मुक्तक

कभी न झुकनेवाले करो वक्त का एहसास
दर्प दिखाने वाले का हो हो जाता विनाश
वक्त की आँधी में बड़े वृक्ष उजड़ जाते हैं
वक्त को समझनेवाली नहीं उजड़ती घास

खुशियाँ सबको बाँटूं गम ले लूं उधार
तमस मिटाने के लिए खुद जलूं सौ बार
देश के काम आ जाये गर जिन्दगी
मेरे जीवन का मुझपर होगा बड़ा उपकार

प्यार का हो सम्पति मुझे ज्ञान हो मेरा साथी
दोस्ती हो ऐसे जैसे दीया और बाती
इंसानियत का बीज बोऊँ घर-आँगन में
कुछ ऐसा कर दिखाऊँ गर्व करे ये माटी

— दीपिका कुमारी दीप्ति

परिचय - दीपिका कुमारी दीप्ति

मैं करहरा पालीगंज पटना की रहनेवाली हूँ। मैं अभी एम.एच.डी. कर रही हूँ। मुझे लिखने का शौक बचपन से ही है। मैं कविता , कहानी , लघुकथा , नाटक , एकांकी , निबंध आदि लिखती हूँ। यदि मेरी रचना में किसी प्रकार की त्रूटि हो गयी हो तो मैं आपलोगों से क्षमा चाहती हूँ।