लघुकथा

लघु कथा : रिश्तों का दर्द

मित्रो, आप सब के स्नेह का प्रतिदान तो नहीं कर सकती,… पर कुछ है जो भीतर ही भीतर रिसता रहता है… औरत होने का दर्द.. बरसों से मुझे सालता रहा है पर आज कल कुछ ज्यादा ही बढ़ गया है…. दोस्ती का चोला पहने बहुत लोग हैं जो सिर्फ नोचना खसोटना जानते हैं… पर यह सब मैं आपसे क्यों कह रही हूँ.. शायद इसलिए कि अपनों से पाये घाव नासूर बन गये हैं…

अभी कुछ दिन पहले सोचा कि चलो जरा गैरों को भी परख लिया जाये… और मैं ने एक अजनबी औरत को मन से अपना लिया… दीदी दीदी कह कर दिन रात उनका नाम जपने लगी, मीता दी बहुत प्यारी लगी, गरिमा मय व्यक्तित्व, तराशे नैन नक्श. बुद्धि व सौंदर्य सभी तो था ,मीठी आवाज़ की खनक मैं तो बस मुग्ध होगई. फोन आते बात होती, कुछ अपनी कुछ बेगानी बातें. अचानक एक दिन उनका फोन आया
‘हैलो नीलू, कुछ कहना है ‘
‘हाँ बोलिए, मैं सुन रही हूँ ‘
‘आज के बाद मुझे फोन मत करना ‘
‘क्यों ?’मैंने घबरा कर पूछा
‘बस मैं खुद करलूंगी, जब परिस्थिति ठीक होगी ‘
और फोन कट गया ।

मैं एक ठंडी आह भर कर रह गई । क्या हुआ होगा, अकेली रहती हैं, कोई अनहोनी? आज दो महीने हुए, फोन न आना था नहीं आया । सब मित्रों से उनके बारे में बात की पर कुछ पता नहीं चला, मैंने सोच लिया कि अब कभी फोन नहीं करूंगी और मैं अपनी दुनिया में लीन होगई।

अभी मैं रसोई में भोजन की तैयारी कर रही थी कि घंटी बजी, दरवाजा खोल कर देखा वहाँ कोई नहीं था । मैं वापस मुड़ी ही थी कि बाहर रखे पार्सल पर नजर पड़ी । उठा कर देखा तो मेरा पता लिखा था, पर भेजने वाले का नाम नहीं लिखा था ।
पहले तो डर लगा कि ऩ जाने क्या हो पर फिर उठा कर अंदर लेआई, खोल कर देखा तो उसमें कुछ किताबें थी भारत के विभाजन से जुड़ा साहित्य और एक खत।

प्रिय नीलू, बहुत प्यार
मुझे मालूम है तुम नाराज हो मुझसे, पर क्या करूं, मन ही नहीं करता किसी से बात करने को । अपनों ने मुझसे सारे रिश्ते तो पहले ही तोड़ लिए थे अब मेरे सिर से छत भी छीन ली । अब मैं फुटपाथ पर आगई हूँ । तुम्हें ये पुस्तकें भेज रही हूँ, आशा है कि मुझे माफ करदोगी….
बहुत प्यार सहित
तुम्हारी दीदी मीता

पत्र पढ़ कर मैं स्वयं पर काबू न कर सकी, आँखें नम होगई, खुद को धिक्कारा, छिः कितना गलत सोच बैठी उनके बारे में।
उन पुस्तकों को मैंने अपने शयनकक्ष के एक कोनें में रैक में रख दिया । ये वही पुस्तकें थीं जो उन्हें जान से ज्यादा प्यारी थीं । पेट काट काट कर खरीदा था उन्होंने । मुझे लगा कि वे कुर्सी पर बैठी पढ रहीं हैं । माथे पर पसीना झलक रहा था । शायद उन्हें गर्मीं लग रही हो , सोचकर मैंने खिड़की खोल दी ।

चलती रेलगाड़ी की छुक छुक, आते जाते स्टेशन, जारही हूँ एक ऐसे सफ़र पर जिसका कोई अंत नहीं दिखाई देता, खोजने निकल पड़ी हूँमंजिल की तलाश में, काश मैं उन्हें पासकूं । मेरे छोटे से घर में एक कोना अभी भी है जहाँ मीता दीदी का नाम लिखा है । पराई होकर भी वह अपनों से ज्यादा अपनी हैं । दूर पटरियों पर गुजरती रेल सीटी देती जा रहीं थी ! और मैं खो गयी मीता दी के दर्द की गहराइयों में ।
दर्द , जो न जीने देता है और न…….!
बस ।

परिचय - लता यादव

अपने बारे में बताने लायक एसा कुछ भी नहीं । मध्यम वर्गीय परिवार में जनमी, बड़ी संतान, आकांक्षाओ का केंद्र बिन्दु । माता-पिता के दुर्घटना ग्रस्त होने के कारण उपचार, गृहकार्य एवं अपनी व दो भाइयों वएकबहन की पढ़ाई । बूढ़े दादाजी हम सबके रखवाले थे माता पिता दादाजी स्वयं काफी पढ़े लिखे थे, अतः घरमें पढ़़ाई का वातावरण था । मैंने विषम परिस्थितियों के बीच M.A.,B.Sc,L.T.किया लेखन का शौक पूरा न हो सका अब पति के देहावसान के बाद पुनः लिखना प्रारम्भ किया है । बस यही मेरी कहानी है

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