याज्ञिक परम्परा में महर्षि दयानन्द का अप्रतिम योगदान

उवट, महीधर और सायणाचार्य आदि भाष्यकारों का विचार था कि वेद में वर्णित अग्नि, इन्द्र, वरुण, मित्र आदि कल्पित स्वर्ग में रहने वाले देवता हैं। ये देवता पृथ्वी पर दिखाई देने वाले अग्नि, वायु और जलादि पदार्थों का और आकाश में दिखाई देने वाले सूर्य, चन्द्रमा और उषा आदि के अधिष्ठात्री देवता माना जाते हैं। इस प्रकार से इन देवताओं के दो प्रकार के स्वरूप हो जाते हैं। एक स्वरूप अग्नि, जल, वायु आदि के रूप में जड़ पदार्थ के रूप में रहता है और दूसरा स्वरूप अधिष्ठात्री देवता के रूप में मनुष्यों की भांति प्राणधारी व चेतनायुक्त शरीर के रूप में रहता है। उपरोक्त भाष्यकारों के विचार से इन अधिष्ठात्री देवताओं को प्रसन्न करने के लिए यज्ञों में इनसे सम्बन्धित मंत्रों की आहुतियां दी जाती हैं। यह माना जात है कि ये देवता अदृश्य रूप धारण करके यज्ञ में उपस्थित होकर इन पदार्थों का भक्षण करते हैं। वेदमंत्रों के रूप में अपनी स्तुतियों को सुन कर ये प्रसन्न हो जाते हैं और यजमान की उस कामना जिसके लिए यज्ञ किया गया है, पूर्ण करते हैं। यह भी माना जाता था कि इन यज्ञ-याग करने वालों को मरणोपरान्त स्वर्ग में भी भेज देते थे। स्वर्ग में इन्हें देवताओं की भांति ही सुखभोग प्राप्त होते थे।

महर्षि दयानन्द के अनुसार यज्ञों का वास्तविक स्वरूप-

महर्षि ने आर्योद्देश्यरत्नमाला में यज्ञ की परिभाषा इस प्रकार की है- ‘जो अग्निहोत्र से लेके अश्वेमधपर्यन्त, वा जो शिल्पव्यवहार ओर पदार्थविज्ञान है, जो कि जगत् के उपकार क लिए किया जाता है, उसको यज्ञ कहते हैं।

महर्षि दयानन्द द्वारा स्थापित मान्यता-

(१) देवताओं को आहूत करने पर वे आकर हवि का भक्षण नहीं करते हैं-

महर्षि दयानन्द को अधिष्ठात्री देवों की सत्ता स्वीकार्य न थी। उनके द्वारा तत्कालीन यज्ञ परम्परा का घोर विरोध किया गया। अपने वेदभाष्य व सत्यार्थप्रकाश में उन्होंने देवतावाची पदों का सही अर्थ प्रस्तुत किया। सप्तम समुल्लास में देवता की परिभाषा देते हुए महर्षि कहते हैं- ‘देवता’ दिव्यगुणों से युक्त होने के कारण कहाते हैं, जैसी कि पृथिवी। परन्तु इसको कहीं ईश्वर वा उपासनीय नहीं माना है। महर्षि ने अपने वेदभाष्य में अग्नि, वायु आदि मंत्रों के देवतावाची पदों का अर्थ स्वर्ग विशेष में रहने वाले ओर मनुष्य आकृति के किसी प्राणी के रूप में नहीं किया है अपितु प्रकरण के अनुसार मंत्रों में प्रयुक्त विशेषण के आधार पर जगत् सृष्टा परमात्मा, राष्ट्र का शाषक, राज्य कर्मचारी, अध्यापक, उपदेशक, और जगत् प्रत्यक्ष दिखाई देने वाले अग्नि, वायु, जल, आकाश आदि जड़ पदार्थों के रूप में किया है। चारों वेदों का अध्ययन करने पर कहीं पर भी ऐसा उल्लेख नहीं मिलता है कि अग्नि, वायु, जल, आदि जड़ पदार्थों के मनुष्य जैसे शरीरधारी चेतन अधिष्ठात्री देवता भी पाये गये हों। इस प्रकार पारम्परिक यज्ञकर्ताओं की यह धारणा कि यज्ञों में मंत्रों के द्वारा देवताओं को आहूत करने पर वे आकर हवि का भक्षण करते हैं और इस  कृत्य से प्रसन्न होकर यज्ञकर्ता का कल्याण करते हैं, वेद के प्रतिकूल है। महर्षि ने अपने वेदभाष्य से यह सिद्ध कर दिया कि वेद में वर्णित देवताओं का वह स्वरूप नहीं है जो मध्यकाल के विनियोगकारों और सायणाचार्य आदि भाष्यकारों ने वर्णित किया है।

