मेरी कहानी 108

वुल्वरहैम्पटन तो मेरे लिए घर जैसा ही था। पहले ही दिन मुझे ड्राइविंग पर लगा दिया गिया। रोज़ रोज़ मुझे नए नए कंडक्टर मिलते और मज़े से काम करते। आइरीन रिटायर हो गई थी। पार्क लेंन में औरतें बहुत काम करती थीं और कुछ तो ड्राइविंग भी करने लगीं थी। दरअसल पहले औरतें ड्राइविंग कर नहीं सकती थी लेकिन ट्रांसपोर्ट ऐंड जेनरल वर्कर्ज़ यूनियन बहुत सालों से औरतों के हक़ में केस लड़ रही थी ताकि उन को भी बराबर के अधिकार दिए जाएँ। मेरे वालसाल काम छोड़ने से कुछ ही समय पहले एक गोरी ने वालसाल गैरेज में ड्राइविंग टेस्ट पास किया था और वोह पहली बस ड्राइवर बन गई थी जिस ने औरतों के लिए दरवाज़े खोल दिए थे । इस के बाद हर गैरेज में औरतों को ड्राइविंग का चांस दिया जाने लगा। इसी दौरान वुल्वरहैम्पटन में बहुत बदलाव आ रहा था। कुछ ही साल पहले सारे टाऊन के ऊपर से एक बहुत बड़ीआ रिंग रोड बन गई थी जिस से टाऊन की ट्रैफिक आसान हो गई थी और टाऊन का रोअब दिखने लगा था, साथ ही बड़े बड़े स्टोर बनने लगे और नई नई दुकाने बनने लगीं। यहां जन्में भारती पाकिस्तानी और वैस्ट इंडियन बच्चे बड़े हो रहे थे और नर्सरी स्कूलों में जाने लगे थे.हमारी औरतें सुबह सुबह बच्चों को ले कर नर्सरी की ओर जाती और आपसी वाकफियत बढ़ती जाती। एक दूसरे से पूछती, तुम्हारा कौन सा गाँव है और बताती तो कोई नज़दीक के गाँव की होती, इस से दोस्ती बढ़ती जाती।

इसी तरह एक औरत कुलवंत को मिली और वोह कुलवंत को पूछने लगी कि उस का कौन सा गाँव है तो कुलवंत ने बताया राणी पुर तो उस औरत नें घर के बड़ों का नाम पुछा तो कुलवंत ने दादा जी का नाम लिया और मेरा नाम लिया कि मैं उस की पत्नी हूँ तो उस औरत ने कुलवंत को बाहों में ले लिया और कहा कि उस के तो मायके राणी पुर में थे और हमारे घर से तो उन के बहुत अच्छे सम्बन्ध थे। जब कुलवंत ने घर आ कर मुझे बताया तो मैंने बताया कि मैं बहुत छोटा सा था जब इस की शादी हो गई थी और मुझे कुछ कुछ याद है। बस फिर किया था हम एक दूसरे के घर जाने लगे और यह मुहबत अभी तक चली आ रही है। इस औरत का नाम है गियान कौर और इसे ज्ञानों कहते हैं और हर साल मेरी कलाई पर राखी बांधती है और इन लोगों ने ही हमारी बड़ी लड़की का रिश्ता कराया था। ज्ञानों के पति आज से तकरीबन बाई तेईस साल पहले कैंसर से भगवान को पियारे हो गए थे । जब हमारी छोटी लड़की की शादी थी तो वोह बिस्तरे पर पड़े इस नामुराद बीमारी से लड़ रहे थे। उन के कुछ लफ़ज़ मुझे भूलते नहीं, ” गुरमेल ! कितना बदनसीब हूँ मैं कि रीटा की शादी है और मैं यहां पड़ा हूँ और गुरदुआरे तक नहीं जा सकता ” . कुछ हफ्ते तकलीफ सह कर वोह इस दुनिआ से चले गए थे, वोह बहुत अच्छे इंसान थे, उन्होंने मुझे बहुत पियार दिया है, वोह कभी भूलते नहीं। गिआनो के दो लड़के जसवंत और बलवंत हमें मामा मामी कह कर पुकारतें हैं। बलवंत जसवंत की तीन बहने भी हैं, सभी अपने अपने घरों में परिवारों के साथ खुश हैं। गिआनो और उन के बेटे हम से सौ गज़ की दूरी पर एक ग्रॉसरी स्टोर चलाते हैं और हम से जो रिश्ता कभी गाँव में हुआ करता था, वोह ही यहां है।

