ब्लॉग/परिचर्चा

यहीं रहूंगी

आज एक समाचार पढ़ा- ”अक्षय ने बातचीत में कहा, ‘मैं एक तमिल फिल्म कर रहा हूं, पंजाबी फिल्म में भी काम कर रहा हूं, हॉलिवुड में क्या रखा है! मैं पश्चिम की ओर नहीं दक्षिण की ओर जा रहा हूं.’ उन्होंने कहा, ‘दुनियाभर के कलाकार भारतीय फिल्मों में आकर काम कर रहे हैं तो मैं बाहर क्यों जाऊं?’ यह समाचार पढ़ते ही मुझे दक्षिण भारत की कौशल्या की याद आ गई.
कौशल्या यानी अयोध्या की महारानी कौशल्या नहीं, अपने मन की महारानी कौशल्या. कौशल्या अपने माता-पिता के साथ काम की तलाश में दिल्ली आई थी और थोड़े ही समय में दिल्लीवाली हो गई. उसकी अम्मा हमारे घर मेड का काम करती थी. जब कौशल्या को हमने पहली बार देखा, वह महज 9-10 साल की अल्हड़ बालिका रही होगी. अपनी अम्मा का आंचल पकड़कर वह हर घर में आती थी, बड़े प्यार से बतियाती थी, सलीके से खेलती थी और कभी-कभी अपनी अम्मा का हाथ भी बंटा लेती थी. हमने उसे थोड़ा बहुत लिखना-पढ़ना भी सिखा दिया था. दिन-महीने-साल निकलते चले गए. अब कौशल्या भी पूरी तरह से सब काम करने में माहिर हो गई थी. अब हमारे घर का जिम्मा उसी ने ले लिया था.
कौशल्या सिर्फ़ घरेलू मेड का काम ही नहीं करती थी, सर्दियां हों या गर्मियां, वह अपने पापा के साथ सुबह चार बजे साइकिल पर बैठकर आती थी और पापा के साथ कारें साफ करती थी. हमें सात बजे से पहले स्कूल के लिए निकल जाना होता था, इसलिए पांच बजे हमारे घर आ जाती थी. बर्तन साफ करना, झाड़ू-फटका करना और कपड़े धोने का काम करके वह हमारे साथ ही निकल भी जाती थी. शाम को फिर तीन बजे आकर बर्तन साफ कर जाती थी और पांच बजे तक सब जगह काम करके अम्मा के साथ वापिस चली जाती थी. इस बीच हमने कभी उसे थका हुआ नहीं देखा, किसी काम के लिए परेशान होता नहीं देखा. चाय वह पीती नहीं थी, बिस्किट या मीठा भी वह नहीं खाती थी, हमने उसके लिए रस्क मंगा रखे थे, रस्क और केले वह शौक से खाती थी.
लड़की और बेल के बढ़ते देर नहीं लगती. देखते-ही-देखते वह विवाह के योग्य हो गई. दक्षिण भारत से काम की तलाश में आए युवक से उसकी शादी तय हो गई. शादी के लिए उसे कुछ भी जुटाना नहीं पड़ा. अपने अच्छे स्वभाव के कारण उसने अपने सब घरों से ही इतना पा लिया, कि और कुछ खरीदने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी. शादी के लिए तो उसे दक्षिण भारत जाना ही था, शादी उसके पुश्तैनी गांव में दक्षिण भारत के रीति-रिवाज़ों के मुताबिक जो होनी थी. कुछ दिनों बाद ही वह लड़की से बहू बनकर दिल्ली वापिस आ गई और फिर वही काम का सिलसिला शुरु हो गया.
एक दिन एक गृहिणी ने उसे काम के लिए दुबई जाने के लिए कहा. वह उसके लिए सभी आवश्यक कार्यवाही व खर्चे आदि का वहन भी करने वाली थी. कौशल्या सभी घरों से पूछती थी, क्या वह वहां जाए? कोई उसे जाने और विदेश का मज़ा लेने के लिए प्रोत्साहित करता, कोई बिलकुल मना करने को कहता. कौशल्या ने बहुत सोचा. उसे वहां जाकर भी वही काम ही करना है, तो यहां क्या बुरा है! अपना देश, अपने लोग, अपना पहनावा, अपना खान-पान. वहां जाकर उसे न जाने क्या-क्या बनाना पड़े. यहां तो वह इडली-दोसा-सांभर-चावल से काम चला लेती थी. वहां ये चीज़ें नसीब हों-न-हों, फिर क्या फायदा! पासपोर्ट बनवाने की अर्ज़ी देने से पहले ही वह उस गृहिणी को कह आई- ”मेरा आखिरी फैसला है, मैं दुबई नहीं जाऊंगी, यही काम ही करना है तो यहीं रहूंगी.”

