इन्सान ईश्वर क्यों पूजता है ?

 

भूल जाते है इन्सान कि मृत्यु अटल है

हर कोई यहाँ मृत्यु की पंक्ति में खड़ा है

क्रमागत मृत्योंमुखी है किन्तु इतना धीरे

आभास नहीं होता ,यही तो आश्चर्य है |

हाँ ,इंसान को पता नहीं लगता कि कब वह मृत्यु के द्वार पहुँच गया |जिंदगी मौज मस्ती में बिता देता है ,दूसरों को मरते देखकर भी नहीं सोचता कि उसे भी एक दिन इस दुनिया को छोड़कर जाना है  |

महाभारत में यक्ष ने युधिष्ठिर से पूछा था,”दुनियाँ में सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है ?”

युधिष्ठिर का जवाब भी यही था ,”लोग दुसरे को मरते हुए देखते है परन्तु यह नहीं सोचते कि उसे भी एक दिन मरना होगा और बेफिक्र होकर अपने जीवन में मस्त रहते हैं| यही सबसे बड़ा आश्चर्य है |“

यक्ष तो संतुष्ट हो गया था इस जवाब से ,किन्तु इंसान के मन में झांककर अगर देखें तो शायद यह उत्तर सही नहीं था | इंसान कभी भी मृत्यु के प्रति बेफिक्र नहीं रहा है | वह बेफिक्र होने का दिखावा करता है |भय को छुपाने की कोशिश करता है | उसे हर घडी मृत्यु का भय सताता है |  मृत्यु की भय से उसे कभी भी मुक्ति नहीं मिली | कभी यह दबा रहता है कभी उभर कर ऊपर आ जाता है तब उसके मन,प्राण ,शरीर में कम्पन उत्पन्न करता है | वह उस भय से बचने के लिए किसी की तलास करता है जो उसे मृत्यु के भय से बचा सके | वह किसकी तलास करता है ? कौन उसको मृत्यु के हाथ से बचा सकता है ? उसे नहीं पता | उस अनजान व्यक्ति को इंसान ने ईश्वर ,अल्लाह, गॉड के नाम से पुकारा | अगर मृत्यु नहीं होती तो इंसान ईश्वर ,अल्लाह, गॉड को याद नहीं करते,न उसको पूजते और न मंदिर,मस्जिद ,चर्च,गुरुद्वारा बनाते | यह मृत्यु का डर ही है जिसके कारण ईश्वर का अस्तित्व है | ईश्वर को प्रसन्न करने के लिए मंदिर,मस्जिद,चर्च,गुरुद्वारा बनाये गये | वो इनसान जिसे मौत से डर नही लगता ,वह न मंदिर जायगा न भगवान को पुजेगा | जब तक मृत्यु का भय है तब तक ईश्वर की पूजा होती रहेगी और मंदिर मस्जिदे बनते रहेंगे | अत: यह भय ही है जो इंसान जो भगवान के शरण में जाने के लिए मजबूर कर देते हैं |

मौत तो प्रत्यक्ष है ,परन्तु मौत से बचाने वाले भगवान अप्रत्यक्ष है , यह एक रहस्य है |इस रहस्य से जिस दिन पर्दा हट जायगा उस दिन मंदिर,मस्जिद जैसे देवस्थान का महत्व भी घट जायगा |  ईश्वर जब सामने होंगे तो मंदिर की जरुरत क्या रहेगी ? पण्डे ,पुजारी ,ज्योतिषों,मठाधीशों के धंधे बंद हो जायेंगे |

मनुष्य में सोच है ,यही भय उत्पन्न करता है |पशु पक्षी में मनुष्य जैसा सोच नहीं है | इसीलिए वे हमेशा भयभीत नहीं रहते हैं | आपातकालीन खतरे का भय है ,प्राण बचाने के लिए छटपटाते है किन्तु यह क्षणिक है | मनुष्य सदा भयभीत रहते हैं | प्रश्न उठता है ,- आखिर यह भय क्यों है ? गीता में कहा गया है ,” जैसे मनुष्य पुराना वस्त्र त्याग कर नया वस्त्र धारण करता है वैसे ही आत्मा पुराना शरीर त्यागकर नया शरीर धारण करती है |”

इंसान इस बात को सुन लेता है, पढ़ लेता है, परतु उस पर पूरा आश्वस्त नहीं हो पाता है|  पुराना वस्त्र  त्याग कर नया वस्त्र धारण करने में उसे डर नहीं लगता क्योंकि नया वस्त्र के बारे में वह सब कुछ जानता है ,वह निश्चिन्त रहता है | किन्तु पुराना शरीर छोड़ने के बाद उसे नया शरीर मिलेगा या नहीं, इसके बारे में उसे कोई निश्चित जानकारी नहीं है | इस शरीर को छोड़ने के बाद वह कहाँ रहेगा ? कौनसा शरीर मिलेगा ? मिलेगा या नही मिलेगा ?  कुछ भी पता नहीं | ये सब अज्ञानता के अन्धकार में छुपा है और इस अन्धकार में उसे धकेल देती है मौत | इस अनिश्चितता  के कारण मृत्यु से इंसान को डर लगता है | यदि उसे मृत्यु के

पहले और बाद में होनेवाली हर घटना की जानकारी मिल जाय तो शायद वह ईश्वर को याद करना भी भूल जाय | हो सकता है उस समय भगवान् की अवधारणा बदल जाय |  हर हाल में मृत्यु का भय ही मनुष्य को भगवान के शरण में ले आता है |

कालीपद ‘प्रसाद’

परिचय - कालीपद प्रसाद

जन्म ८ जुलाई १९४७ ,स्थान खुलना शिक्षा:– स्कूल :शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय ,धर्मजयगड ,जिला रायगढ़, (छ .गढ़) l कालेज :(स्नातक ) –क्षेत्रीय शिक्षा संस्थान,भोपाल ,( म,प्र.) एम .एस .सी (गणित )– जबलपुर विश्वविद्यालय,( म,प्र.) एम ए (अर्थ शास्त्र ) – गडवाल विश्वविद्यालय .श्रीनगर (उ.खण्ड) कार्यक्षेत्र - राष्ट्रीय भारतीय सैन्य कालेज ( आर .आई .एम ,सी ) देहरादून में अध्यापन | तत पश्चात केन्द्रीय विद्यालय संगठन में प्राचार्य के रूप में 18 वर्ष तक सेवारत रहा | प्राचार्य के रूप में सेवानिवृत्त हुआ | रचनात्मक कार्य : शैक्षणिक लेख केंद्रीय विद्यालय संगठन के पत्रिका में प्रकाशित हुए | २. “ Value Based Education” नाम से पुस्तक २००० में प्रकाशित हुई | कविता संग्रह का प्रथम संस्करण “काव्य सौरभ“ दिसम्बर २०१४ में प्रकाशित हुआ l "अंधरे से उजाले की ओर" मुक्तक एवं काव्य संग्रह २०१५ में प्रकाषित | साझा गीतिका संग्रह "गीतिका है मनोरम सभी के लिए " २०१६ | उपन्यास "कल्याणी माँ " २०१६ में प्रकाशित |