लघुकथा

एक माँ का प्यार

 
दरवाजे पर दस्तक हुई शांति देवी ने दरवाजा खोला, लता अपने हाथ में खाने की थाली लिए खड़ी थी। शांति देवी ने कहा” आ गई बिटिया ,आज क्या बना के लाई है अपनी माँ के लिए ? मुस्कुराते हुए लता बोली “आप की मन पसंद भिन्डी की सब्जी और मसूर दाल पुदीने की चटनी के साथ, चलिए माँ दोनों साथ में खाते है और खा कर मुझे बताइए खाना कैसा बना है ।” दोनों साथ में बैठ कर खाने लगी । लता और शांति देवी का खून का रिश्ता तो नहीं था, पर उनमे प्यार माँ बेटी जैसा था| लता उनके पड़ोस में ही रहती थी बहुत नेक औरत थी. उसके सास-ससुर के प्यार का साया सर से उठ जाने के बाद शांति देवी के आशीर्वाद से उसे काफी सुकून मिलता । शांति देवी भी अकेली रहती थी कई साल पहले पति स्वर्ग सिधार गए थे , फिर उसका इकलौता बेटा शादी के बाद अपनी बीवी के साथ दूसरे शहर में अलग रहने चला गया | नए ज़माने के नए रंग , वो दोनों बड़े बजुर्गो के साये को बंदिश मानते इस लिए माँ को अकेले छोड़ के अलग घर बसा लिया | बेटे के जाने के बाद शांति देवी जैसे टूट कर बिखर सी गयी थी ।
उस समय लता ही उसका सहारा बनी थी| लता के बच्चे उसे दादी माँ कह कर बुलाते शांतिदेवी भी उन पर अपना खूब प्यार लुटाती, पर अपने पोता-पोती को मिलने को तरस जाती| वह उनके जन्म पर उन्हें देखने गयी थी, साथ में ढेरो प्यार अपने हाथो से बनाये स्वेटर, कपडे, तरह तरह के खिलोने सब बड़े चाव से लेकर गयी थी | पर चाहते हुए भी,ज्यादा देर वहां ठहर न पाई क्योकि हर बार की तरह इस बार भी बहुऔर बेटे के बर्ताव ने उसे पराया महसूस करवाया था। बेटा कभी कभी अकेले ही मिलने आ जाता था, पर अब तो काफी महीनो से वो भी नहीं आया था | शांति देवी फ़ोन पर जब भीअपने बेटे को घर आने को कहती, तो वो कोई न कोई बहाना बना कर टाल देता ।

उस दिन शांति देवी पुराने अटेची से अपने बेटे के बचपन की कुछ चीजे निकाल कर लता को दिखाते हुए बोली ” लता.. ये देख ये कपडे और ये खिलोने मेरे बेटे के है ( और फिर उन खिलोनो और कपड़ो को सीने से लगा कर कहने लगी)” जब भी मुझे उसकी याद आती है न, में इन कपड़ो को दिल से लगा लेती हु, तब वही छोटा-सा साहिल मुझे यही खेलता नजर आता है तोतली जुबान में माँ-माँ कह कर मेरे गले लगने वाला मेरा साहिल…. अब वो बड़ा हो गया है …अब माँ उसे याद नहीं आती… पर ये माँ उसको कैसे भूल जाए लता .. ” शांति देवी की ममता भरी आँखों से आंसू बहने लगे। लता ने उसके आंसुओ को पोंछा और दिलासा देते हुए कहने लगी “माँ आप उदास न हों देखना भाई साहब जरूर आयेगे ,किसी काम में फंसे होंगे|” पर मन-ही-मन लता जानती थी, कि ये दिलासा झूठा है| अब कुछ दिनों से शांति देवी बीमार रहने लगी थी लता ने शांति देवी के बेटे को खबर कर दी थी, पर उन्होंने आने में बहुत देर करदी उस दिन जब बेटा बहु बच्चे घर पहुंचे शांति देवी की आखरी साँसे चल रही थी | आखिरी बार अपने बेटे का चेहरा देख कर, शांति देवी ने हमेशा के लिए आँखे मूँद ली ।

बेटा-बहू ने लोकाचार के लिए कुछ रस्मे निभाई | माँ के कीमती गहने और जरूरी कागजात समेट लिए, माँ के कपडे घर का सारा पुराना समान स्किप में फैंक दिया गया, जिसमे वो अटैची भी था। जल्द ही ,घर खाली करके, उसे किराये पर देने के लिए नोटिस लगा दिया गया | पर लता तो आज फिर से अनाथ हो गयी थी वो स्किप अभी भी बाहर पड़ी थी और लता उस में पड़े पुराने अटेची की और एक टक देखे जा रही थी जिसमे एक माँ का प्यार सड़क पर पड़ा रुल रहा था |

2 thoughts on “एक माँ का प्यार

  1. मंजीत , कहानी अच्छी लगी जो ज़माने की मुंह बोलती तस्वीर है . ऐसे तो नहीं कि सब ऐसे बेटों की तरह हैं लेकिन अब ऐसे बहुत बेटे पैदा होने लगे हैं ,बस अब तो बेटों को पैसे से ही मतलब है .शाएद ऐसा ही इन के बेटे भी आगे जा कर करेंगे किओंकि अब इतहास भी जल्दी ही दुहरा देगा .

    1. बिलकुल सही कहा आप ने , पता है भाई साहब कई बार जब ऐसे बेटो के बारे में सुनती हूँ तो बहुत दुःख होता है दुनिया में बहुत ही कम माता पिता है जिनको औलाद की तरफ से सुख मिलता है कहानी पसंद करने और अतिसुन्दर कॉमेंट के लिए हार्दिक शुक्रिया जी

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