राजनीति

जेएनयू पर कुछ कहना है

आधुनिक भारत के निर्माता जवाहरलाल नेहरू हैं और उनकी स्मृति में देश में एक उन्नत विश्वविद्यालय की स्थापना की गई। उन नेहरू जी के नाम पर स्थापित विश्वविद्यालय में नौ फरवरी 2016 की रात जो नारे लगे उनका सीधा सा अर्थ नेहरू के उस आधुनिक भारत को खंड खंड कर देना था जिसके लिए नेहरू जी ने अपनी सारी समझ झोंक दी थी। कुल मिलाकर इस विषय पर कम से कम नेहरू जी की विरासत पर गर्व करने वालों केा तो नारों के विरोध में सड़क पर आ जाना चाहिये था और उन नारेबाजों को गिरफ्तार करने की मांग करनी चाहिये थी जिन्होंने नेहरू जी के सपनों के भारत को खंड खंड करने के नारे लगाये लेकिन वे ऐसा न कर सके। चार दिन बाद ही असम की अपनी रैली में राहुल कह रहे थे कि जेएनयू में वह छात्र महंगाई पर बहस कर रहा था गरीबी बेरोजगारी पर बात कर रहा था पर केन्द्र सरकार ने उसे गिरफ्तार करवा दिया। यह बड़ा दिलचस्प है कि राहुल देश की जनता को वास्तव में अपने जमाई वाडरा की भाषा में बनाना पब्लिक की ही जनता समझते हैं।

इस देश को सबसे पहले प्रधानमंत्री नेहरू ही मिले। नेहरू जी ने ही संसद की गरिमा को वर्षों तक बनाये रखा और उसी संसद पर हमला करने वाले अफजल गुरू के समर्थन में उन्हीं के नाम पर स्थापित विश्वविद्यालय में नारे लगे। यह भी एक विडंबना है। उस संबंध में हुई गिरफ्तारी पर वाम दलों के दबाव में उनके घर के चिराग राहुल गांधी ने एक बार फिर वाम नेता डी राजा की बेटी को बचाने के दबाव में या अपनी अपरिपक्वता की मजबूरी में अथवा वाम दलों की संसद में जरूरत की मजबूरी में वहां जाकर जरूर एक प्रकार से वह सब किया जिससे कांग्रेस तो जरूर शर्मसार हुई है। रही सही कसर कि जनता को राहुल यह सब समझा पाते कि वे वहां किस कारण से गये थे कांग्रेस प्रवक्ता ने अफजल गुरू को गुरूजी कहकर पूरी कर दी। इससे पहले ओसामा जी कहकर आतंकवादियों को सम्मानित करने वाले कांग्रेसी नेताओं की बौद्धिक अपरिपक्वता कहें या एक खास वर्ग के मतदाताओं के मतों की मजबूरी कि वे जब तब यह सब करते नजर आ ही जाते हैं।

यदि बारीकी से देखा जाये तो इन नारों में भी एक बात और दिलचस्प नजर आयी। बीजेपी, मोदी, तोगड़िया, मुफ्ती, महबूबा आदि को संबोधित करके कुछ नारे लगाये गये कि वे सुन लें आजादी। मगर कहीं भी यह नहीं सुनने में आया कि लेफ्ट सुन ले आजादी, कांग्रेस सुन ले आजादी, आप सुन ले आजादी। तो इसका क्या संदेश जाता है? क्या लेफ्ट, कांग्रेस और आप ये तीनों से इन नारेबाजों को कोई परेशानी नहीं थी जो नारेबाज केरल कश्मीर और बंगाल आदि केा अलग अलग करके देश को बांटना चाहते हैं? पता चला है कि इनमें से बहुत से नारे तो पिछले कई सालों से लग रहे हैं लेकिन आज तक कोई कार्यवाही नहीं हुई है। मगर इस बार जब एक पूर्ण बहुमत वाली सरकार सत्ता में आयी है और कार्यवाही कर रही है तो कितने ही नेता और कितने ही चैनल सिर्फ और सिर्फ कार्यवाही पर बहस कर रहे हैं न कि उन नारेबाजों पर जो देश को विखंडित करने की बात कर रहे थे।

