मेरी कहानी 117

सुरिंदर की सगाई सतपाल से हो गई थी। सतपाल अच्छा लड़का था लेकिन उस का डैडी मगरूर किसम का आदमी था। अपने आप को वोह बहुत ही हुशिआर समझता था और उन की बातें ऐसी होती थी कि लड़के का बाप होने के कारण रौब रखना उस का हक्क था, वोह डायबेटिक था लेकिन शराब की फैशनेबल चपटी बोतल हर वक्त अपने कोट की जेब में रखता था। यह लोग अफ्रीका से आये हुए थे और इन के विचार इंग्लैण्ड के लोगों से भी पुराने थे। रिवाजों के यह इतने सख्त थे जैसे हर काम इनकी मैनुअल में लिखा गिया हो और उस का पालन करना हर एक का फ़र्ज़ था। ज़रा सी भूल हुई तो यह लोग खुसर फुसर करने लग जाते थे कि उन का यह फ़र्ज़ था, वोह फ़र्ज़ था। अब मैं सोचता हूँ कि यह अफ्रीका के लोग तो बहुत पहले से वहां रहते थे और इन के विचार वोह ही थे जब यह सौ साल पहले भारत छोड़ कर आये थे लेकिन वहां बहुत देर रहने के कारण यह पैसे वाले लोग हो गए थे और अपने आप को ज़्यादा एडवांस समझते थे और इंडिया से आये लोगों को कुछ नीचा समझते थे और उन पर हीं हीं करके जोक करते रहते थे। इन लोगों का एक अपना ही मकड़ जाल होता था जिस की हर तार एक पक्की लकीर की तरह थी, इस लकीर को ज़रा सा इधर उधर किया, रिश्तों में दराड़ पड़नी शुरू हो जाती थी। क्योंकि रिश्ता बुआ की बहन शान्ति ने करवाया था, इस लिए बुआ फुफड़ को पूरा यकीन था कि यह लोग बहुत अच्छे थे। फुफड़ भी अपने समधी को खुश करने की हर कोशिश करता। शादी की तैयारियां शुरू हो गई थी। क्या दिया, क्या लिया, मुझे कुछ पता नहीं और ना ही मुझे ऐसी बातों में कोई दिलचस्पी थी, लेकिन दोनों तरफ से लोग खुश दिखाई दे रहे थे.

मैं और कुलवंत बच्चों को ले कर बुआ फुफड़ के घर आते ही रहते थे। काम तो ज़्यादा औरतों का ही होता था जैसे, कैसे गहने, कितने सूट, इस को किया देना, उस को किया देना, मिलनी किस किस की होनी थी, मिलनी में कितनी अंगूठीआं, कितने हार, कितनी पगड़ीआं, समधन को कैसे खुश करना, और भी पता नहीं किया किया। मैं और फुफड़ सामने मघर सिंह के घर चले जाते थे। मघर सिंह का सनेह मुझ से बहुत था शायद इसलिए कि मैं उस की बातें बहुत धियान से सुना करता था और उन की अफ्रीका की ज़िंदगी के बारे में सवाल करता रहता था और वोह खुश हो कर अपने समय की कहानीआं सुनाया करता था। जब भी मैं मिलने जाता, ” आ बई गुरमेल ” कह कर मुझे बुलाता। अपने गाँव धैनोवाली के नज़दीक गाँव में एक संत ईशर दास की बातें बहुत किया करता था। कुछ वहमी सा था। धर्म के मामले में मैं तो शुरू से ही कोरा था लेकिन मघर सिंह के साथ मैं धर्म की बातें बहुत किया करता था, मैं उन को गुरु नानक देव जी और अन्य गुरुओं की कहानीआं सुनाया करता था, जिस से वोह खुश हो जाता और समझता कि मैं बहुत धर्मी हूँ लेकिन यह मैं सब मघर सिंह को ख़ुशी देने के लिए ही कर्ता था। शुरू से ही मैंने कभी भी अपने विचार किसी पर ठूंसने की कभी कोशिश नहीं की, जिस तरह का कोई इंसान हो उस तरह से ही बात करना मेरी आदत रही है। यही वजह थी कि मघर सिंह और उस की पत्नी मुझ से बहुत खुश थे, क्योंकि यह कुलवंत के चाचा चाची थे, इस लिए मैं भी इन को चाचा चाची कह कर ही बुलाता था। इन के दो लड़के चरनजीत और किंग हैं और अब तो उन के भी बच्चे बड़े हो गए हैं लेकिन सभी हम से खुश होकर मिलते हैं।

