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आईना बोलता है

………….गुड़गाँवाँ………

खट्टर सरकार ने एक अति महत्वपूर्ण कदम उठाया जब उसने ‘गुड़गाँवा’ को ‘गुरुग्राम’ बना दिया, बग़ैर इस बात पर ग़ौर किये कि हर्याण्वी लहज़े में इसका उच्चारण किस प्रकार किया जाएगा।

वैसे, इस नये नाम पर कुछ और लोगों का भी दावा है, जैसे मुम्बई का गोरेगाँव और देहरादून।

खट्टर साहब के अनुसार, गुरुग्राम विद्या की एक प्राचीन और विश्व विख्यात स्थली रही है और इस तथ्य को उजागर करना आवश्यक था। हो सकता है इस प्रयास के पीछे गुड़गाँवे को ऐतिहासिक पर्यटन स्थल घोषित करने की मंशा हो, पर जहाँ तक मेरे इतिहास का ज्ञान कहता है, इस स्थान पर तो कभी कोई नालंदा, पाटलिपुत्र या तक्षशिला नहीं था। रही गुरु द्रोण की बात तो वे कोई विश्वविद्यालय के संस्थापक नहीं थे और कुछ राजपुत्रों को शिक्षा देते थे। उनका यह स्कूल रोहित वैमूला जैसे लोगों के लिये कत्तई नहीं था और एकलव्य का एडमीशन इसी आधार पर रिजैक्ट किया गया था। उधर, देहरादून भी अपने आप को द्रोण की नगरी ही मानता है ।

चलिये, खट्टर साहब के अनुसार, यह पुराना लम्बित मामला था, जिसके लिये अनेकों “याचिकाएँ” सरकारी फाइलों में पड़ी चीख रही थीं, और इनका निस्तारण कर “Justice delayed is Justice denied” की तुहमत से जनता की एक बलवती माँग को बचा लिया गया। परन्तु, मैं सोचता हूँ कि क्या इससे गुड़गाँवे की शहरी अव्यवस्था सुधर गयी ? ग़रीबों के पेट भरने लग गये ? उनके बच्चों को स्कूली सुविधा मुहैया हो गयी ? किसानों को अपनी फसल का पूरा लाभ मिलने लग गया ? क्या अब हमारे नेताओं के पास कुछ भी सार्थक करने को नहीं बचा ?

मनोज पाण्डेय 'होश'

फैजाबाद में जन्मे । पढ़ाई आदि के लिये कानपुर तक दौड़ लगायी। एक 'ऐं वैं' की डिग्री अर्थ शास्त्र में और एक बचकानी डिग्री विधि में बमुश्किल हासिल की। पहले रक्षा मंत्रालय और फिर पंजाब नैशनल बैंक में अपने उच्चाधिकारियों को दुःखी करने के बाद 'साठा तो पाठा' की कहावत चरितार्थ करते हुए जब जरा चाकरी का सलीका आया तो निकाल बाहर कर दिये गये, अर्थात सेवा से बइज़्ज़त बरी कर दिये गये। अभिव्यक्ति के नित नये प्रयोग करना अपना शौक है जिसके चलते 'अंट-शंट' लेखन में महारत प्राप्त कर सका हूँ।