धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

नास्तिकता मूलतः शोषक शक्तियों के खिलाफ लड़ने का नाम है

भारतीय दार्शनिक परम्परा की दो कोटियां निर्धारित की गई हैं, वेदों और ईश्वर को मानने वाले आस्तिक और वेदों और ईश्वर को न मानने वाले नास्तिक ।

नास्तिकों के खिलाफ समस्त धार्मिक ग्रंथों में ढेरों अपशब्द कहे गए हैं। उन्हें अभिशप्त किया गया, वे असुर परम्परा में रखे गए हैं । असुरों के विरुद्ध देवताओं का लगातार युद्ध ठना रहा है। असुरों के वध के लिए भगवान् बार बार अवतार लेते रहते हैं।

कौटिल्य ने जो दार्शनिक वर्गीकरण किया है उसमें सांख्य, न्याय , योग, वेदांत , मीमांसा और वैशेषिक प्रणाली को आस्तिक वर्ग में रखा है जबकि लोकायत, बौद्ध और जैन को नास्तिक प्रणाली में । कौटिल्य ने ये वर्गीकरण वेदों पर आस्था न होने और होने के आधार पर किया है ।

एक राजनैतिक सत्तामूलक के लिए वेद अथवा ईश्वर निंदा या निषेध वेद पोषक वर्ग के लिए असहनीय था । इसलिए वेद निंदकों के लिए कठोर दंड और नर्कों के आतंक का भरपूर प्रवधान किया जाने लगा । वेद निंदा इतनी असहनीय थी कि सांख्य जैसे दर्शन जो कपिल मुनि द्वारा प्रतिपादित था उसे आस्तिक दर्शन मान लिया गया जबकि कपिल को नास्तिक कहा गया परन्तु वेदों के समर्थन के कारण उसे बाद में आस्तिक दर्शन मान लिया गया।

कौटिल्य का सुझाया उपाय जिसमें राजसत्ता कायम रखने के लिए अन्धविश्वास को बढ़ावा दिया जाना चाहिए उसने भारतीय समाज को अज्ञानता की बेडियों में जकड़ लिया। राजसत्तायें तरह से टोटके और अन्धविश्वास का सहारा लेने लगीं। इन अंधविश्वासों को जनता में पैठ बैठाने के लिए पुरोहित वर्ग आगे रहा । नए नए ग्रन्थ लिखे जाने लगे। वेदों का आधार लेके पुराण आदि मिथकीय ग्रंथों की रचनायें तेजी से होने लगीं।

ब्रह्मणिक व्यवस्था आधारित साधुओं की परजीवी परम्परा बड़े काम आई। इन साधुओं से दो लाभ थे , एक तो ये जाति प्रथा को कठोरता से बनाये रखने में भरपूर मदद करते दूसरे मठों, आश्रमों में दीक्षित साधू कथा वाचकों प्रचारकों के रूप में गृहस्थ लोगों के घरों में प्रवेश कर कर्मकांडों की पैठ बनाते। भारतीय समाज में अन्धविश्वास और कर्मकांडों का तानाबाना इन्ही साधुओं की देन है ।

चूंकि आस्तिक के सबसे बड़े शत्रु नास्तिक ही थे जो उनके अन्धविश्वास और वेदिय राजनैतिक सत्तामूलक प्रणाली को चुनौती दे रहे थे ।अत: असुर विचारधारा बौद्ध और लोकायतों को समाप्त कर दिया गया परन्तु इन्हीं विचार धारा से निकले सिद्ध , योगी , नाथ मत बड़े जोरदार ढंग से वैदिक सत्तामूलक विचारों के खिलाफ अलख जगाये हुए रहे ।

लेकिन सत्ताओं के दमन के कारण उन्हें रोजगार , अपने निवास स्थान और परिवार से बेदखल होना पड़ा । फिर भी वे किसी तरह अपना अस्तित्व बनाये रहें । वे रोजगार से बेदखल थे , रिस्तो के टूटने से रमतो की तरह दर दर भटकने के लिए मजबूर थे पर वे झुकने को तैयार नहीं हुए । उन्होंने कभी वैदिक सत्तामूलक ताकतों से समझौता नहीं किया , वे ब्रह्मणिक सत्ता की आँखों में कांटे की तरह चुभते , आज भी भारत में ये नास्तिक परम्परा के लोग जगह जगह बिखरे पड़े है। दक्षिण की सिद्धों की परम्परा का अध्ययन करते हुए विद्वानों ने माना है कि इनका जीवन अत्यंत दयनीय स्थिति में रहा है पर ये अपने मार्ग से भटके नहीं और न कभी सत्तामूलकों से समझौता किया ।

आज भी बंगाल के बाउलों को गीत गाते हुए और भीख मांगते देखा जा सकता है , इनके गीतों में विद्रोही तेवर होते हैं जो वैदिक सत्ता के खिलाफ होते हैं ।

आगे चल के ये विचारधारा कबीरपंथीओं में तब्दील हो जाती है जो नए उल्लास से सत्तामूलक और शोषणकारी शक्तियों के सामने आ खड़ी हो जाती है ।

– संजय ( केशव )

संजय कुमार (केशव)

नास्तिक .... क्या यह परिचय काफी नहीं है?

One thought on “नास्तिकता मूलतः शोषक शक्तियों के खिलाफ लड़ने का नाम है

  • विजय कुमार सिंघल

    आपके निष्कर्ष गलत मान्यताओं या परिकल्पनाओं पर आधारित हैं। उदाहरण के लिए, आप यह मानते हैं कि सिद्ध, नाथ और योगी सम्प्रदाय लोकायत मत से निकले हैं। यह बिल्कुल गलत है। इन सम्प्रदायों में लोकायत मत का कोई तत्व नहीं है। ये पूर्णत: आस्तिक सम्प्रदाय हैं। आप अपनी मान्यता के संदर्भ में प्रमाण दीजिए।

Comments are closed.