(२) स्वर्ग के सम्बन्ध में महर्षि की अवधारणा-

महर्षि ने सत्यार्थप्रकाश के नवें समुल्लास में स्वर्ग की परिभाषा देते हुए कहा हे कि सुखविशेष स्वर्ग और दुःखविशेष भोग करना नरक कहलाता है। ‘स्वः’ सुख का नाम है। ‘स्वः सुखं गच्छति यस्मिन् स स्वर्गः’‘अतो विपरीतो दुःखभोगो नरक इति’ जो सांसारिक सुख है वह सामान्य स्वर्ग और जो परमेश्वर की प्राप्ति से आनन्द है, वही विशेष स्वर्ग कहाता है। महर्षि के अनुसार आकाश के किसी स्थान विशेष में स्वर्गलोक नामक कोई स्थान नहीं है। वे किसी काल्पनिक स्वर्गलोक की सत्ता को स्वीकार नहीं करते हैं। उनके अनुसार सुख-समृद्धि से परिपूर्ण जीवन ही स्वर्ग का जीवन है। सायणादि आचार्यों और मध्ययुगीन याज्ञिकों का यह विचार था कि अग्नि, वायु, इन्द्र आदि देवता वेदमंत्रों के द्वारा आहूत किए जाने पर न केवल हवियों का भक्षण करते थे अपितु प्रसन्न होकर यजमान की कामनाओं को पूर्ण करते थे और उसके मरने के बाद उसे स्वर्गलोक में भेज देते थे। ऐसा कोई स्वर्गलोक आजतक किसी को दिखाई नहीं दिया है। इस प्रकार स्वर्गलोक और उसके विपरीत नरकलोक की कल्पना पूर्णतः असत्य व भ्रामक है, जिसका महर्षि ने कठोर शब्दों में निन्दा की है।

(३) यज्ञों का वास्तविक प्रयोजन-

महर्षि ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका में वेदविषयविचार नामक अध्याय के अन्तर्गत कहते हैं कि सुगन्ध आदियुक्त द्रव्य अग्नि में डाला जाता है, उसके अणु अलग-अलग होके आकाश में रहते ही हैं, क्योंकि किसी द्रव्य का वस्तुता से अभाव नहीं होता। इससे वह द्रव्य दुर्गन्धादि दोषों का निवारण करने वाला अवश्य होता है। फिर उससे वायु और वृष्टिजल की शुद्धि होने से जगत् का बड़ा उपकार और सुख अवश्य होता है। इस कारण से यज्ञ को करना चाहिए। पुनः इस शंका का निवारण करते हुए कि अतर और पुष्प आदि घरों में रखने से भी वायु और जल की शुद्धि की जा सकती है, महर्षि कहते हैं कि यह कार्य अन्य किसी प्रकार से सिद्ध नहीं हो सकता है, क्योंकि अतर और पुष्पादि का सुगन्ध तो उसी दुर्गन्ध वायु में मिल के रहता है, उस को छेदन करके बाहर नहीं निकल सकता और न वह ऊपर चढ़ सकता है, क्योंकि उसमें हलकापन नहीं होता है। उसके उसी अवकाश में रहने से बाहर का शुद्ध वायु उस ठिकाने में जा भी नहीं सकता क्योंकि खाली जगह के बिना दूसरे का प्रवेश नहीं हो सकता है। फिर सुगन्ध और दुर्गन्ध वायु के वहीं रहने से रोगनाशादि फल भी नहीं होते हैं। महर्षि ने वेद मंत्रों का भाष्य करते समय कई स्थलों पर यज्ञ करने के प्रयोजन का उल्लेख किया है। कुछ उदाहरण निम्नानुसार हैं-