मघर सिंह खुद बीअर शराब नहीं पीता था लेकिन घर में बीअर के कैन हमेशा रखता था और जब कोई मेहमान आये तो उस को जरूर पेश करता था। मघर सिंह के घर रौनक लगा कर हम पब्ब को चले जाते और खूब बातें करते। पब्ब में कभी बहादर भी मिल जाता और जब मघर सिंह की बातें होतीं तो बहादर मघर सिंह की बात “ओ संत ईशर दास” कह कर हँसता। जब बहादर पब्ब में आ जाता तो हम बहुत बातें किया करते थे, फुफड़ भी बहादर से मिल कर बहुत खुश होता था। फुफड़ की शकल ऑस्ट्रेलियन परफॉर्मर रोल्फ हैरिस से बहुत मिलती थी, बिलकुल उस जैसी दाहड़ी, ऐनकें और सर के बाल उस जैसे होते थे, सिर्फ रंग का ही फर्क था। मुझे पता था कि काम पर सभी उसे रोल्फ हैरिस कहते थे। पब्ब से बाहर आ कर बहादर अपने घर चला जाता और हम फुफड़ के घर आ जाते। कुलवंत और बुआ ने खाना बना कर रखा होता और घर आते ही हम खाने में मसरूफ हो जाते। उस समय औरतें पब्बों में जाती नहीं थीं, आज तो यहां जन्मी लड़किआं जी चाहे तो चली जाती हैं लेकिन अपने पतिओं के साथ। खाना खाते समय बहुत बातें होतीं। पहले पहल हमारी औरतें जब आई थीं तो पुरषों के साथ नहीं बैठती थीं बल्कि इलग्ग कमरे में बैठा करती थीं, अब स्कूल कॉलजों से पडी लिखी लड़किआं आने से तब्दीली आणि शुरू हो गई थी और मर्द औरतें सभी आपस में बैठ कर गप्प शप्प करते थे।

पहले पहल तो शादियां भी घर में ही कर लेते थे। दस पंद्रां आदमी इकठे हो के शादी कर देते थे और बाद में घर में ही रोटी खिला देते थे। अब गुरदुआरे बन गए थे और शादियां गुरदुआरे में होने लगी थी लेकिन अभी भी बरातिओं को मीट शराब सर्व नहीं करते थे। लड़के वाले अपने रिश्तेदारों को किसी पब में ले जाते थे और वहां से आ कर हाल में बैठ कर खाना खा लेते थे। गुरदुआरे के हाल में बीयर पी कर आना उचित तो नहीं था लेकिन कोई कुछ कहता भी नहीं था क्योंकि यह ख़ुशी का वक्त होता था और कोई चारा भी नहीं था।

यूं यूं सुरिंदर की शादी के दिन नज़दीक आ रहे थे तैयारियां भी जोरो शोरों से हो रही थीं। शादी से कुछ दिन पहले कड़ाही की रसम थी और यह दिन पकवान बनाने का दिन था, इस दिन लड्डू शकरपारे गोगले पकौड़े सीरनी मठीआं और नमक वाली सीरनी बनाने का प्रोग्राम था। मैं और कुलवंत सुबह ही आ गए थे। निंदी की ताई ताऊ तो एक दिन पहले ही आये हुए थे। ताई की बहु राणी भी कैनेडा से आ गई थी। आज घर में बहुत रौनक थी। मैंने भी गले में एप्रन डाला हुआ था और मेरी ज़िमेदारी थी मठीआं वेलने की। ताई की बहू रानी को मैंने पहली दफा देखा था लेकिन उस के पति देव यानी निंदी के भाई को मैंने एक दफा देखा हुआ था। राणी बहुत खूबसूरत और ऐश्वर्य राए जैसी थी और बातें करने में भी बहुत अच्छी थी लेकिन ताई यानी अपनी सास को वोह पसंद नहीं करती थी, पता नहीं उन के बीच में क्या था। ताई तो ऐसे थी जैसे सारी दुनिआ ही उस की थी। उस की साधारण बात से भी हंसी आ जाती थी। पहले पहल जब मैंने मठीआं वेलनी शुरू कीं तो ताई मुझे कुछ झिड़क कर बोली, ” गुरमेल ! क्या बात है, यह मठीआं चिड़िओं ने खानी है, इतनी छोटी वेळ रहा है ” ताई ने जब अपने मोटे शीशों वाली ऐनक से मेरी ओर देखा तो सभी हंस पड़े। फिर बोली, ” हैहा अ अ अ कुड़े मुझ से तो छोटी मठी खाई ही नहीं जाती “. मैंने कहा, ताई तेरे लिए मैं इतनी बड़ी बना देता हूँ कि तुम सारा दिन जी भर कर खाती रहना।

