धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

नास्तिकता मूलतः शोषक शक्तियों के खिलाफ लड़ने का नाम है

भारतीय दार्शनिक परम्परा की दो कोटियां निर्धारित की गई हैं, वेदों और ईश्वर को मानने वाले आस्तिक और वेदों और ईश्वर को न मानने वाले नास्तिक । नास्तिकों के खिलाफ समस्त धार्मिक ग्रंथों में ढेरों अपशब्द कहे गए हैं। उन्हें अभिशप्त किया गया, वे असुर परम्परा में रखे गए हैं । असुरों के विरुद्ध देवताओं […]

कहानी

हिरनी

एक दिन एक हिरनी जंगल में अपने झुंड से अचानक बिछड़ जाती है। घबराई हुई, डरी हुई, बेतहासा दौड़ते-दौड़ते वह नन्हीं हिरनी जंगल के उस छोर पर आ खड़ी होती है जहां से मनुष्यों की बस्ती यानि की फ़सली मैदानी भाग शुरू होता है। नया दृश्य देखकर वह और भी बदहवास हों जाती है और […]

कविता

मन की व्यथा

ब्यथा अपने मन की बताऊ तो किसे बताती भी हू तो बताकर क्या करू आज के इस दौर मे उलझन ही भरा जगत मे उलझन को सुलझाने मे मदद गार किसे बनाऊ हर मोड पर बेखौख खड़ी सी हो गई अपनो से जुदा होकर गैरो सें जुड गयीं ये समय न जाने किस मोड पर […]

धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

स्वामी स्वतन्त्रानन्द महर्षि दयानन्द के एक प्रमुख योग्यतम शिष्य

ओ३म् स्वामी स्वतन्त्रानन्द जी महाराज आर्यसमाज के अनूठे संन्यासी थे। आपने अमृतसर के निकट सन् 1937 में दयानन्द मठ दीनानगर की स्थापना की और वेदों का दिगदिगन्त प्रचार कर स्वयं को इतिहास में अमर कर दिया। आपके बाद आपके प्रमुख शिष्य स्वामी सर्वानन्द सरस्वती इसी मठ के संचालक व प्रेरक रहे। आपके जीवन पर स्वामी […]

कविता

किसान

वह देश सदा धन्य है जो कृषि प्रधान है वह सदा महान है मनुष्य जो किसान है कठिन श्रम साधता पूर्ण सेवा भाव से न चिलचिलाती धूप से न वर्षा की बूदों से किसी से उसे डर नही नित्य कार्यरत ही रहता उसके अथक प्रयास से संपूर्ण जगत बिकास करता वहा की मिट्टी मे सदा […]

कविता

कविता : फूलों की बात

जब से नन्हा सा शिशु घर पर मेरे आया गुलशन में फूलों सा आँगन मेरा महकाया कोना -कोना महका जब बौर फूल में आया फैली सुगन्ध चहुँ ओर घर और बाहर महकाया अब तरूण पादप बना अंग अंग हुआ लालिमा युक्त हरियाली का आगाज हुआ अंग अंग सिंहरने लगे नये खून का संचार हुआ अब […]

कविता

कविता : चाँद और बादल

धुंध की चादर पसारे धरा के रूप को सभाले धूप हो गई है गुलाबी मौसम अंगराई मारे बादल श्वेत परिधान पहने चाँद ओट से झाँके देखता जमीं के नजारे मुझ पर डोरे डाले शाम हो जाये जब जग में चाँदनी बिखेरें बैठी है जो नव विवाहिता दर्शन को तेरे तुझमें ही अपना चाँद पाये चाँद […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

  धरा   है  घूर्णन  से  त्रस्त,  नभ   विषणन  में  डूबा  है दशा  पर  जग  की, ये  ब्रह्माण्ड  ही  चिंतन  में डूबा है हर इक शय  स्वार्थ  में आकंठ  इस  उपवन में डूबी है कली   सौंदर्य   में   डूबी,  भ्रमर   गुंजन   में   डूबा  है बयां   होगी   सितम […]

कविता

कविता : कूटनीति

दफ्तर के ऑफिसर ने दिवाली के दिन एक कर्मचारी की रिश्वत को लौटा दिया ये देख ऑफिसर की बीवी का मिजाज बिगड़ गया बोली-“आज के दिन लक्ष्मी जी स्वयं घर पधारी थी और आपने उसे विदा कर दिया अरे कब तक महात्मा गांधीजी के पुराने पदचिन्हों पर चलते रहोगे? सीखो  आज के महात्माओ से, किस […]

गीत/नवगीत

गीत- हमको अपने पर फैलाने हैं

बाधायें तो खड़ी राह में सीना ताने हैं. नीलगगन तक हमको अपने पर फैलाने हैं. गोमुख से गंगासागर तक जाती है गंगा. कितनी दूरी है पर मंज़िल पाती है गंगा. सच पूछो तो दूरी-वूरी सिर्फ बहाने हैं. नीलगगन तरह हमको अपने पर फैलाने हैं. सूरज की किरणें रोज़ाना धरती पर आतीं. चंदा की किरणें रातों […]