१. पर्यावरण की शुद्धि-

(१) विद्वानों को ईश्वर की प्रार्थना सहित ऐसा अनुष्ठान करना चाहिए कि जिससे पूर्णविद्या वाले शूरवीर मनुष्य तथा वैसे ही गुणवाली स्त्री, सुख देनेहारे पशु, सभ्य मनुष्य, चाही हुई वर्षा, मीठे फलों से युक्त अन्न और ओषधि हों तथा कामना पूर्ण हो। (यजु0 भा0 २२.२२)

(२) जो मनुष्य आग में सुगन्धि आदि पदार्थों को होमें, वे जल आदि पदार्थों की शुद्धि करने हारे हो पुण्यात्मा होते हैं और जल की शुद्धि से ही सब पदार्थों की शुद्धि होती है, यह जानना चाहिए। (यजु0 भा0 २२.२५)

(3) ऋगवेदादिभाष्यभूमिका के वेदविषयविचार अध्याय में महर्षि ने वर्णित किया है कि यज्ञ में जो भाफ उठता है, वह भी वायु और वृष्टि के जल को निर्दोष और सुगन्धित करके सब जगत् को सुख करता है, इससे वह यज्ञ परोकार के लिए ही होता है। महर्षि ने इस सम्बन्ध मे कहा है- ऐतरेय ब्राह्मण का प्रमाण है कि (यज्ञोऽपि त0) अर्थात् जनता नाम जो मनुष्यों का समूह है, उसी के सुख के लिए यज्ञ होता है और संस्कार किये द्रव्यों का होम करने वाला जो विद्वान् मनुष्य है, वह भी आनन्द को प्राप्त होता है, क्योंकि जो मनुष्य जगत् का जितना उपकार करेगा उसको उतना ही ईश्वर की व्यवस्था से सुख प्राप्त होगा। इसलिए अर्थवाद यह है कि अनर्थ दोषों को हटा के जगत् में आनन्द को बढ़ाता है। परन्तु होम के द्रव्यों का उत्तम संस्कार और होम करने वाले मनुष्यों को होम करने की श्रेष्ठ विद्या अवश्य होनी चाहिए। सो इसी प्रकार के यज्ञ करने से सबको उत्तम फल प्राप्त होता है, विशेष करके यज्ञकर्ता को, अन्यथा नहीं।

२ अन्तःकरण की शुद्धि और सुख-

(१) जो विद्वानों क सुख, पढ़ने, अन्तःकरण के विशेष ज्ञान तथा वाणी और पवन आदि पदार्थों की शुद्धि के लिए यज्ञक्रियाओं को करते हैं, वे सुखी होते हैं।(यजु0 भा0 २२.२॰)