इंगलैंड में जो पहले लोग आये थे, उन में बहुत कम लोग थे जिन्होंने अपने बच्चे यहां लाये थे, यह हमारी पीढ़ी ही थी जिन के बच्चे यहां पलने और पढ़ने लगे थे। जो अंग्रेज़ी हम कालज में पढ़ कर भी बोल नहीं सके थे, इन बच्चों ने एक दो साल में ही सीख ली थी और जब यह गोरों की तरह बोलते तो हमें बहुत ख़ुशी होती। कुछ वक्फे से हमारी दोनों बेटियां पिंकी और रीटा इकठी लैस्टर स्ट्रीट नर्सरी स्कूल जाया करती थीं। यह कुलवंत की ही ड्यूटी थी जो सुबह उन को नर्सरी छोड़ आती और शाम को ले आती थी लेकिन जब कभी मैं काम से आ जाता तो मैं गाड़ी में उन्हें ले आता था। गाड़ी देख कर ही वोह खुश हो जातीं और भागी आती। कितनी ख़ुशी मुझ को उन्हें देख कर होती थी, लिखना मुश्किल है। उन के हाथों में नर्सरी में पेंट किये हुए पेपर होते, जिन पर तोते चिड़िआं बनाये होते लेकिन उन को देख कर कहना मुश्किल होता था कि यह किया था लेकिन जब वोह खुश हो कर मुझे दिखातीं तो मैं भी खुश हो कर ओह ! वंडरफुल कहता तो उन के चेहरे खिल जाते। कभी कभी सोचता हूँ कि बच्चों का वोह बचपन ही हमें पोते पोतिओं में मिल जाता है। बचपन एक जगह ठहर तो सकता नहीं, और जब बच्चे बड़े हो कर अपनी जिम्मेदारिओं में मसरूफ हो जाते हैं तो हम वोह दिन अपने पोते पोतिओं और दोहते दोह्तिओं में ढूँढ़ते हैं और उन का पियार भी दादा दादी की ओर बढ़ जाता है और यही वजह है कि जब बड़े हो कर कुछ बच्चे माँ बाप को इग्नोर करते हैं तो पोते पोतीआं दादा दादी को डिफेंड करते हैं।
अब हमारे एरिये में इंडियन ग्रोसरी की तीन दुकानें हो गई थी लेकिन यह बहुत ही छोटी छोटी थीं जो अक्सर घरों के फ्रंट रूम में ही होती थी, पीछे के कमरे में स्टॉक होता था और रहायश ऊपर होती थी । दो तो इसी लैस्टर स्ट्रीट में थीं, एक बलबीर की और एक सुरैय्या की जो पाकिस्तान से थी, जिस से हमें इंडियन मिर्च मसाले दालें बगैरा सभी मिल जाते थे। ज़्यादा दुकानें गोरे लोगों की ही थीं लेकिन यह दुकानें बहुत छोटी छोटी होती थीं। एक दूकान सब्ज़ी की दूकान स्टैवले रोड पर होती थी जिस को एक गोरा और उस की पत्नी चलाते थे। इंडियन औरतों के लिए कपडे की अभी कोई दूकान नहीं थी, सिर्फ कुछ औरतें घरों में कुछ कपड़े के रोल रख कर बेचती थी। 99 % हमारे लोग मीट खाते थे लेकिन उन को गोरे लोगों की मीट शॉप से ही लेना पड़ता था लेकिन बाद में इसी लैस्टर स्ट्रीट में दो भाईओं ने एक मीट शॉप भी खोल ली थी। एक फिश चिप्स की शॉप थी, जिस में से दूर दूर तक महक आता रहता था। फ्राइडे के दिन तो इस दूकान पर फिश ऐंड चिप्स लेने वालों की लाइन कभी खत्म नहीं होती थी। ज़िंदगी बहुत सादी थी और जरूरतें भी इतनी नहीं थी और बड़ी बात ज़माना भी सस्ता था। किसी चीज़ की कोई भी कमी नहीं थी और हमारे लोगों के लिए तो यह स्वर्ग से कम नहीं था क्योंकि हम लोग तो दूध घी को ही बहुत बड़ी चीज़ मानते थे और कहावत भी थी ” दूधों नहाओ, पूतों फ्लो ” लेकिन यहां तो दूध घी की नदीआं बह रही थीं। सब की जेब में पैसे होते थे क्योंकि सभी काम करते थे।
