कविता : प्रेम

मुझे प्रेम नहीं करना था तुमसे
प्रेम सीमित कर देता था अधिकार तुम पर..
लज्जा से बना देता था लचीला मुझे..
नवयौवना बना तुम्हे जी लेने से..
रोक दिया करता था
मुझे तो वात्सल्यमयी स्नेह से बन्ध
तुम्हारी कोमलता को छूना भर था
तुम्हारे पैरो के छाले अपनी साड़ी के छोर से साफ़ कर
मल देना था आंसुओ का मरहम
थकी हारी आँखों पर पड़ी निस्तेज बोझिल पलकों को चूम
पल भर का श्वास भर देना चाहती थी तुम में
प्रेम कर..तुम्हे सीमित कर देती मैं
देह से आत्म तक की यात्रा को
अवरोधित कर सकने वाला प्रेम
समय की किसी नितांत ऊब भरी टहनी पर रख भूल आई थी मैं
अब तुम्हे अपने सानिध्य में रख
पोसना चाहती थी…अंजुरी भर सपने
आँचल भर सुख…एक मुट्ठी आकाश

— गंगा गैड़ा