(४) यज्ञों में विनियोग-

महर्षि दयानन्द ने ऋग्वेद के तक और माध्यन्दिन शुक्ल यजुर्वेद संहिता के सम्पूर्ण मंत्रों का भाष्य किया। उससे पूर्व उवट, महीधर और सायण इस का भाष्य कर चुके थे। उवट और महीधर के भाष्य मुख्य रूप से कात्यायन-श्रौतसूत्र में विनियोजित कर्मकाण्ड का अनुसरण करते हैं और सायण के भाष्य भी इसी प्रकार से कर्मकाण्डीय परम्परा का अनुसरण करते हैं। महर्षि दयानन्द सरस्वती का मत है कि पूर्वकृत विनियोग कोई अटल रेखा नहीं कि उसका अनुसरण करना अनिवार्य हो। सभी आचार्यों ने एक मंत्र का विनियोग एक प्रकार से ही नहीं किया है। उन्होंने एक मंत्र का अन्य प्रकार से भी विनियोग किया है। इससे यह प्रतीत होता हे कि मंत्र का पूर्वकृत विनियोगों के साथ कोई सम्बन्ध नहीं है। महर्षि ने ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका में पूवकृर्त विनियोगों के सम्बन्ध में कहा है कि जो युक्तिसिद्ध एवं वेदादि प्रमाणों के अनुकूल हो तथा जो मंत्रार्थ के अनुसार हो, वह विनियोग ग्राह्य हो सकता है। महर्षि ने स्वयं को पूवकृत विनियोगों के बन्धन में नहीं बांधा और ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका में ही कहा कि वेद केवल कर्मकाण्ड नहीं है, ज्ञानकाण्ड, उपासनाकाण्ड और विज्ञानकाण्ड परक अर्थ भी किए जाने चाहिएं। उनके भाष्य से वेद में अग्नि, वायु आदि वेदवर्णित देवताओं से अनेक देवों की पूजा की भ्रान्ति नहीं होती है। अन्य भाष्यकारों ने अग्नि, वायु आदि से परमेश्वर से भिन्न अभिमानी देवों का ग्रहण किया है, वहीं महर्षि ने उन्हें, एक परमेश्वर का गुणवाची माना है।