लोगों में पियार मुहबत बहुत था। हर शनिवार या रविवार को एक दूसरे के घर जाया करते थे और इस में बहुत ख़ुशी मिलती थी। औरतें खाना बनाने में लग जाती थी और आदमी बाहर चले जाते थे। अक्सर आदमी पब्ब से बहुत लेट आते थे और आते ही औरतें टेबल पर खाने लगा देतीं। खाना खा कर बातें करने लगते और हंसी मज़ाक चलता रहता। बारह एक वजे बाई बाई कह कर अपने घर को चलते बनते। बहादर और हम तो मिलते ही रहते थे और बुआ फुफड़ से भी रिश्ता बाँध गिया था और हमें बोर होने का कोई चांस ही नहीं था। इस में एक बात और भी थी कि कोई औरत बाहर काम पर जाती नहीं थी और उन का अँगरेज़ लोगों से ख़ास मिलना जुलना होता नहीं था, इस लिए औरतों के लिए यह एक दूसरे से मिलना जुलना कोई हॉलिडे से कम नहीं होता था। औरतों का बाहर काम करना अच्छा नहीं समझा था, अगर कोई औरत काम करती तो औरतें ही उन को ताने देने लगती । लोग कहते औरत की कमाई पर पलता है।
बस यह वीकैंड पर मिलना जुलना या किसी सीसाइड को चले जाना या किसी ज़ू को जाना ही हमारी ज़िंदगी का बड़ा हिस्सा होता था। अब यह सब ख़त्म हो गिया है क्योंकि यहां के पैदा हुए बच्चों की बातें ही हम से बहुत इलग्ग हैं। जिन गोरे लोगों से हम झिझकते थे उन गोरों से यहां के बच्चे अब शादीआं रचा रहे हैं। जिंदगी एक बम्पी रोड है कभी ऊपर कभी नीचे . एक सुबह कुलवंत उठी और कहने लगी, “जी मुझे सारी रात नींद नहीं आई “, मैंने हंस कर जवाब दिया, “कोई बात नहीं अज रात को आ जायेगी “. लेकिन उस रात भी कुलवंत को नींद नहीं आई, फिर रोज़ ही ऐसा होने लगा .दो हफ्ते हो गए और हम फिकरमंद हो गए और डाक्टर से मिले .डाक्टर राम बहुत अच्छा डाक्टर था और उस ने कोई दुआई दी जिस का नाम था मैगाडौन। उस रात कुलवंत को खूब नींद आई, लेकिन धीरे धीरे दुआई बेअसर होने लगी और नींद आणि बंद हो गई। अब बहुत फ़िक्र होने लगा। मिस्टर राम ने हस्पताल की अपॉइंटमेंट दिला दी और हम हस्पताल जा पहुंचे। साइकैट्रिस्ट ने बहुत सवाल पूछे और कहा कि कभी कभी बच्चा होने के बाद ऐसा हो जाता है और उस ने कैप्स्यूल दे दिए। यह कैप्स्यूल दिनबदिन बढ़ने लगे लेकिन कोई ख़ास फायदा नहीं हुआ। मेरे लिए अजीब स्थिति हो गई। बिस्तरे में पड़ी कुलवंत को मैं कहानीआं नावल पढ़ के सुनाने लगा जिस से उस को कभी कभी जमाईआं आने लगती और दो तीन घंटे नींद आ जाती, लेकिन पूरी नींद बिलकुल ना आती। दरअसल कुलवंत को डिप्रेशन हो गिया था। जब डाक्टर पूछते कि उस को किसी बात को ले कर कोई चिंता थी तो उस का जवाब यही होता, ” डाक्टर साहब, मुझे बेटे की जरुरत थी, अब मुझे भगवान ने मेरी इच्छा पूरी कर दी, अब मुझे चिंता काहे की “.