इस तरह सारा दिन यह सिलसिला चलता रहा और शाम तक सारे पकवान बन गए थे, पता ही नहीं चला कैसे दिन बीत गिया। जब हम घर से रवाना होने लगे तो ताई ने सब को एक एक बड़ा लफाफा मिक्स पकवान का दे दिया। याद नहीं कितने दिन बाद शादी थी लेकिन एक दिन पहले शाम को हम गुरदुआरे पहुँच गए क्योंकि दूसरे दिन के लिए खाने बनाने थे। हेम राज हलवाई जैसे जैसे हम को हदायत देता हम उसी तरह करते जाते। हेम राज को हम इंडिया से ही जानते थे जिस के बारे में पहले लिख चुक्का हूँ। गुरदुआरा था, ग्राहम स्ट्रीट में जो बर्मिंघम सिटी सैंटर के नज़दीक जीऊलरी कुआर्टर के नज़दीक है। यह गुरदुआरा एक बड़े चर्च को रीडीज़ाइन करके बनाया हुआ था। बाहर से चर्च दिखाई देता था लेकिन भीतर से गुरदुआरा लगता था जिस में लंगर खाना किचन और टॉलेटें बनी हुई थी। आज तो यह और भी बड़ा हो गिया है क्योंकि साथ की बहुत सी जगह भी खरीद ली गई थी जिस पर कार पार्क बना दी गई थी और साथ ही पचास गज़ की दूरी पर एक और नया बहुत बड़ा हाल बना दिया गिया है, जिस का नाम है जस्सा सिंह रामगड़िआ हाल। इस हाल को विवाह शादीओं के लिए बनाया गिया है, जिसमें पार्टीआं होती हैं। इस में ख़ास बात लिखने की यह है कि इंगलैंड के बहुत से चर्च खाली पड़े थे जो हमारे लोगों ने खरीद लिए थे , जिनमें अब गुरदुआरे मंदिर मस्जिद बन गए थे लेकिन आज तो चर्च खरीदने का ज़माना भी खत्म हो गिया है क्योंकि सारे इंगलैंड में नई नई जगह खरीद कर इतने आलिशान धर्म अस्थान बन गए हैं कि भीतर जाते ही रूह खुश हो जाती है।

हेम राज हलवाई के साथ हम काम कराते रहे, वोह विस्की का शौक़ीन था, इस लिए निंदी ने उस को मुहैया करवा दी। सब्जीआं काट ली गई थीं, प्याज़ बगैरा भून लिए गए थे, दही को जाग लगा दिया गिया था, उर्द की दाल गुरदुआरे के गियानी ने सुबह चार वजे गैस कुकर पर रख देनी थी। सारा काम खत्म करके हम अपने अपने घर को चल दिए, हेमराज को निंदी ने उस के घर छोड़ आना था क्योंकि उस के पास गाड़ी नहीं थी। आज कितना आसान काम हो गिया है कि केटरिंग वाले जाने और उन का काम जाने, घर वालों को कोई फ़िक्र ही नहीं है। दूसरे दिन सुबह हम बहुत जल्दी आ गए। निंदी और उस के बड़े भाई जिन्दी को तो गुरदुआरे के हाल में ही रहना था किओंकि हाल में शादी की रसम होनी थी, इस लिए मैंने और कुछ दुसरे लड़कों ने हेमराज के साथ ही रहना और काम करना था किओंकि बरात के चार पांच सौ लोग आने वाले थे और इतने लोगों के लिए खाना बनाना इतना आसान नहीं था. उर्द की काली दाल तो गुरदुआरे के गियानी ने सुबह ही रख दी थी और अब तकरीबन तैयार थी.