(५) यज्ञों में पशुवध का निरोध-

कर्मकाण्ड के अनुसार यजुर्वेद के प्रथम अघ्याय से द्वितीय अध्याय के अठाईसवें मंत्र तक दर्शपूर्णमास यज्ञ है। महीधर की कर्मकाण्डपरक व्याख्या में षष्ठ अध्याय के मंत्र 7 से 22 तक अग्नीषोमीय पशु का प्रयोग आता है। इसमें छाग (बकरे) को देवताओं के लिए काटा जाता है। मंत्र 7 से 19 तक पशु को मारने आदि की विधि का वर्णन किया गया है। मंत्र 20 के अनुसार अध्वर्यु मृत पशु के सब अंगों को स्पर्श करके कहता है कि इस पशु के अंग-अंग में प्राण निहित किया और पशु को कहता है कि तुम जीवित होकर देवताओं के समीप जाओ। उसके बाद प्रतिप्रस्थाता नामक ऋत्विज् पहले से ही पृथक् रखे हुए पशु के पिछले हिस्से को ग्यारह भागों में बांट कर, ‘‘समुद्रं गच्छ स्वाहा’’ आदि ग्यारह मंत्राशों से आहुति देते हैं। (मंत्र २१)। अन्त में सब यजमान और ऋत्विज् वरुण से प्रार्थना करते हैं कि वह उन्हें भय से मुक्त करें। (मंत्र २२) महर्षि दयानन्द ने उक्त मंत्र का अर्थ करते हुए कहा है कि यह उस अवसर का है जब बालक के माता-पिता विद्याध्ययानार्थ उसे गुरुकुल में प्रविष्ट कराने लाये हैं। आचार्य अपने इस नवागत शिष्य को सम्बोधित करके कहता है- हे शिष्य! मैं समस्त ऐश्वरयुक्त, वेदविद्या प्रकाश करने वाले परमेश्वर के उत्पन्न किये हुए इस जगत् में सूर्य और चन्द्रमा के गुणों से वा पृथिवी के हाथों के समान धारण और आकर्षण गुणों से प्रीति करते हुए तुझको जो ब्रह्मचर्य धर्म के अनुकूल जल और ओषधि हैं, उन जल और गोधूम आदि अन्नादि पदार्थों से नियुक्त करता हूँ। तुझे मेरे समीप रहने के लिए तेरी जननी अनुमोदित करे, सहोदर भाई अनुमोदित करे, मित्र अनुमोदित करे और तेरे सहवासी अनुमोदित करें। अग्नि और सोम के तेज ओर शांति गुणों में प्रीति करते हुए तुझको उन्हीं गुणों से ब्रह्मचर्य के नियम-पालन के लिए अभिषिक्त करता हूँ। बकरे के यज्ञ में बलि करने के सम्बन्ध में माता-पिता, भाई और मित्र अनुमोदित करें, यह सन्दर्भ के प्रतिकूल है और इससे सिद्ध होता है कि इस प्रसंग में यह अर्थ पूर्णतः वास्तविक अर्थ से भिन्न व प्रतिकूल है। इससे यह भी प्रतीत होता है कि वेद में बलात पशु बलि सम्बन्धी प्रसंग डालने का प्रयास किया गया है। इसी प्रकार के प्रसंग अश्वमेध यज्ञ के सम्बन्ध में यजुर्वेद के 22वें से 25वें अध्याय में, पुरुषमेध यज्ञ के सम्बन्ध में पशुबलि परक अर्थ किए गए हैं। इसमें घोड़े की बलि तथा महिषी के साथ मृत घोडे के सोने के अश्लीलता भरे प्रसंग हैं। कर्मकाण्डियों द्वारा यह माना जाता था कि घोड़ा पुनर्जीवित होकर स्वर्ग चला जाता है। महर्षि दयानन्द अश्वमेध के इस रूप से सहमत नहीं थे और न इसे वेद व शतपथ ब्राह्मण के अनुकूल समझते थे। महर्षि ने ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका में राजप्रजाधर्म में लिखा है कि ‘राष्ट्रपालनमेव क्षत्रियाणाम् अश्वमेधाख्यो यज्ञो भवति, नाश्र्वं हत्वा तदङ्गानां होमकरणं चेति’ अर्थात् राष्ट्र का पालन करना ही क्षत्रियों का अश्वमेध यज्ञ है, घोड़े को मारकर उसके अंगों को होम करना नहीं। यजुर्वेद के  30 व 31 वें अध्याय में भी पुरुषमेध यज्ञ में भी मिलते हैं। किसी समय इस यज्ञ में पुरुषों को यूपों में बांध कर बलि देने की प्रथा थी। महर्षि दयानन्द ने 30 वें अध्याय में आये पदों का उचित अर्थ करते हुए बताया कि इसमें राजा के कर्तव्य बताते हुए कहा गया है कि अमुक-अमुक गुणों वाले पुरुष या स्त्री को आप राष्ट्र में उत्पन्न कीजिए या नियुक्त कीजिए और अमुक-अमुक  दुष्ट आचरण करने वाले पुरुष या स्त्री को आप दूर कर दीजिए। इसी प्रकार कर्मकाण्डानुसार यजुर्वेद के 35वें अध्याय में इन महीधर आदि भाष्यकारों ने पशु-बलि परक अर्थ किए हैं। यजुर्वेद का मंत्र 35.20 प्रस्तुत है-

