लघुकथा

लघुकथा : दोस्ती-दुश्मनी

सरला और सीमा दोनों पड़ोसिनें थी| उनमे बहुत गहरी दोस्ती थी उनके बच्चे भी एक दूसरे के दोस्त थे। उनके बजुर्ग पिछले २० सालो से ये दोस्ती निभाते आ रहे थे | वो दोनों परिवार आपस में मिल जुल कर रहते थे। एक दिन घर के सामने, दोनों के बच्चे मिल कर क्रिकेट खेल रहे थे|अचानक बोल उछली और सरला की कांच की खिड़की को तोड़ गयी| नई पीड़ी का गरम खून, सरला ने ये सब देखा और गुस्से में तमतमाती हुई सीमा के घर पहुंची और उसके बेटे को बुरा भला कहने लगी, पर सीमा भी कहाँ कम थी, वो भी सरला से झगड़ने लगी। बजुर्गो ने काफी समझाया पर उन पर कोई असर नहीं हुआ वो दोनों काफी देर तक लड़ती रही| झगड़ा खत्म करने के लिए, उन दोनों में से कोई भी समझदारी नहीं दिखा रहा था| बदला लेने के लिए गुस्से में सरला ने एक पत्थर उठाया और सीमा की कार पर मार कर उसका शीशा तोड़ डाला सरला की इस हरकत ने आग में घी डालने का काम किया । उन दोनों ने अपने घरों के दरवाज़े बंद कर लिए ।

इतना झगड़ा करने के बाद भी उनको शांति नहीं मिली ,अभी बड़ा तूफ़ान तो आने वाला था शाम को उन दोनों के पति काम से वापिस आये उन दोनों ने अपने अपने पतियों को खूब भड़काया | अब उन दोनों के पति आपस में झगड़ने लगे हाथापाई करने लगे , बात मरने मारने तक पहुँच गयी| दोनों अपने अपने घरो से तेज हथिआर उठा लाये और एक दूसरे पर वार करने लगे सारा मोहला इकठ्ठा हो चुका थाऔर वो दोनों लहू लुहान हो चुके थे । अब सरला और सीमा ये सोच कर कि वो दोनों अपने पतियों से हाथ न धो बैठें, जा उन्हें कतल के जुर्म में जेल न हो जाए उनको छुड़ाने लगी पर उनके पतियों को अब न कुछ सुनाई नहीं दे रहा था और न कुछ दिखाई दे रहा था वो अपना होश खो बैठे थे| कहते है न जब गुस्सा दिमाग पर चढ़ जाए तो फिर सभी अक्ल के दरवाज़े बंद कर देता है| जैसे तैसे मोहल्ले वालो ने बीच में पड़कर उनको छुड़ाया और उनको जख्मी हालत में हस्पताल भर्ती करवाया ।

अब सरला और सीमा दोनों पछता रही थी। सरला की सास दुखी मन से कहने लगी हमने २० वर्षो से इस दोस्ती को बहुत संभाल कर रखा था इन बीस वर्षो में ,ऐसी छोटी छोटी बातो के कारण  हमने कभी हमारी दोस्ती की ईमारत को डगमगाने नहीं दिया | हमने आपसी समझदारी से कभी इसमें दरार नहीं पड़ने दी| बहुत अफ़सोस की बात है की आज तुम दोनों ने एक ही पल में इसे तहस नहस कर दिया और इस दोस्ती को दुश्मनी में बदल दिया ।

दूसरी और मोहल्ले वाले, उनकी दोस्ती जो अब दुश्मनी में बदल चुकी थी, उस पर चर्चा कर रहे थे । घर के सामने उनके बच्चे अब भी एक साथ खेल रहे थे पर अब खेल बदल चुका था. अब उन्होंने क्रिकेट खेलना छोड़ के पतंग उड़ाना शुरू कर दिया था |

— मनजीत कौर

3 thoughts on “लघुकथा : दोस्ती-दुश्मनी

  1. बहुत अच्छी कहानी . गुस्सा भी बुरी बला है . इतनी पुरानी दोस्ती एक पल में ख़तम हो गई .कहते हैं दोस्ती कायेम करने में सारी जिंदगी लग जाती है ,लेकिन दोस्ती ख़तम करने में एक मिनट ही लगता है .इंसान तो वोह ही है जो बिगडती बिगडती को बनाए .

    1. आदरणीय भाई साहब सब से पहले आप का बहुत बहुत शुक्रिया की आप ने अपने कीमती समय से समय निकल कर ये कहानी पड़ी और उस पर विचार दिए इससे होता ये है की लिखने वाले की होसला अफजाई होती है और ख़ुशी मिलती है की उसकी रचना को पसंद किया गया । इस लिए आप का बेहद शुक्रिया । आप ने सही कहा गुस्सा एक बुरी बला है ये जिस इंसान पर हावी हो जाए उसे फिर कोई रिश्ता नाता नजर नहीं आता उसे होश तब आती है जब वो नुक्सान उठा बैठता है यही सरला और सीमा के साथ हुआ । बलोग पर आने और अपने अनमोल विचार देने के लिए आप का हार्दिक शुक्रिया जी

    2. आदरणीय भाई साहब सब से पहले आप का बहुत बहुत शुक्रिया की आप ने अपने कीमती समय से समय निकल कर ये कहानी पड़ी और उस पर विचार दिए इससे होता ये है की लिखने वाले की होसला अफजाई होती है और ख़ुशी मिलती है की उसकी रचना को पसंद किया गया । इस लिए आप का बेहद शुक्रिया । आप ने सही कहा गुस्सा एक बुरी बला है ये जिस इंसान पर हावी हो जाए उसे फिर कोई रिश्ता नाता नजर नहीं आता उसे होश तब आती है जब वो नुक्सान उठा बैठता है यही सरला और सीमा के साथ हुआ । बलोग पर आने और अपने अनमोल विचार देने के लिए आप का हार्दिक शुक्रिया जी

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