Monthly Archives: April 2016


  • ग़ज़ल

    ग़ज़ल

    मिरे मकान में हर सिम्त खिड़कियाँ रक्खीं हरेक ताक पे फिर उसने बिजलियाँ रक्खीं हुनर को उसके बार-बार मरहबा कहिए चमन की शाख़-शाख़ जिसने आँधियाँ रक्खीं बनाए जिस्म बशर के धड़कते दिल रक्खे न जाने उनमें...

  • ग़ज़ल :  चूड़ियाँ

    ग़ज़ल : चूड़ियाँ

    पास न हो तो भी मिट जाती हैं दूरियां सौ मील दूरी पर खनकती है जब उनकी चूड़ियाँ। मेघ की मल्हार हो या हो झरने की झनझार भाती है दिल को आजकल ये खनकती चूड़ियाँ। नीली...

  • कविता : मर्यादा

    कविता : मर्यादा

    क्यों मर्यादा की… चादर ओढ़े, दिन-रात यूँ ही… घुट -2 के जियूँ ! क्यों अोड़ … आडम्बर की चादर, जहर जुदाई… दिन – रात पियूँ !! अभिलाषाएँ… हैं बल खातीं, चाहत भरी मंजिल… मुझे बुलाती !...

  • “ग़ज़ल”

    “ग़ज़ल”

    अब लगता है हम भी बदलने लगे फल बड़े पेड़ छोटे आम्र फलने लगे गमलों में लगाया आम्रपाली बहुत स्वाद फ्रूटी पर बच्चे पिघलने लगे॥ महुआ अब टपकती नहीं बाग में लय अंगूरी लता संग थिरकने...

  • ग़ज़ल

    ग़ज़ल

    वो मंजिल पर आकर पता पूछते हैं । मेरे अहले दिल की रजा पूछते हैं ।। नसीहत जफ़ाओं की जो दे गए थे । सरे बज्म हमसे वफ़ा पूछते हैं ।। लिखी जिसने दर्दे सितम की...

  • बुआजी

    बुआजी

    बात कई साल पुरानी है. एक उच्चशिक्षित युवक के विवाह की बात कई जगह चल रही थी. युवक उच्चपदस्थ था और विदेश में था, अतः अभिभावकों को कोई चिंता तो नहीं थी, फिर भी एक बार...



  • मेरी कहानी 125

    पिंकी की मैरेज रजिस्ट्रेशन से एक दिन पहले बहुत काम था और पिछले एपिसोड में मैं इस का वर्णन कर चुक्का हूँ। क़्योंकि हम दोनों पति पत्नी भी अभी जवान ही थे और यह घर में...