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।

8 thoughts on “यहीं रहूंगी

  1. आदरणीया आपका हर आलेख प्रेरणा का स्रोत है आप हर खबर से सकारात्मक सोच निकाल ही लेती हैं. सादर!

    1. प्रिय जवाहरलाल भाई जी, आपको हमारा हर आलेख प्रेरणा का स्रोत लगता है, यह खुशी की बात है. हर खबर से सकारात्मक सोच निकाल लेना खुशी का मंत्र है. अति सार्थक व सटीक प्रतिक्रिया के लिए आभार.

  2. नमस्ते एवं इस कहानी के लिए धन्यवाद बहिन जी। कहानी अच्छी लगी। ईश्वर करे कि बहिन कौशल्या जी के बच्चे खूब पढ़े लिखे और सफल जीवन व्यतीत करें। परन्तु यह स्वप्न हमारे इस देश के समाज में तो पूरा होना संभव नहीं है। यहाँ शिक्षा अन्य सामानों की तरह बिकाऊ है और गरोबों के बच्चे वही काम करने को मजबूर होतें हैं जो उसके माता पिता करते हैं। हमारे देश की बुनियाद ही ऐसी डाली गई है। सादर।

    1. प्रिय मनमोहन भाई जी, कौशल्या अपने बेटे को बराबर पढ़ा रही है. आजकल दक्षिण भारत के कामगार अपने बच्चों को बहुत पढ़ा रहे हैं. आपकी शुभकामनाएं कौशल्या और उसके परिवार को लहलहाएंगी. आज ब्लॉग पर भी उसके लिए बहुत अच्छे-अच्छे कामेंट्स आए हैं. अति सुंदर व सार्थक प्रतिक्रिया के लिए आभार.

    2. प्रिय मनमोहन भाई जी, कौशल्या अपने बेटे को बराबर पढ़ा रही है. आजकल दक्षिण भारत के कामगार अपने बच्चों को बहुत पढ़ा रहे हैं. आपकी शुभकामनाएं कौशल्या और उसके परिवार को लहलहाएंगी. आज ब्लॉग पर भी उसके लिए बहुत अच्छे-अच्छे कामेंट्स आए हैं. अति सुंदर व सार्थक प्रतिक्रिया के लिए आभार.

  3. लीला बहन , कुशलया ने जो फैसला लिया ,वोह मुश्किल जरुर था लेकिन सही था . जिस ने भी एक दफा देश छोड़ा वोह कभी वापस नहीं आ सका क्योंकि उस की रोजी रोटी वहीँ हो जाती है ,बच्चे वहीँ पड़ने लगते हैं ,फिर उन की शादीआं हो जाती हैं . इंसान देश की यादें सीने में छुपाये इस संसार से विदा हो जाता है . कुशलया को मेरा सलाम भेज देना .

    1. प्रिय गुरमैल भाई जी, आपने स्थिति का सही आकलन किया है. कौशल्या को आपका सलाम अवश्य मिलेगा. अति सुंदर व सार्थक प्रतिक्रिया के लिए आभार.

    2. प्रिय गुरमैल भाई जी, आपने स्थिति का सही आकलन किया है. कौशल्या को आपका सलाम अवश्य मिलेगा. अति सुंदर व सार्थक प्रतिक्रिया के लिए आभार.

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