यह हालत दिनबदिन बढ़ने लगी और वैलिउम जैसे ड्रग्ग डाक्टर देने लगे। इस से कुछ आराम होने लगा लेकिन अब उसे बात बात पे डर लगने लगा। बच्चों को छोड़ने तक ही बात रह गई। टाऊन जाने के लिए बस में जाना उस के लिए असंभव हो गिया क्योंकि उस को बस से डर लगने लगा था। मैं लाइब्रेरी जा कर डिप्रेशन से सम्बंदित नई नई किताबें ला कर स्टडी करता और फिर कुलवंत को सुनाता जिस से उस को बहुत हौसला मिलता। फिर मैंने एक और तरीका ढूंढा। मैं ने कुलवंत को एक बस में बिठा दिया और कहा कि वोह मेरा टाऊन में इंतज़ार करे और मैं पीछे की बस में आऊंगा। जब मैं पीछे की बस में टाऊन पहुंचा तो कुलवंत घबराई इधर उधर देख रही थी और मेरे आते ही वोह खुश हो गई। जिन स्टोरों में बहुत भीड़ होती थी मैं वहीँ उस को ले गिया ताकि उस का डर दूर हो जाए। स्टोरों में हम घुमते रहते, कुछ खाते और घर आ जाते। इस तरह करते करते उस का हौसला बढ़ गिया और मैं उस को कुछ लेने के लिए टाऊन भेज देता कि मेरा यह खाने को जी कर रहा था और वोह ले आती। कुछ दवाइओं से भी वोह अच्छी होने लगी लेकिन दवाईआं बहुत स्ट्रॉन्ग हो चुक्की थी। एक दिन मैंने अखबार में एक गोरी के बारे में लिखा आर्टिकल पड़ा जिस की कंडीशन कुलवंत जैसी थी और उस ने धीरे धीरे सब दवाईआं छोड़ दी थी और बिलकुल ठीक हो गई थी। मैंने यह आर्टिकल पढ़ के कुलवंत को सुनाया। कुलवंत पर इस का बहुत असर हुआ और उस ने प्रण कर लिया कि उस ने ठीक होना है। एक बात तो यह हम ने की कि जब भी मैं काम से आता हम बच्चों को गाड़ी में ले कर पार्क में चले जाते। घुमते रहते और वहां ही पार्क की कैफे में कुछ खा लेते या बच्चों को आइसक्रीम से खुश कर देते। दूसरा कुलवंत ने खुद ही जो दुआई थी उस में से कुछ तोड़ कर बाकी दुआई ले लेती। तीन चार महीने में दवाई आधी रह गई और कुलवंत पहले से अच्छा महसूस करने लगी। अब उस को डर नहीं लगता था। नींद तो अभी भी पूरी नहीं आती थी लेकिन कुछ कुछ आने लगी थी। सब से ज़्यादा स्ट्रॉन्ग दवाई वैलिओम थी ( बाद में इस दवाई पर रोक लगा दी गई थी क्योंकि इस के साइड इफैक्ट बहुत बुरे थे ),इस को भी उस ने दिनबदिन कम करनी शुरू कर दी और एक साल में वैलीओम बंद कर दी। इस के साथ ही हम हर हफ्ते कभी बहादर के घर कभी भुआ और कभी बलबीर के घर जाते रहते, कभी सिनिमा चले जाते, कोई हफ्ता खाली ना रहने देते। ज़िंदगी फिर से पटरी पर आने लगी. चलता. . . . . .

परिचय - गुरमेल सिंह भमरा लंदन

१९६२ में बीए फाइनल की पढ़ाई छोड़ कर इंग्लैण्ड चले गए. लन्दन में निवास कर रहे हैं. किताबें पढने और कुछ लिखने का शौक बचपन से ही रहा है। पिछले १३ वर्ष से रिटायर हैं और बोलने में कठिनाई की समस्या से पीड़ित हैं. पांच वर्ष से रेडिओ एक्सेल बर्मिंघम को कहानियाँ भेज रहे हैं. 'जय विजय' के लिए लघु कथाएँ लिखते हैं. संस्मरण लिख रहे हैं.