गीत : संग्राम की बेला आयी !

त्याग मत गांडीव, अब संग्राम की बेला है आयी।
देख तेरे सामने फिर काल ने मोहरे सजाए
चक्रव्यूह ऐसा न होे कि फिर किसी को लील जाए
धूप में परछाईं जब, अपनी न तुझको दे दिखाई।

क्या करे श्रीकृष्ण, जब खुद द्रौपदी ही चीर त्यागे!
है खड़ी रक्षक बनी, दुश्शासनों की भीड़ आगे
दे रहा हो सत्य ही, प्रतिपल यहाँ पर जब दुहाई।

मात्र तेरा है समर यह, हौसला रखना बनाए
धर्म के कुरुक्षेत्र में, सत्कर्म ही हैंकाम आए
शत्रु बन ललकारती है, नये युग की हर बुराई।

जय-पराजय से परे तू, लिख दे अपनी इक कहानी
आने वाले भीम-अर्जुन के लिए हो, जो निशानी
मुश्किलों में ही सदा, इंसान ने मंज़िल है पाई।