सामाजिक

एक दीया किसी की मुस्कराहट के नाम

दीवाली का त्यौहार यानी खुशियो का त्योंहार इस त्यौहार को हम सब हँसी ख़ुशी और सभी के साथ मिलकर मानते है । दीवाली को दीपावली भी कहते है जिसका शाब्दिक  अर्थ होता है दीपो(मिट्टी के दीप)की पंक्ति ।इसे दीपोत्सव यानी दीपो के उत्सव के नाम से भी जाना जाता है ।सदियो से दीपावली के दिन मिट्टी के दिए में घी या तेल डाल कर बाती के द्वारा रौशनी करने की प्रथा चली आई है  जिससे रोशनी होने के साथ साथ वातावरण भी शुद्ध होता है और गरीब कुम्हारो की कुछ आमदनी भी हो जाती है परंतु अब स्थिति कुछ और है।आजकल लोग मिट्टी के दीपो की जगह बाजारू मोमबत्ती और दीये जलाने लगे है जिससे कुम्हारो के पेट में लात पड़ रही है।बेचारे कुम्हार दीवाली में दो पैसे कमाने की आस में दिनरात मेहनत करते है कड़ी धूप में जलते है और आग की भट्टियों की तपन सहते है और भी न जाने कितने मेहनत और जतन से ये दीये बनाते है और जब बेचने जाते है तो उन्हें निराशा ही हाथ लगती है क्यूंकि आज बहुत ही कम लोग है जो मिट्टी के दियो से अपना घरौंदा  रोशन करते  है और जो ये दिए जलाते भी है वो भी जबरदस्त मोल भाव करने के बाद उसे बहुत ही कम क़ीमत में लेना चाहते है ।

यूँ तो दिवाली के दिन हर घर में रौशनी की जाती है परंतु उन रोशनियों को करने वालो में मिट्टी के दियो की संख्या लगातार घटती ही जा रही है।आज कोई दीपावली में दीपो की लड़ी नहीं लगाना चाहता क्यूँकि उसकी जगह मोमबत्तियों की लड़ियों ने ले ली है जो दियो से कम कीमत में उपलब्ध हो जाती है पर कोई ये नहीं सोचता की क्या हमारे इस सोच से कोई घर रोशन होने से तो नहीं रह जा रहा; कोई मासूम जरा सी मिठाई को तो नहीं तरस रहा या पटाखों के इंतजार में बस रो कर तो नहीं सो जा रहा। तो चलिए इस बार हम दिवाली मनाये उन कुम्भरो के परिवार के मुख में ख़ुशी के दीप की रौशनी जो हमसे न जाने कितनी उम्मीद लगा कड़ी धूप में अपने शरीर से अथक श्रम करवाते है ताकि हमारे लिए खास दिये बना सके और हमारे घर को दीपो की माला से झिलमिल रौशनी की लड़ी लगा सके और एक हम है जो लगातार बजारुवाद के शिकार हो अपने स्वदेशी कारीगरों की कला को ही कोई महत्व नहीं दे पा रहे।

तो क्यों न इस बार हम मनाये कुछ अलग तरह की दीवाली ;एक दिवाली किसी को मुस्कान देने के लिए किसी के घर में रौशनी करने के लिए किसी के बच्चे के मासूम चेहरे को संतोष भरी मुस्कान देने के लिए क्यूंकि अपने लिए तो दीवाली सब मानते है क्यों न हम ये दिवाली अपने कुम्भार भाइयो के घरो में जरा सी रौशनी करने के लिए मनाये।

प्रिया मिश्रा

One thought on “एक दीया किसी की मुस्कराहट के नाम

  • विभा रानी श्रीवास्तव

    अच्छी रचना
    सार्थक लेखन

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