसने उत्तर काशी के दक्षिण भूभाग को विजित करने हेतु एक अभियान किया था। इसकी एक मात्र रानी जयावली थी जो राजा कपिलवर्धन की पुत्री थी।

रानी ईश्वरा__श्री भास्कर वर्मन की पुत्री का नाम ईश्वरा था। ईश्वरा की माँ का नाम जयावली था। इसका विवाह जालंधर के राजकुमार चन्द्र गुप्त से हुआ था तथा यह अपनी युवावस्था में ही दुर्भाग्य वश विधवा हो गयी थी। पति के मरणोपरांत यह अपने पैतृक घर (मायके) आ गयी थी। पतिव्रता नारी होने के कारण इसने सिंह पुर (लाखामंडल) में शिव मंदिर का निर्माण कराया ताकि उसके पति चन्द्र गुप्त का नाम व यश अमर रहे।

इस अभिलेख का रचयिता वसुदेव भट्ट था जिसके पिता का नाम भट्ट स्कंद था। इसके पिता मह का नाम क्षेमशिव भट्ट था। वसुदेव भट्ट एक राज दरबारी कवि था। प्रशस्ति के अंत में ‘प्रशस्तिकार अयोध्या देश’ शब्द का उल्लेख हुआ है। अर्थात कवि का संबंध अयोध्या स्थान से था और संभवतः उसके पूर्वज कभी वहाँ से हिमालय क्षेत्र में आकर बस गए हों।

सिंह पुर स्थान के अभिज्ञान के संबंध में विद्वानों में मतभेद रहा है। डा०शिव प्रसाद डबराल ‘चारण’ के अनुसार यह स्थल वर्तमान सहारनपुर का सुधगांव (सुर्घ्नपुर) ही है जो कालसी के अधिक निकट स्थित है। अन्य इतिहासकार डा० यशवंत सिंह कठोच के मतानुसार सिंह पुर स्थान को लाखामंडल क्षेत्र से समीकृत किया गया है। अन्तत:सातवीं शताब्दी के पश्चात यमुना घाटी क्षेत्र से यदुवंश के शासकों का सदैव के लिए पतन हो गया।

वेद प्रताप सिंह

परिचय - वेद प्रताप सिंह

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