ऐसा लगता है कि पिछले बीस माह से जो सरकार केन्द्र में है उसके निर्विवाद और तेज कामकाज से परेशान विपक्ष यह तय नहीं कर पा रहा है कि करे तो क्या करे। इसलिए कभी तो कांग्रेस के सलमान खुर्शीद और मणिशंकर अय्यर पाकिस्तान में जाकर मोदी को हटाने में सहयोग मांगते नजर आते हैं तो कभी मोदी जी माफी मांगें के नारे लगाते दिखायी देते हैं। कांग्रेस का यह हाल है कि पश्चिम बंगाल में वह और लेफ्ट पार्टी चौदह फरवरी को एक रैली निकालते हैं और दो दिन बाद जाधवपुर विश्वविद्यालय कलकत्ता के छात्रों की एक रैली निकलती है जिसमें जेएनयू में हुई कार्यवाही का विरोध और नारों का समर्थन किया जाता है और नारे लगाये भी जाते हैं। यह बेहतर और दिलचस्प है कि इस वक्त वर्षों से बिल में दबे सांप निकल निकल कर बाहर आ रहे हैं और जनता उनसे रूबरू हो रही है।

इस पर पार्टियां उन नारों का प्रबल विरोध करने के बजाय निर्दोषों का मसीहा बनने का प्रयास कर रही है ताकि सरकार का विरोध किया जा सके और यह प्रचार किया जा सके कि यह सरकार निर्दोषों को फंसाने का प्रयास कर रही है। महबूबा और मुफ्ती के लिए लगाये गये नारे भी सिर्फ इसलिए हैं क्योंकि इन नारे लगाने वालों को पता है कि वहां पर सरकार बीजेपी के समर्थन से ही है और यह सब अब महबूबा व मुफ्ती के लिए आसान नहीं होगा। हालांकि मुफ्ती मोहम्मद सईद आज हमारे बीच नहीं हैं लेकिन नारे लगाने वाले कदाचित् यह भी नहीं समझ सके। लेकिन वहां पर बीजेपी की मिली जुली सरकार का फायदा ही यह हुआ है कि महबूबा की पार्टी के द्वारा स्वतंत्र रूप से अब कुछ भी गलत नहीं किया जा सकता। विपक्ष इस सबको फायदे की निगाह से देखते हुए दोषी का निर्धारण करना चाहता है यानि वह कहना चाहता है कि यदि इस सबका लाभ बीजेपी को मिल रहा है तो यह सब बीजेपी ने कराया है। यह भी एक नयी बात है।

जब भी अपने पक्ष में कुछ कहना हो तो बातें इस तरह से पेश की जायें जो तर्क से परे हों पर हल्ला हो सके। सच्चाई यह है कि आपका किसी के प्रति विरोध का तरीका यह बता देता है कि आप उसका विरोध कर रहे हैं या नहीं। इसी प्रकार समर्थन का तरीका भी आपके किसी के प्रति समर्थन को स्पष्ट कर देता है कि आप समर्थन किस प्रकार से कर रहे हैं। आज पार्टियां बड़ी चतुराई से निर्दोषों को न छेड़ा जाये कहकर एक प्रकार से सरकार के खिलाफ बिगुल बजाने को तैयार बैठी हैं। देश के खिलाफ लगे नारों पर की गई कार्यवाही के प्रति यह कहकर सरकार को बदनाम करने का प्रयास किया जा रहा है कि सरकार के खिलाफ बोलने पर यह कार्यवाही की जा रही है। बोलने वालों को सोचना चाहिये कि देश सरकार नहीं है। देश बीजेपी, कांग्रेस या आप अथवा लेफ्ट या अन्य कोई पार्टी नहीं है कि उसके खिलाफ बोलने को सह लिया जाये।

सरकारों के खिलाफ पहले भी बोला जाता रहा है और बोला जाता रहेगा। पार्टियों के खिलाफ भी और उनकी नीतियों के खिलाफ भी। यहां तक कि अफजल गुरू हो या कोई और, इस संबंध में सारी दुनियां में फांसी या उम्रकैद के विषय में बहसें पहले भी होती थीं और आगे भी होंगी। मगर इस सब प्रकरण में कन्हैया के समर्थन में जिस प्रकार से छात्र संगठन सामने आ गये या उनको पर्दे के पीछे के लोगों द्वारा लाया गया उससे देश ने एक बात तो समझ ली है कि इस देश में कितनी ही जगह ऐसी हैं जहां ऐसा जहर पनप रहा है और यह देश के लिए बेहद खतरनाक है। पाकिस्तान में विराट कोहली के समर्थन में भारतीय ध्वज लहराने वाला एक युवक दस साल के लिए जेल के अंदर भेज दिया गया है मगर पाकिस्तान में कोई आवाज नहीं उठी है। मगर भारत में बीजेपी को कोसने वाले और मोदी पर बरसने वाले पहले से ही किसी भी तरह नरेन्द्र मोदी को चलते नहीं देना चाहते हैं।

