कुण्डली/छंद

ताटंक छंद—वैलेंटाइन ड़े

ताटंक छंद—-१६ +१४=३० मात्रा के गाल अंत २२२ मगण से होता है

वैलेंटाइन ड़े दुनियाँ मे – प्रेम तरंग उठाया है
नवयुवक युवतियाँ को देखों -अब बूढ़ों को भरमाया है
हो युगल बंद स्वा–छ्न्द धरा – ऐसी सीख सिखाते हैं
भूल पुरानी रूढ़िवादिता- प्रेमी पाठ पढ़ाते हैं
मै हूँ यारा सतयुग वाला – कलियुग मन ना भाता है
पेंग बढ़ाते कलियुग वाले – सतयुग मन मुस्काता है

राजकिशोर मिश्र ‘राज’
१३/०२/२०१६
सर्वाधिकार सुरक्षित

परिचय - राज किशोर मिश्र 'राज'

संक्षिप्त परिचय ---- ========================= मै राजकिशोर मिश्र 'राज' प्रतापगढ़ी कवि , लेखक , साहित्यकार हूँ । लेखन मेरा शौक - शब्द -शब्द की मणिका पिरो का बनाता हूँ छंद, यति गति अलंकारित भावों से उदभित रसना का माधुर्य भाव ही मेरा परिचय है १९९६ में राजनीति शास्त्र से परास्नातक डा . राममनोहर लोहिया विश्वविद्यालय से राजनैतिक विचारको के विचारों गहन अध्ययन व्याकरण और छ्न्द विधाओं को समझने /जानने का दौर रहा । प्रतापगढ़ उत्तरप्रदेश मेरी शिक्षा स्थली रही ,अपने अंतर्मन भावों को सहज छ्न्द मणिका में पिरों कर साकार रूप प्रदान करते हुए कवि धर्म का निर्वहन करता हूँ । संदेशपद सामयिक परिदृश्य मेरी लेखनी के ओज एवम् प्रेरणा स्रोत हैं । वार्णिक , मात्रिक, छ्न्दमुक्त रचनाओं के साथ -साथ गद्य विधा में उपन्यास , एकांकी , कहानी सतत लिखता रहता हूँ । प्रकाशित साझा संकलन - युवा उत्कर्ष साहित्यिक मंच का उत्कर्ष संग्रह २०१५ , अब तो २०१६, रजनीगंधा , विहग प्रीति के , आदि यत्र तत्र पत्र पत्रिकाओं में निरंतर रचनाएँ प्रकाशित होती रहती हैं सम्मान --- युवा उत्कर्ष साहित्यिक मंच से साहित्य गौरव सम्मान , सशक्त लेखनी सम्मान , साहित्य सरोज सारस्वत सम्मान आदि

5 thoughts on “ताटंक छंद—वैलेंटाइन ड़े

  1. प्रिय राजकिशोर भाई जी, प्रेम तरंग उठती रहे, शीतल-मंद-सुगंधित हवा बहे.

  2. प्रिय राजकिशोर भाई जी, प्रेम तरंग उठती रहे, शीतल-मंद-सुगंधित हवा बहे.

    1. बहन जी स्नेहिल आशीर्वाद के लिए आभार एवम् नमन्

    1. आदरणीय जी आपके स्नेहिल प्रतिक्रिया एवम् हौसला अफजाई के लिए आभार एवम् नमन्

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