दस वजे के करीब बरात आ गई और मिलनी की रसमें शुरू हो गईं. मेरी भी एक मिलनी थी जो दोनों तरफ से जमाइयों की मिलनी होनी थी, इस लिए मुझे भी वहां शामल होना था, तकरीबन एक घंटा मैं वहां रहा और कुलवंत और मैंने लड़के लड़की की झोली में शगुन डाल कर मैं फिर हेम राज के साथ हो लिया। क्योंकि तड़के तो रात को भून लिए गए थे और अब एक नया तरीका हेम राज का देखा, जो पहले मैंने कभी नहीं देखा था। बड़े बड़े पतीलों में भूने हुए तड़के पड़े थे और हेम राज काटी हुई गोभी और आलूओं को एक बड़ी तेल की कड़ाही में तल लेता और तड़के वाले पतीले में डाल देता लेकिन इस तली हुई गोभी और आलुओं को मिक्स ना करता, ऐसे ही जब सारी गोभी आलू तल हो गए तो फिर उस ने बड़े खुरपे से दो तीन मिनट में ही मिक्स कर दिया। बात तो समझ आ गई कि भूने हुए तड़के में तली आलू गोभी डाल कर मिक्स कर दिए और सब्ज़ी तैयार हो गई लेकिन मैंने यह पहली दफा देखा था लेकिन इस में एक बात मुझे अच्छी नहीं लगी थी क्योंकि सब्ज़ी में तेल ही तेल दीख रहा था। यह वोह समय था जब सिहत के बारे में लोगों में जाग्रुप्ता नहीं थी, जो मर्ज़ी खाओ, बटर खाओ, घी खाओ, बस यह ही चलन था। डाक्टर भी कहते थे जो मर्ज़ी खाओ। चने बगैरा भी बन गए थे और अब आखर में पूरीआं ही तलनी थी। काफी लड़के आ गए थे और कुछ लड़के मेज कुर्सियां तरतीब से सजा रहे थे। एक वजे के करीब बाराती आ कर कुर्सिओं पर विराजमान हो गए और हम उन्हें खाना सर्व करने लगे। अब तो पंद्रा सोला लड़के काम कर रहे थे। एक बात हम को हौसला दे रही थी, सभी बोल रहे थे कि खाना बहुत सवादिष्ट था और कुछ लोग हलवाई के बारे पूछ रहे थे ताकि वह उन को जरुरत पड़े तो ले जा सकें।

खाना खा कर सभी बाराती तो बाहर चले गए लेकिन हम खाने की जूठी क्रॉकरी उठाने में लग गए। अब काम बहुत ज़्यादा था क्योंकि सारी क्राकरी को धोना था और आखर में बड़े बड़े पतीले यानी किचन के सारे बर्तन साफ़ करने थे और इस में हमारा बहुत जोर लगा। मिल जुल कर सारा काम खत्म कर लिया गिया। आज सुबह से ही मेरी नाभि के नीचे की दाईं ओर अजीब सा दर्द हो रहा था लेकिन मैंने किसी को बताया नहीं। दर्द अजीब तरह की थी, जैसे मेरे शरीर में कुछ खिंचा जा रहा हो, जब मैं बैठता तो दर्द ठीक हो जाता लेकिन जब चलने लगता तो बीस मिनट बाद ही फिर कुछ खींच होने लगता, मुझे नहीं पता था कि यह किया हो रहा था। गुरदुआरे का सारा काम खत्म करके हम कुछ लड़के घर आ गए क्योंकि अब डोली यानी विदाई का वक्त आ गिया था। तकरीबन छै वजे विदाई हो गई, बहुत से रिश्तेदार चले गए और हम घर के मैम्बर बैठ कर बातें करने लगे। ग़मगीन सा वातावरण था और बातें करते करते काफी रात हो गई। “आप भी अब आराम करो ” कह कर हम भी अपने टाऊन को चल पड़े।

चलता…..

परिचय - गुरमेल सिंह भमरा लंदन

१९६२ में बीए फाइनल की पढ़ाई छोड़ कर इंग्लैण्ड चले गए. लन्दन में निवास कर रहे हैं. किताबें पढने और कुछ लिखने का शौक बचपन से ही रहा है। पिछले १३ वर्ष से रिटायर हैं और बोलने में कठिनाई की समस्या से पीड़ित हैं. पांच वर्ष से रेडिओ एक्सेल बर्मिंघम को कहानियाँ भेज रहे हैं. 'जय विजय' के लिए लघु कथाएँ लिखते हैं. संस्मरण लिख रहे हैं.