वह वपां जातवेदः पितृभ्यो यत्रैनान् वेत्थ निहितान् पराके।

मेदसः कुलया उप तान्त्स्रवन्तु सत्या एषामाशिषः संनमन्तां स्वाहा।।

महीधर ने इस मंत्र का विनियोग चर्बी (वपा) का होम करना माना है। वे कहते हैं कि इस मंत्र से गाय की चर्बी का होम करें। वह मंत्र का अर्थ करते हुए कहते हैं- ‘हे जातवेदः अग्ने! तू पितरों के लिए गाय की चर्बी को वहन कर ले जा, जहाँ कि दूर पर निहित उन्हें तू जानता है। चर्बी की नहरें पितरों के पास पहुंचें। दाताओं के मनोरथ भी पूर्ण हों। स्वाहा, सुहुत हो।’ इस मंत्र का अर्थ करते हुए महर्षि ने ‘वपा’ का अर्थ चर्बी न मानते हुए भूमि किया है। उनके अनुसार यह शब्द ‘वप’ धातु से बना है। जिसमें बीज बोया जाए, वह वपा कहलाती है। इसी प्रकार ‘मेदसः कुल्याः’ का अर्थ भी चर्बी की नहरें नहीं है अपितु ‘स्निग्ध नहरें’ हैं। महर्षि अर्थ करते हैं- ‘ज्ञानी जनों को चाहिए कि वे जनक व विद्या-शिक्षा देने वाले श्रेष्ठ पितृजनों से खेती-योग्य भूमि को प्राप्त करें। उसकी सिंचाई आदि के लिए उन्हें जलप्रवाह से युक्त नदी व नहरें निकट प्राप्त हों, जिससे सत्य द्वारा उनकी यथार्थ इच्छाएं फलीभूत हों।

(६) यज्ञ का व्यापक अर्थ- यज्ञ शब्द ‘यज्’ धतु से निष्पन्न होता है और उसके देवपूजा, संगतीकरण और दान ये तीन अर्थ होते हैं, जो इस शब्द में अन्तर्निहित हैं। तीनों शब्द बहुत अधिक व्यापक अर्थों और भावों की अभिव्यक्ति करते हैं। महर्षि ने अपने समस्त ग्रन्थों और वेदभाष्य में इन शब्दों में अन्तर्निहित व्यापक अर्थों और भावों को यज्ञ के परिप्रेक्ष्य में वर्णित किया है। महर्षि ने केवल होम करने को ही यज्ञ नहीं माना है अपितु कहा है कि मनुष्यों को चाहिए कि संसार के उपकार के लिए जैसे विद्वान् लोग अग्निहोत्र यज्ञ का आचरण करते हैं, वैसे अनुष्ठान करें। (यजु0 १७.५५) महर्षि ने यज्ञ का पठन-पाठनरूप भी हमारे समक्ष रखा है। वे कहते हैं कि जो विद्या की वृद्धि के लिए पठन-पाठन रूप यज्ञकम्र्म करने वाला मनुष्य है, वह अपने यज्ञ के अनुष्ठान से सब की पुष्टि तथा सन्तोष करने वाला होता है, इसलिए ऐसा प्रयत्न सब मनुष्यों को करना उचित है। (यजु0 ७.२७)

महर्षि दयानन्द सरस्वती ने पौराणिक कर्मकाण्डियों द्वारा स्थापित भ्रामक विचारधाराओं का न केवल खण्डन किया अपितु वेद के पदों का निरुक्तानुसार यौगिक अर्थ करते हुए सटीक अर्थ प्रस्तुत करते हुए, धरती से बाहर किसी स्वर्ग नाम के लोक की प्रचलित कल्पना का विरोध किया।  मनुष्याकृति वाले देवताओं का यज्ञों में आकर हवि का भक्षण करने सम्बन्धी विचार उन्हें मान्य न था। अधिष्ठात्री देवताओं की सत्ता को उन्होंने स्वीकार नहीं किया। यज्ञों में जादू-टोने का भी उन्होंने घोर विरोध किया। उनसे पूर्व कर्मकाण्डियों द्वारा यज्ञ की एक सीमित परिभाषा होम के रूप में की जाती थी। महर्षि ने यज्ञ का वास्तविक प्रयोजन बताते हुए, एक व्यापक परिभाषा प्रस्तुत की है। उपरोक्त समस्त तथ्यों से यह प्रमाणित होता है कि याज्ञिक विचारधारा को महर्षि ने एक अप्रतिम योगदान दिया है।

-कृष्ण कान्त वैदिक शास्त्री