ग़ज़ल

जो मतिभ्रमित हैं, उनके लिये :

सिर्फ तेरा ही  नहीं है  ज़िन्दगी  पर एख्तियार,
और भी  कुछ लोग  इसमें हैं  बराबर के शुमार।

ज़िन्दगी  के  फैसले  होते   अहम  हैं,  इसलिये,
इनको लेते वक्त लाजिम है कि हो सबसे विचार।

ज़िदंगी  तेरी   सही,  लेकिन   फ़कत  तेरी  नहीं,
कर्ज़ इस पे कितने लोगों का है, ये करले विचार।

चार दिन में सर्द पड़ जाता है  उल्फत का उबाल,
और रह जाता है बस तंजो – रफ़ा का  कारोबार।

राहे – फर्दा पर तू अंधे की तरह मत कर ख़िराम,
मश्विरा  उनका  ज़रूरी है  जो कर  आए गुज़ार।

वो  न  होते,  तू  न  होता,  उनसे है  हस्ती  तेरी,
माँ – पिता के  चैन का  तुझ पर भी है दारोमदार।

फैसला  तो  कर  मगर  इस  बात  के  मद्देनज़र,
कितने  पाएँगे  खुशी और  कितने होंगे  शर्मसार।

‘होश’,  जिनकी उम्र इक,  तुझको बनाने में गयी,
उनकी रुसवायी हो, ऐसे काम से तू कर किनार।

एख्तियार – अधिकार; शुमार – शामिल;
लाजिम – आवश्यक; तंजो-रफ़ा – मन मुटाव;
राहे-फर्दा – भविष्य; खिराम – चलना;
कर आए गुज़ार – उस रास्ते चल चुके लोग;
दारोमदार – जिम्मेदारी; मद्देनज़र – ध्यान में रखना;
शर्मसार – शर्मिंदगी; रुसवाई – बेइज़्ज़ती
किनार – किनारा करना, दूर रहना, avoid

परिचय - मनोज पाण्डेय 'होश'

फैजाबाद में जन्मे । पढ़ाई आदि के लिये कानपुर तक दौड़ लगायी। एक 'ऐं वैं' की डिग्री अर्थ शास्त्र में और एक बचकानी डिग्री विधि में बमुश्किल हासिल की। पहले रक्षा मंत्रालय और फिर पंजाब नैशनल बैंक में अपने उच्चाधिकारियों को दुःखी करने के बाद 'साठा तो पाठा' की कहावत चरितार्थ करते हुए जब जरा चाकरी का सलीका आया तो निकाल बाहर कर दिये गये, अर्थात सेवा से बइज़्ज़त बरी कर दिये गये। अभिव्यक्ति के नित नये प्रयोग करना अपना शौक है जिसके चलते 'अंट-शंट' लेखन में महारत प्राप्त कर सका हूँ।