मन्दिरों की आय और दलितों का विकास

यक्षराज ने युद्धिष्ठिर से पूछा – धर्मराज, भारत में अनुसूचित जाति और जनजाति के वास्तविक विकास, ग्रामीण बेरोजगारी को दूर करने और समग्र हिन्दू समाज में पारस्परिक सौहार्द के राष्ट्रव्यापीकरण के लिए क्या ठोस, सार्थक और सटीक उपाय किए जाने चाहिए ?

युद्धिष्ठिर – यक्षदेव, मेरा अभिमत है कि देश के समस्त छोटे-बड़े हिन्दू मन्दिरों और तीर्थों की समस्त आय के चार हिस्से किए जाएं, एक हिस्से का उपयोग अनुसूचित जाति और जनजाति तथा गरीब सवर्णों के बच्चों को बचपन से ही समग्र रूप से शिक्षित करने हेतु किया जाए I दूसरे हिस्से से गांवों में बीमार, वृद्ध और दुधारू गायों और गौवंश के पालन हेतु गौशालाएं खोली जाएं और दूध, घी के अतिरिक्त वहां गोबर तथा गौमूत्र खाद, कीटनाशक और औषधियों का निर्माण किया जाए और गोबर गैस बनाकर घर घर में भोजन हेतु उसे सप्लाई किया जाए, इससे जैविक खेती के साथ साथ पर्यावरण का संरक्षण भी होगा, गौउत्पादों की बिक्री की आय से सौर ऊर्जा का निर्माण कर घरेलू बिजली बनाकर उसे धीरे धीरे व्यापक रूप दिया जाए I तीसरे हिस्से से कुटीर उद्योगों को गोद लेकर गांव गांव में उनका भरसक विकास किया जाए, ताकि ग्रामीण युवकों और नागरिकों को स्वावलंबी बनाया जा सकें I उनके उत्पादों को सरकारी एवं सामाजिक पहल से देसी और विश्व बाजार दिया जाए I चौथे हिस्से से मन्दिरों के रखरखाव और मन्दिरों पर आश्रितों को यथोचित एवं सम्मानीय मानदेय अनिवार्यरूप से दिया जाए I मन्दिरों की आय का अन्य किसी भी प्रकार का उपयोग तुरन्त प्रभाव से बन्द किया जाए I मन्दिरों और तीर्थों की आय को पूर्णरूपेण करमुक्त किया जाए और दान देने वालों को भी कर में वर्तमान की तुलना में कम से कम दो गुना छूट दी जाएं क्योंकि उस स्थिति में दानदाता देश के समग्र विकास को वास्तविक ऊंचाइयां देने के भारत सरकार के दायित्व को निभाने में सक्रिय सहयोगी की भूमिका में होंगे I

यक्षराज – धर्मराज, आप वास्तव में विलक्षण हैं I अनुसूचित जाति और जनजाति के बच्चों को बचपन से ही समुचित शिक्षा से योग्य और आत्मविश्वासी युवा शक्ति देश को मिलेगी I योग्यता वैसे भी वैसाखियों में विश्वास नहीं करती है तो आरक्षण की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी I आरक्षण समाप्त होगा तो सौहार्द भी बढ़ेगा, कुटीर उद्योगों के विकास और संधारण से बेरोजगारी दूर होगी I और क्या कहूं, मैं तो आपके आगे नतमस्तक हूं I

इतने में सारा परिदृश्य अदृश्य हो गया I

(शायद वे दोनों, देश के समस्त साधू संतों से कहना चाहते थे कि अब दलितोत्थान ही नारायण की सेवा है)

— डॉ. मनोहर भण्डारी