महाभारत में दुर्योधन ने अपनी सारी सीमाएं लांघ दी थीं और धृतराष्ट्र के पुत्र मोह ने ही उस समय भी महाभारत करवाया था। आज पुनः यह पुत्रमोह देश केा भारी पड़ने के लिए तैयार है और इसके परिणाम आने वाला समय तय करेगा। रोहित वेमुला जो आॅन रिकार्ड ओबीसी है और मरते वक्त किसी को भी जिसने अपनी मृत्यु का जिम्मेदार नहीं बताया उसके नाम पर अपनी राजनीति चमकाने वाले और बीजेपी को गाली देने वाले तब क्या करते यदि वह कुछ भी सरकार के खिलाफ लिख जाता। कदाचित् ये सरकार से इस्तीफा मांगने के लिए सारे देश में ही सड़क पर उतर जाते। जिनकी अभी तक गिरफ्तारी नहीं हुई है उनकी भी गिरफ्तारी होनी ही चाहिये और जो भी लोग चाहे वे वकील हों या फिर भाजपा के अपने विधायक या नेता , सभी के खिलाफ कार्यवाही होनी चाहिये।

मगर एक बात काबिलेगौर है , जो लोग कन्हैया के समर्थन में उसको छोड़ने के लिए नारे लगा रहे हैं उनको समझना चाहिये कि दल का नेता ही दल के सदस्यों द्वारा की गई किसी भी कार्यवाही के लिए जिम्मेदार होता है और यदि ऐसी किसी देशविरोधी कार्यवाही होने पर दल का नेता कोई कार्यवाही नहीं करता तो उसको जिम्मेदार माना जाता है। यदि कन्हैया को न पकड़ा जाता और अन्य सदस्यों को पकड़ा जाता तो भी यह सवाल उठाया जाता कि जो दल का नेता है उसे क्यों नहीं पकड़ा गया? अन्ततः अन्य सदस्यों को भी आत्मसमर्पण करना पड़ा और अब उनको भी समझ आ गया होगा कि अब वे पुराने दिन नहीं रहे जब आप अभिव्यक्ति के नाम पर कुछ भी अनाप शनाप देशद्रोही नारे लगाते रहें और सरकारें चुप बैठी रहें।

एक और प्रकरण जिस पर बवाल मचाया जा रहा है वह महिषासुर प्रकरण है जिस पर जेएनयू में महिषासुर दिवस मनाया जाता है। इस देश में रावण की भी पूजा होती है और पूजा करने वाले उसके अपने कारण गिनाते हैं और ऐसे देश में जहां कुत्ते में भी भगवान देखा जाता है वहां यह सब गलत भी नहीं है बशर्ते आप दूसरे किसी देवी देवता के लिए अपमानजनक शब्द न कहें। महिषासुर दिवस मनाने वाले न केवल यह दिवस मनाते हैं लेकिन आपत्तिजनक यह है कि वे देवी दुर्गा के लिए आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग करते हैं और एक नया कल्पनातीत मिथक जड़ते हैं। यह भी गलत है। राजनैतिक दलों केा अपनी राजनीति करनी है लेकिन राजनीति करते करते वे इस स्तर पर न आयें कि राजनीति राजनीति के बजाय द्रोहनीति लगने लगे। रही बात जेएनयू की तो कश्मीर के आतंकवादी जिस प्रकार से जेएनयू को धन्यवाद कहते फिर रहे हैं तो यह जेएनयू की प्रतिष्ठा के लिए आघात होगा।

