लघुकथा

लघुकथा : दहशत

बार-बार घड़ी को देखते हुए रेखा उकता उठी। “बारह बजने को आये,नहीं आना तो यह भी नहीं कि एक फ़ोन ही कर दे।” अपने आप ही बड़बड़ाये जा रही थी। इतने में दरवाज़े की घंटी बजी।

रेखा दरवाजे पर ही तुलसी को डाँटने लग गई। “आधा दिन गुजरने को आया तुलसी आजकल ये रोज की आदत बना ली तुमने, यह भी नहीं सोचती मैं अकेली परेशान हो रही होऊँगी।”

तुलसी काम करते-करते बतियाती जा रही थी “अब आपसे क्या छिपाना बीजी, शोभा की बात पक्की हो गई है. मेहमानों का आना जाना है इसी चक्कर में देर हो गई।”

“पर शोभा ने तो सीनियर ही करी है अभी कितने अच्छे नंबर आये हैं उसके। तुलसी तेरे को कितना समझाया है लड़कियों का अपने पैरों पर खड़ा होना बहुत जरूरी है और फिर उसकी पढ़ाई के पैसे तो मैं देती आई हूँ ना? आगे भी दूँगी।”

“आपकी मदद से ही तो बच्चों को पाला है बीजी। मैं भी समझती हूँ पढ़ाई जरूरी है पर क्या बताऊँ लड़के की माँ अपने आठ-दस रिश्तेदारों को साथ लेकर घर पर आ गई। धमका रही थी कि पुलिस बुला लेगी। रोये जा रही थी कि तेरी ही लड़की की वजह से मेरे बेटे ने तारपीन पी लिया है।”

“क्या?”

“हाँ बीजी मरते-मरते बचा है उसका लड़का।”

“और तू ऐसे इंसान के साथ बांधने वाली है अपनी बेटी को। पता है ऐसे लोग दिमागी पागल होते हैं।”

“हाँ बीजी क्या भरोसा ऐसे लोगों का अभी खुद की जान लेने की कोशिश करी, मना किया तो कल को मेरी लड़की को कुछ कर न दे। ऐसे ही तो हुआ था मेरी दूसरे नम्बर वाली ननद की बेटी के साथ। लड़की ने शादी से मना किया तो लड़के ने स्कूल से आते वक्त रस्ते में तेज़ाब डाल दिया था उस पर। बैचारी अंधी होकर बैठ गई है। डर लगता है ऐसे लोगों से।”

रेखा तुलसी की आँखों में दहशत साफ देख रही थी।

— अनिता

One thought on “लघुकथा : दहशत

  • विजय कुमार सिंघल

    सत्य को प्रकाशित करती लघुकथा !

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