अब जेएनयू के छात्रों को चाहिये कि अपने विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा बनाये व बचाये रखने के लिए वे इस प्रकार की निंदनीय हरकतों की खुले दिल से निंदा करें और अपनी खुली सोच का परिचय दें। वरना इस विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा को बचाये रखना इतना आसान नहीं रह जायेगा। और हां , आज जब मेरे इन लाईनों को लिखने के बाद कन्हैया जेल से रिहा हो चुका है मगर आरोपमुक्त नहीं हुआ है और जब कि उसे कोर्ट ने संयमित व्यवहार करने का आदेश दिया है तब वह जिस प्रकार से भाषण दे रहा है और मीडिया जिस प्रकार से उसको तवज्जो दे रहा है उससे एक बात सिद्ध होती है कि कदाचित् अब इस विश्वविद्यालय का बौद्धिकता से कोई मतलब नहीं रह गया है और इन छात्रों के छिछले व्यवहार ने मुझे यह समझा दिया है कि कोई पीएचडी का छात्र यदि इस छिछले अंदाज में भाषण दे सकता है तो उस विश्वविद्यालय ने उसे क्या सिखाया है। मैं कदाचित् ही कभी अपने पुत्र को इस विश्वविद्यालय में प्रवेश दिलाउं क्योंकि जहां एक छात्र मदारी की तरह अपना तथाकथित मगर तथाकथित मीडिया की नजर में ऐतिहासिक भाषण देता है और बाकी छात्र तमाशाई बनकर यह सब सुनते हैं और ताली पीटते हैं उस विश्वविद्यालय को यह रैंकिंग कैसे मिल गई, यह भी सोचने की बात है।

डाॅ द्विजेन्द्र वल्लभ शर्मा
हरिपुर कलां , रायवाला देहरादून

डॉ. द्विजेन्द्र वल्लभ शर्मा
आचार्य - संस्कृत साहित्य , सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय , वाराणसी 1993 बी एड - लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ , नयी दिल्ली 1994, एम ए - संस्कृत दर्शन , सेंट स्टीफेंस कॉलेज , नयी दिल्ली - 1996 एम फिल् - संस्कृत साहित्य , दिल्ली विश्व विद्यालय , दिल्ली - 1999 पी एच डी - संस्कृत साहित्य , दिल्ली विश्व विद्यालय , दिल्ली - 2007 यू जी सी नेट - 1994 जॉब - टी जी टी संस्कृत स्थायी - राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय , केशवपुरम् , दिल्ली 21-07-1998 से 7 -1 - 2007 तक उसके बाद पारिवारिक कारणों से इस्तीफा वापस घर आकर - पुनः - एल टी संस्कृत , म्युनिसिपल इंटर कॉलेज , ज्वालापुर , हरिद्वार में 08-01-2007 से निरंतर कार्यरत पता- हरिपुर कलां , मोतीचूर , वाया - रायवाला , देहरादून

3 thoughts on “जेएनयू पर कुछ कहना है

  1. सही कहा शर्माजी…..कुछ बहुत प्रारम्भिक छात्रों के अतिरिक्त जे एन यूं के अधिकाँश छात्र भारतीय संस्कृति विरोधी हुए हैं , छद्म-निरपेक्षिता वाले ..कम्युनिस्म-निष्ठा वाले ..अधिकाँश अपने विदेशी व देशी, पारिवारिक अच्छे कनेक्शन की वज़ह से उच्च स्थानों पर पहुंचे हुए…… द्वितीय श्रेणी के तथाकथित विद्वान्….उस विश्वविद्यालय को यह रैंकिंग कैसे मिल गई, यह भी सोचने की बात है।…..आज वहां के छात्र देशद्रोह की भी ट्रेनिंग ले रहे हैं—-

  2. सही कहा शर्माजी…..कुछ बहुत प्रारम्भिक छात्रों के अतिरिक्त जे एन यूं के अधिकाँश छात्र भारतीय संस्कृति विरोधी हुए हैं , छद्म-निरपेक्षिता वाले ..कम्युनिस्म-निष्ठा वाले ..अधिकाँश अपने विदेशी व देशी, पारिवारिक अच्छे कनेक्शन की वज़ह से उच्च स्थानों पर पहुंचे हुए…… द्वितीय श्रेणी के तथाकथित विद्वान्….उस विश्वविद्यालय को यह रैंकिंग कैसे मिल गई, यह भी सोचने की बात है।…..आज वहां के छात्र देशद्रोह की भी ट्रेनिंग ले रहे हैं—-

  3. बहुत अच्छा लेख.

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